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Hindi Essay on “Pandit Jawaharlal Nehru” , ”पंडित जवाहरलाल नेहरू” Complete Hindi Essay for Class 9, Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

पंडित जवाहरलाल नेहरू

Pandit Jawaharlal Nehru

निबंध नंबर : 01 

आधुनिक स्वतंत्र भारत के निर्माताओं में गांधी जी के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू का नाम ही सर्वाधिक आदर के साथ लिया जाता है। इस कारण और युद्ध जैसे विषयों के विरुद्ध अपनी आवाज उठा शांति-क्षेत्रों को बढ़ावा एंव विस्तार देने के कारण पं. नेहरू का नाम सारे विश्व में आदर के साथ लिया जाता है, और लिया जाता रहेगा। उन्हें शांति-दूत कहा गया और कहा जाता रहेगा।

इनका जन्म 14 नवंबर 1889 को अपने समय के रईस वकील और जन-सेवक पं. मोतीलाल नेहरू के इलाहाबाद स्थित विशाल आनंद भवन में हुआ था। माता का नाम श्रीमती स्वरूपरानी था। इनका लालन-पालन सब प्रकार की सुख-सुविधाओं के बीच राजकुमार की तरह हुआ। आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। हैरो विश्वविद्यालय से इन्होंने बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त की। विदेश में रहकर शिक्षा प्राप्त करते हुए इन्हेंने जिस उन्नत स्वतंत्र विश्व को देखा, अपने देश के ासथ उसकी तुलना करके इनका मन देश की स्वतंत्रता के लिए छटपटा उठा। वहां से लौट प्रैक्टिस करते हुए भी यह देश के लिए चिंतित रहने लगे। इसी बीच इनका विवाह दिल्ली की कमलाजी के साथ हुआ। एक पुत्री भी हुई, वह है श्रीमती इंदिरा गांधी।

भारत लौटकर देश की स्वतंत्रता के लिए चिंतति जवाहर गांधी जी के संपर्क और प्रभाव में आकर जल्दी ही स्वतंत्रता-संघर्ष में कूट पड़े। इन्हीं के स्नेह के कारण पिता मोतीलाल भी स्वतंत्रता-आंदोलन के अंग बन गए। रूज्ण पत्नी ओर अबोध बेटी की परहवाह किए बिना जवाहर स्वतंत्रता-संग्राम में जूझकर जेल जाते रहे। पत्नी से इन्हें बहुत प्यार था। तभी तो उसकी अकाल मृत्यु के बाद भरपूर जवानी में होते हुए भी इन्होंने दुबारा विवाह ननहीं किया। इनके साहस, त्याग और बलिदान से प्रभावित होकर ही सन 1928 में इन्हें पहली बार राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। सन 1929 में उन्होंने लाहौर में प्रतिबंध होने के कारण आधी रात के समय रावी नदी के तट पर राष्ट्रीय ध्वज लहरीाते हुए पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा की थी, जिसकी यादगार 26 जनवरी के दिन तब तक स्वतंत्रता-दिवस के रूप में मनाई जाती रही, जब तक स्वतंत्र होकर भारत गणतंत्र नहीं घोषित हो गया। 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो पं. जवाहरलाल नेहरु को उचित ही राष्ट्र का प्रथम प्रधानमंत्री बनाया गया। इस पद पर वे सन 1964 में अपनी मृत्यु के क्षण तक बने रहे।

आज भारत वैज्ञानिक, आर्थिक, औद्योगिक और विभिन्न क्षेत्रों में जो निरंतर प्रगति कर रहा है। इसकी नींव स्वर्गीय नेहरू की प्रेरणा और प्रयत्नों ने ही रखी थी। उन्होंने अपने जीवन मे, विशेषकर स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद कुछ बड़ी भूलें भी की-जैसे गांधी जी का कहना न मान कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाना भाषा-राष्ट्रभाषा की समस्या को 15 वर्षों तक लटका देना, तिब्बत पर न केवल चीन का अधिकार मानना बल्कि उसकी मित्रता की बातों के झांसे में आ जाना आदि। कहते हैं कि इन गलतियों का अहसास उन्हें लगा था और यही अहसास रोग बनकर उनकी मृत्यु का कारण भी बना। जो हो, वस्तुत: इस प्रकार की गलतियां भी कोई अत्याधिक उदार, मानवतावादी महान नेहा ही कर सकता है। अत: इनसे नेहरू जी की महानता और मानवतावादी दृष्टि के सामने किसी प्रकार का प्रश्न-चिन्ह कतई नहीं लगाया जा सकता।

नेहरू जी ने भारत और विश्व को तटस्थता या गुट-निरपेक्षता की महान माननवतावादी नीति तो दी ही, सभी प्रकार की समसयाओं और विशमताओं से बचे रहने के लिए पंचशील के सिद्धांत भी दिए। अपने जीवन काल में उन्होंने निरस्त्रीकरण और आणविक शस्त्रास्त्रों को प्रतिबंधित करने की आवाज भी सबसे पहले उठाई। कोरिया, इंडोनेशिया, नेपाल के राजा-राणाओं आदि की समस्याओं को सुलझाने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। बाडुंग सम्मेलन में सबसे पहले उन्होंने ही विश्व-शांति और विश्व-मानवता की ओर ध्यान देने की बात कहकर सारे विश्व को इस दिशा में सन्नद्ध हो जाने की पवित्र प्रेरणा प्रदान की। आज के अनेक मानवतावादी आंदोलन उनकी देन कहे जा सकत े हैं। स्वंय हानि उठाकर भी आजीवन मानव-हित के लिए नेहरू जी अनवरत प्रयत्न करते रहे। इसी कारण उन्हें विश्व का सवा्रधिक महानतम मानवतावादी राजनेता माना जाता है। बच्चे चाहे किसी भी देश के क्यों न हों, नेहरू उन्हें बेहद प्यार करते थे, इसी कारण जेसे वे अपनी शेरवानी पर गुलाब का फूल लगाना नहीं भूलते थे, वैसे ही बचचें को पुचकारना, दुलारना उनके साथ बच्चा बनकर ही खेलने लगना कभी नहीं भूलते थे। तभी तो वे विश्व भर के बच्चों के ‘प्यारे चाचा नेहरू’ थे। आज भी बच्चे उन्हें इसी नाम से याद करते हैं।

वे अनेक गुणों के मालिक थे। एक महान मानवतावादी, राजनेता होने के साथ-साथ नेहरूजी एक उच्च कोटि के विचारक, विद्वान, साहित्यकार और कला-पारखी लेखक भी थे। उनकी रचनांए आज भी सारे विश्व में बड़े आदर, सम्मान ओर गंभीरता से पीढ़ी जाती हैं। उनकी लिखी ‘आत्कथा’, ‘भारत की खोज’, ‘पुत्री के नाम पिता के पत्र’ आदि का विशेष महत्व माना जाता है। कवियों-कलाकारों का वे बहुत सम्मान किया करते थे।

आज नेहरू अतीत की एक महान गाथा और ऐतिहासिक राष्ट्र-पुरुष बनकर रह गए हैं। यमुना-तट पर गुलाब के फूलों के घेरे में उनकी आत्मा आज भी यदि किसी प्रकार से चिंतित होती होगी, तो न केवल अपने महान देश बल्कि विश्व की सारी दीन-दुखी मानवता के लिए । उनके बताए मार्ग पर चलकर ही हम उन्हें अपनी वास्तविक श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। उनके देश भारत को महान भी बना सकते हैं। लेकिन आज के नेता और उनके अनुयायी वास्तव में गांधी जी की तरह उनके मार्ग से भी पिछडक़र, फिर भी उनका नाम ले, उन्हें बार-बार मार रहे हैं।

 

निबंध नंबर : 02 

 

जवाहरलाल नेहरु

Jawahar Lal Nehru

 

प्रस्तावना-भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री तथा शांतिदूत बच्चों के चाचा नेहरू के नाम से प्रसिद्ध हैं। पण्डित जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर, 1889 ई० में इलाहाबाद के आनन्द भवन में हुआ था। उनके पिता श्री मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद के प्रसिद्ध बैरिस्टर थे। इनकी माता स्वरूप रानी धार्मिक विचारों वाली महिला थीं। इनका विवाह कमला नेहरू के साथ हुआ था, जिनसे इन्हें एक पुत्री इन्दिरा गाँधी ‘प्रियदर्शनी” प्राप्त हुई।

शिक्षा-दीक्षा-इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए ये इंग्लैंड के प्राचीन महाविद्यालय हैरो गये। सन् 1912 में वहां से ये बेरिस्ट्री । पास कर स्वदेश लौटे और अपने पिता के साथ वकालत करने लगे। , नेहरू के जमाने में भारत की दशा-उन दिनों देशवासियों की स्थिति अत्यन्त खराब थी। देश में अंग्रेजी हुकूमत का बोलबाला था। अंग्रेज सरकार द्वारा भारतीयों को अपमानित किया जा रहा था। अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाने वालों को बन्दी बनाकर बरसों-बरस के लिए जेलों में डाल दिया जाता था। भारतवासियों की बुरी अवस्था तथा विदेशी सरकार का जुल्म देखकर जवाहर लाल नेहरू अत्यन्त दु:खी हुए तथा उन्होंने प्रण लिया कि जब तक वे अंग्रेजी शासन व्यवस्था को देश से समाप्त नहीं कर  देगे तब तक चैन की नींद नहीं सोयेंगे।

क्रांतिकारियों का प्रभाव-सन् 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड में मरे ‘हजारों बेगुनाह’ एवं निहत्थे भारतीयों के शवों को देखकर नेहरू जी का हृदय हिल गया।

स्वाधीनता की राह पर-उन्हें देश की परतन्त्रता और भी खलने लगी। महात्मा गाँधी जी से प्रभावित होकर वे स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। उनकी राजनीति से प्रभावित होकर पिता मोतीलाल नेहरू भी स्वाधीनता संग्राम में साथ देने आ गये। यह विश्व

इतिहास का अनोखा अवसर था। जब एक पिता ने अपने पुत्र के पथ-प्रदर्शन से प्रभावित होकर अपनी इच्छाओं का त्याग कर देशसेवा का संकल्प लिया हो। गाँधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रह आन्दोलन में जवाहरलाल नेहरू जी ने महत्वपूर्ण योगदान

दिया। इस बीच इनकी पत्नी का देहान्त हो गया। पत्नी की मृत्यु का इन्हें वहुत गहरा धक्का लगा, मगर नेहरू जी अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए और देश स्वतन्त्रता के लिए निरन्तर प्रयास करते रहे।

कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नेहरू-स्वतन्त्रता आन्दोलन में उन्हें कई वार कारावास का दण्ड भुगतना पड़ा, परन्तु उन्हें कभी भी इसका भय नहीं रहा। सन् 1829 ई० में नेहरू जी को कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। . उनकी अध्यक्षता में सन्

1929 ई. को 26 जनवरी की रात्रि के 12 बजे रावी तट पर पूर्ण स्वतन्त्रता की घोषणा की गयी। शीघ्र ही उनकी गणना कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं में होने लगी। उनके पथ-प्रदर्शन पर ही स्वतन्त्रता संग्राम चला। अन्तत: नेहरू तथा अन्य राष्ट्रीय नेताओं के अथक प्रयासों से भारत अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त हो सकी।

प्रथम प्रधानमन (देश केआजाद होने के बाद)-सर्वसम्मति सैप, नेहरूक भारत का प्रथम प्रधानमन्त्रीबनाया गया।इसरूप मेंउन्होंनेदेश की उन्नति के लिए। प्रयत्न किये। देश की आर्थिक स्थिति का अवलोकन किया। देश में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए कानून एवं नियम बनाए। देशी रियासतों को सरदार पटेल के प्रयास भारतीय संघ में सम्मिलित कराये। भारत का नया संविधान तैयार कराया।

विज्ञान और टेक्नोलॉजी की शिक्षा पर बल दिया। पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण किया। पूंजीवादी और साम्यवादी गुटों की इच्छाओं को निरस्त कर तटस्थता की नीति को अपनाया। सिंचाई तथा बिजली

उत्पादन के लिए बड़े-बड़े पुल बनवाये, भारत को विश्व में गौरवमय स्थान दिलाया, शिक्षा पर विशेष बल दिया, गांवों एवं शहरों में शिक्षा नीति प्रसारित करने के प्रयास कराए।

शांति दूत के रूप में नेहरू-पं० नेहरू शान्ति के पुजारी थे। युद्ध को भयंकर , अभिशाप समझते थे। उन्होंने संसार में शान्ति बनाए रखने के प्रयास किये। कोरिया और इण्डोनेशिया में भड़की युद्ध की ज्वाला को शान्त करने का श्रेय पं० नेहरू को ही जाता है।

उन्होंने चीन के साथ मिलकर हिन्दी चीनी भाई-भाई का नारा बुलन्द किया, किन्तु चीन ने भारत के साथ धोखा कर 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया। हिमालय के बहुत बड़े क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इस घटना में पं० नेहरू को

बहुत धक्का लगा। वे रात-दिन विश्वासघाती चीनी के बारे में सोचते रहे, जिस कारण वे अस्वस्थ हो गये और अन्त में 27 मई, 1964 को शान्ति के दूत पं० जवाहर लाल नेहरू जी का निधन हो गया। उनकी मृत्यु पर भारत ही नहीं अपितु पूरा विश्व रो उठा। ।

बच्चों के प्यारे नेहरू-पं० नेहरू बच्चों से बहुत प्यार करते थे तथा बच्चे भी उनसे बहुत प्यार करते थे। बच्चे उन्हें चाचा नेहरू कहकर पुकारते थे और प्रत्येक वर्ष उनके जन्म दिवस पर ‘बाल दिवस’ मनाया जाता है। गुलाब नेहरू जी का प्रिय फूल था। आज भी बच्चे शान्ति वन में जाकर उनकी समाधि पर फूल अर्पित करते हैं।

पं० जवाहरलाल नेहरू केवल राजनेता ही नहीं, अपितु अच्छे लेखक भी थे। उनकी – ‘ऑटोबायग्राफी, ग्लिनसेज ऑफ वल्र्ड हिस्ट्री, डिस्कवरी ऑफ इण्डिया आदि कृतियां साहित्य कला के गुणों से अलंकृत हैं।

उपसंहार-इस प्रकार पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने सभी भारतवासियों को अंग्रेजों से स्वतन्त्र कराने में महती भूमिका निभाकर हमें एक नयी जिन्दगी प्रदान की है। हमें

उनके बलिदान को कभी भी भूलना नहीं चाहिए तथा नेहरू जी के जीवन से प्रेरणा लेकर , हमें भी राष्ट्र निर्माण के कार्य में जुट जाना चाहिए।

 

निबंध नंबर : 03

जवाहर लाल नेहरू 

Jawahar Lal Nehru

               

                पं0 जवाहर लाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। स्वतंत्रता संग्राम में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें भुलाया नहीं जा सकता। उनका संपूर्ण जीवन देश सेवा के लिए समर्पित था। पं0 जवाहर लाल नेहरू को आधुनिक भारत का निर्माता भी कहा जाता है। बच्चों में वे ‘चाचा नेहरू‘ के रूप में प्रसिद्ध थे।

                नेहरू जी का जन्म 14 नंवबर 1889 ई0 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था। उनके पिता पं0 मोतीलाल नेहरू एक विख्यात वकील थे। नेहरू जी को बाल्यकाल से ही समस्त सुविधाएँ प्राप्त थी। उनका लालन-पालन शाही परिवार के राजकुमार के भाँति हुआ। बचपन से ही कुशल एवं अनुभवी अध्यापकों द्वारा उन्हें शिक्षा दी गई । 15 वर्ष की आयु में उन्हें अध्ययन के लिए लंदन भेजा गया । सन् 1910 ई0 में कैबिज विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा पास करने के उपरांत उन्होंने कानून की शिक्षा ग्रहण की तथा भारत लौटकर इलाहबाद उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे । 27 वर्ष की उम्र में उनका विवाह कमला नेहरू के साथ हुआ । 

                नेहरू जी भारत में ब्रिटिश साम्राज्य से क्षुब्ध थे । अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किए गए अत्याचार उनके अंतर्मन को आंदोलित कर देते थे । महात्मा गाँधी के संपर्क में आने के पश्चात् उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में कूदने कर दृढ़ निश्चय किया । पं0 नेहरू  के पिता श्री मोतीलाल नेहरू पुत्र के स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने के विचारों से सहमत नहीं थे, अतः उन्होंने गाँधी जी से बात करी । गाँधी जी ने नेहरू जी को पिता की इच्छा अनुसार चलने सलाह दी । परंतु देश के प्रति प्रेम उन्हें अधिक दिनों तक बाँधे न रख सका । इसके पश्चात उन्होंने वकालत छोड़ दी और राजनीति में पुरी तरह सक्रिय हो गए । गाँधी जी द्वारा ‘ असहोयग आंदोलन ’ में उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया । अंग्रेजी सरकार ने उन्हें अनेकों बार जेल भेजा परंतु वे इससे विचलित नहीं हुए ।

                नेहरू जी, गाँधी जी को विशेष प्रिय थे । वे कई बार कांग्रेस के अध्यक्ष मनोनीत किए गए । स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत वे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने । उनके प्रधानमंत्रित्व काल में देश ने सभी क्षेत्रों में प्रगति की । उन्होंने देश की खस्ताहाल आर्थिक दशा को नियंत्रित किया । राष्ट्र की सीमाओं की सुरक्षा हेतु विशेष प्रबंध करवाए । उन्होंने औद्योगिक विकास हेतु नई-नई योजनाएँ प्रारंभ कीं । उनके कुशल नेतृत्व की सराहना आज भी की जाती है । इन्हीं कारणों से उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता भी कहा जाता है । ‘आराम हराम है’ का प्रसिद्ध नारा नेहरू जी का ही दिया हुआ है ।

                नेहरू जी एक कुशल राजनीतिज्ञ के साथ ही एक अच्छे लेखक एवं वक्ता भी थे । उनकी लिखी हुई अनेक पुस्तकें आज भी प्रचलित है । अपनी जेल यात्रा के दौरान उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘ मेरी कहानी ’ लिखी जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों का सटीक वर्णन है । उन्हें फूलों से बहुत लगाव था । विशेषकर गुलाब के फूल उन्हें बहुत प्रिय थें । बच्चों से तो वह बहुत प्यार करते थे तभी बच्चे उन्हें प्यार से चाचा नेहरू के नाम से संबोधित करते थे ।

                1962 ई0 में हुए भारत पर चीन के आक्रमण को उनके कुशल नेतृत्व में विफल कर दिया गया । परंतु इसके दो वर्ष पश्चात् ही सन् 1964 ई0 में 27  मई को उनका निधन हो गया ।

                पं0 जवाहर लाल नेहरू एक आदर्श नेता, सच्चे देशभक्त तथा विद्वान पुरूष थे । उन्होने तन-मन-धन को देश की सेवा के लिए समर्पित कर दिया । वे सदैव इसी प्रयास में रहते थे कि किस प्रकार देश को प्रगति की दिशा में ले जाया जाए । देश को स्वतंत्र कराने में उनका योगदान जितना महत्वपूर्ण था उतना ही योगदान आधुनिक भारत के निर्माण में था । राष्ट्र के प्रति उनके अतुलनीय योगदान के लिए हमारा देश सदैव उनका ऋणी रहेगा ।

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