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Hindi Essay, Paragraph or Speech on “Grisham Ritu”, “ग्रीष्म ऋतु”Complete Essay, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

ग्रीष्म ऋतु

Grisham Ritu

निबंध नंबर :- 01

भारत को अगर भौगोलिक दृष्टि से देखा जाऐ, तो सभी ऋतुओं में ग्रीष्म ऋतु की स्थिति राष्ट्रीय ऋतु की हो जाती है। भारत की बहुसंख्यक आबादी गरीब है। इस बहुसंख्यक आबादी के अनुकूल जो ऋतु होगी, उसे ही राष्ट्रीय ऋतु मानना चाहिए। वर्षा से बचाव के लिए अधिकांश गरीब भारतीयों के पास अपना मकान नहीं होता है। जो भी झोपड़ियां होती हैं, वे वर्षा ऋतु में जब चूने लगती हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है कि उन गरीब के भाग्य ही चू रहे हैंै। जाड़े की ऋतु तो धनवान् लोगों के लिए ही है। जाड़ा शुरू होते ही अमीर कीमती ऊनी कपड़े पहनने लगते है। और साथा ही मौसम अनुकूल भोजन भी देह में डालने लगते हैं। इस प्रकार उन लोगों में बाहर से वस्त्र की गरमी और अन्दर से अन्न की गरमी बनी रहती है। दूसरी ओर बेचारे करोड़ों भारतीयों के तन पर न तो वस्त्र की गरमी रहती है। और न ही पेट में अन्न की गरमी। ये गरीब ठण्ड की मार को भगवान् और आग के सहारे इस आशा में काट लेते हैं कि शीघ्र ही ग्रीष्म ऋतु आने वाली है। ऐसे में ग्रीष्म ऋतु के आते ही ये गरीब खुशी से नाचने लगते हैं। कहने को तो चैत्र, वैशाख, जेठ गरमी के महीने हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप में गरमी वर्ष के लगभग आठ महीने रहती है। अतः कहा जाता है कि करोड़ों गरीब भारतवासियों के लिए राष्ट्रीय ऋतु ग्रीष्म ही है।

ग्रीष्म ऋतु में जोरों की गरमी पड़ती है। सभी विद्यालय, महाविद्यालय एवं सरकारी कार्यालय प्रातःकालीन हो जाते हैं। लेकिन सभी प्रान्तों में यह बात लागू नहीं होती। कुछ स्थानों में ठण्ड से बचने के लिए छुट्टियां दी जाती हैं। गरमी की दोपहरी में पृथ्वी तवे के समान तपने लगती है। ऐसे में बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। सूर्य की गरमी से तालाब-कुओं आदि का जल सूख जाता है। चारों ओर जल के लिए त्राहि-त्राहि मच जाती है। ऐसे में जल की जीवन प्रतीत होने लगता है। ग्रीष्म ऋतु का वर्णन करते हुए सैयद गुलामनवी रसलीन ने लिखा है-

धूप चहक करि चेट अरू फौसी पवन चलाई।

मारत दुपहर बीच में यह ग्रीष्म उग आई।।

ग्रीष्म की दोपहरी जितनी कष्टकर और डरावनी होती है, शाम एवं रात्रि उतनी की सुखकर एवं लुभावनी होती है। शाम होने ही लोग घुमने के लिए निकल पड़ते हैं और देर रात तक खुले आसमान और मनभावन वातावरण का आनन्द लेते हैं। बेला, चमेली, रजनीगंधा की खुशबू तो ग्रीष्म की रात्रि की शोभा में चार चांद लगा देते हैं। ग्रीष्म की चांदनी रात में नौका-विहार में तो आनन्द -ही-आनन्द है। धनी लोग वातानुकूलित कक्ष में समय गुजारते हैं। कुछ लोग बिजली के पंखों की हवा खाते हैं। जबकि गरीब हाथ के पंखे झेलते हैं या पेड़ों के नीचे छाया में विश्राम करते हैं। मिला-जुलाकर औैसत अमीर-गरीब सभी खुले आसमान के नीचे सोकर ग्रीष्म की रात्रि व्यतीत करते हैं।

ग्रीष्म फलों की ऋतु है। फलों का राजा आम भी इसी ऋतु में मिलने लगता है। इसके अलावा लीची, जामुन, शरीफा इत्यादि भी इसी ऋतु की अनमोल फसलें हैं। तपती गरमी में तरबूज का स्वाद किसे अच्छा नहीं लगता है। खीरा, ककड़ी, खरबूजा-ये सभी ग्रीष्म ऋतु की ही उपज हैं, जो तपती गरमी से लोगों को राहत देते हैं।

जे बसन्त को ऋतुराज और वर्षा को ऋतुरानी समझते हैं, उन्हें ग्रीष्म के महŸव को भी कम कर नहीं आंकना चाहिए; क्योंकि ग्रीष्म ही वर्षा की पृष्ठभूमि तैयार करती है। ग्रीष्म के ताप से तपकर ही प्रकृति वर्षा के रूप में करणार्द्र हो उठती है। अतः ग्रीष्म के ताप से अगर धरती नहीं तपेगी, तो समय पर उचित मात्रा में वर्षा भी नहीं होगी, तब कहां वसन्त और कहां उनकी वासन्ती छटा। वसन्र के बाद ग्रीष्म का आगमन यह सन्देश देता है कि मानव-जीवन में सुख के क्षण के बाद दुखःकी घड़ियां भी आती हैं, जिन्हें मानव को सहर्ष झेलना चाहिए  

निबंध नंबर :- 02

ग्रीष्म ऋतु

Grishma Ritu

 

परिवर्तन प्रकति का नियम है। समय परिवर्तनशील है और समय के घमते हुए चक्र के साथ-साथ ऋतुओं में भी परिवर्तन होता रहता है। जैसे काया के साथ उसकी छाया चलती है उसी प्रकार वसन्त ऋतु के पछि-पीछे ग्रीष्म ऋतु उसकी काली छाया की तरह लगी रहती है। वैशाख का महीना आते ही गर्मी अपना रूप दिखा देती है। ज्येष्ठ और आषाढ़ में तो इस का रूप अत्यन्त प्रचण्ड हो उठता है। ग्रीष्म ऋतु में दिन निकलते ही सूरज आग बरसाने लगता है और दस-ग्यारह बजे के लगभग घूप इतनी तेज़ हो जाती है कि बाहर निकलने को जी नहीं चाहता । यदि कहीं जाना ही पड़े तो लोग या तो कोई सवारी ढूंढते हैं या फिर छाता लेकर निकलते हैं ताकि धूप से कुछ बचाव हो सके । चौंधियाने वाली तेज़ धूप से आंखों का बचाव करने के लिए लोग धूप के चश्मों का प्रयोग करते हैं।

दोपहर के समय झुलसाने वाली तेज़ लू चलने लगती है। नीचे जलती हुई धरती, सिर पर आग उगलता सूर्य और साथ झुलसाने वाली लू ये सब मिल कर ग्रीष्म ऋतु को किसी भयानक नरक का रूप दे देते हैं। ग्रीष्मऋतु की दोपहर में गर्मी के कारण बाज़ार सूने हो जाते हैं। किसी दुकान पर कोई ग्राहक दिखाई नहीं देता । ऐसे में घर से बाहर कौन निकले ! पक्षी भी छाया में बैठे ऊंघते हैं। पशु पक्षी ही क्या, हर प्राणी ग्रीष्म ऋतु के इस प्रकोप से व्याकुल होता है। कहते हैं कि केवल गधा ही इस ऋतु में प्रसन्न हो कर रेंगता और धूल में लेटता है, इसी लिए उसे वैशाखनन्दन कहा जाता है।

पंखे के नीचे भी चैन नहीं पड़ता । यदि बिजली बन्द हो जाए तो कुछ पूछिए ही मत । सिर से लेकर पांओं तक व्यक्ति पसीने में नहा उठता है। बच्चों की तो बहुत बुरी दशा होती है। सारा शरीर पित्त अर्थात् घमोरी से लाल हो उठता है। खुजलाते समय तो आनन्द आता है परन्तु बाद में इतनी जलन होती है कि जैसे किसी ने वहां अंगारा धर दिया हो । पसीना आने के कारण एक अजीब दुर्बलता सी अनुभव होती है। काम करने को जी नहीं चाहता, किन्तु नींद भी तो अच्छी तरह से नहीं आती। जुबान बार-बार सूखती है। पानी पी-पी कर पेट तन जाता है किन्तु प्यास नहीं बुझती । शर्बत, ठण्डाई, लस्सी. नीबं का शर्बत बेचने वाले खूब कमाते हैं। बर्फ बेचने वालों के तो बारे न्यारे हो जाते हैं। आइसक्रीम और कुलफी का व्यापार भी ग्रीष्म ऋतु में खूब चमकता है।

ग्रीष्म ऋत में खाने-पहनने का कोई आनन्द नहीं होता । पानी पी-पी कर भूख मर जाती है। दूध-घी की ओर देखने को भी जी नहीं चाहता । कपडे तो सचमुच गले पड़े लगते हैं। जी चाहता है कि कपड़े उतार कर पानी में ही घुसे रहें । पानी के अभाव में पेड़ पौधे भी मुझने लगते हैं। केवल आक, अमलतास ही ऐसे ढीठ हे जो इस ग्रीष्म ऋतु में ही खब फलते-फलते हैं। तालाबों और गडढों का पानी सूख जाता है और सूखी हई ज़बान की तरह उनके तल की धरती दरक उठती है, मानों मुँह खोल कर पानी मांग रही है।

लू लगने के कारण अनेक व्यक्तियों की मृत्यु भी हो जाती है। लू से बचने के लिए निम्बू, नमक वाले पानी आदि का प्रयोग करना चहिए। इस ऋतु में आंखें भी दुखने आ जाती है। कई बार दिन में भयानक गर्मी पड़ने के कारण सायंकाल या रात्रि समय तेज़ आंधी आ जाती है, जो घरों को धूल-धकूड़ से भर देती है। आंधी से कुछ चैन तो आता है, क्योंकि उमस घट जाती है।

ग्रीष्म ऋत में एक और तो जलते हुए लम्बे दिन होते हैं जो समाप्त होने में नहीं आते तो दूसरी ओर रात को भी चैन नहीं पड़ती । लोग खुली छतों पर सोते हैं या सारी रात पंखे चला कर कमरों में सोते हैं। गरीब लोगों का तो बुरा हाल होता है। धनवान् खसखस की टट्टियां लगवाते हैं या एयर-कण्डीशनर लगवा लेते हैं। बहुत से धनवान पहाड़ी स्थानों की शीतल गोद में जा बैठते हैं। वे अपने धन से ग्रीष्मऋतु को पराजित कर देते हैं।

आम, खरबूजा, ककड़ी, लीची, लुकाट, आडू और फालसा आदि गीष्म-ऋतु के फल हैं। इस ऋतु में निर्जला एकादशी और जोड़ का मेला के धार्मिक पर्व भी आते हैं। ज्यों ज्यों आषाढ के दिन बीतने लगते हैं त्यों त्यों ग्रीष्म ऋतु बूढी होने लगती है। अचानक आंधी के साथ आने वाली प्रथम वर्षा की तेज़ बोछाड़ लोगों के मन को प्रसन्नता से भर देती है क्योंकि वह जान जाते हैं कि अब ग्रीष्म ऋतु समाप्त हो गई है।

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