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Hindi Essay on “Holi ” , ” होली” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

निबंध नंबर : 01 

होली

होली रंगो का त्यौहार है | यह त्यौहार बसन्त ऋतु के आगमन का संदेश वाहक है | इसके आगमन पर सभी प्राणी तथा यहा तक कि प्रकृति भी आनन्द तथा उमंग से इठला उठते है | हिन्दू लोग इसे हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को बड़ी धूमधाम से मनाते है | यह त्यौहोर एकता , मिलन तथा पवित्र प्रेम का प्रतीक है |

इस त्यौहार को किसान लोग बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाते है | इन दिनों किसानो की वर्ष भर के परिश्रम से उगाई गई फसल पक कर तैयार होती है | वे अपने फसल को लहराती हुई देखकर फुले नही समाते है | सभी किसान मिलकर नाचते गाते है | इस दिन सभी लोग रात को नए अनाज की बालो को होली की आग में भुनकर उसके दानो को सब में बांटते है तथा आपसी बैर-भाव को भुलाकर एक दुसरे से गले मिलते है | सध्या समय महिलाए और बच्चे होली का पूजन करते है |

होली से सम्बन्धित एक कथा बहुत प्रचलित है | दैत्यराज हिरण्यक्श्यपु का पुत्र प्रह्राद भगवान का परम भक्त था | परन्तु पिता हिरण्यक्श्यपु नास्तिक था | पिता ने पुत्र को भगवान का नाम लेने से कई बार मना किया परन्तु प्रह्राद नही माना | पिता ने पुत्र को अनेक प्रकार की यातनाएँ दी | यहाँ तक की उसे जान से मरवा डालने की कोशिश भी की परन्तु ईश्वर भक्त प्रह्राद अपने पथ से विचलित नही हुआ | अन्त में हिरण्यक्श्यपु ने उसे अपनी बहन होलिका की गोद में बिठाकर आग लगा दी | होलिका को वरदान था कि वह आग में नही जल सकती है परन्तु परिणाम उल्टा हुआ | होलिका जलकर राख हो गई जबकि प्रह्राद का बाल भी बांका नही हुआ | अंत: होली को अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है | और तभी से इस घटना की याद में रात को होली जलाई जाती है |

होली का अगला दिन दुल्हैडी का होता है | इस दिन लगभग दोपहर के दो बजे तक रंग तथा गुलाल से होली खेली जाता है | इस होली के रंग गुलाल के स्थान पर बच्चे, युवा और वृद्ध नर –नारी सभी भाग लेते है | कुछ लोग गुलाल के स्थान पर चन्दन का टीका लगाते है तथा आपस में गले मिलते है | गली – मुहल्लों तथा सड़को पर अनेक टोलिया नाचती – गाती दिखाई पडती है ब्रज की होली बहुत प्रसिद्ध है | इस दिन लोग पकवान बनाते है तथा दुसरे लोगो को मिष्ठान आदि खिलाते है होली के दिन कुछ लोग हो भांग आदि का भी सेवन करते है |

 

निबंध नंबर – 02 

 

होली है

होली का पुनीत पर्व सर्वश्रेष्ट ऋतु बसंत में मनाया जाता है। इस पर्व का हिंदी कवियों ने विस्तृत वर्णन किया है। कवियों की होली जन-साधारण जैसी हुल्लड़बाजी की होली नहीं है। उन्होंने आत्माभिव्यक्ति एंव अपने युग के आहान को भी होली-कविता में व्यक्त किया है। अतएव हिंदी कविता में हाली का वार्णन विविध रूपों से हुआ है।

जन-साधारण तो होली रंग, गुलाल, केसर, कीचड़ आदि से खेलकर अपने-अपने घर आ जाते हैं ओर बहुत ही हुआ तो वह होलिका की जान लेते हैं। शाम को इधर-उधर घूमने निकल जाते हैं। यह तो रही होली के ऊपरी व्यवहार की बात। परंतु कवियों की होली केवल भावना का रंग लिए, भाषा रूपी पिचकारी से पाठक-हृदय को रंग डालती है। होली में अनुराग लाल रंग हृदय पर पढ़ जाता है।

वस्तुत: होली का महत्व कोई साधरण नहीं वरन असाधारण है। इसका अर्थ यह है कि इस दिन मानव अपनी आत्मा पर जमें कल्मष एंव द्रोह, द्वेष आदि गहन तिमिर की कालिमा को धोकर अनुराग का रंग आत्मा पर चढ़ाता है। यदि सब मनुष्यों का हृदय अनुराग के रंग से रंग जाए तो किसी प्रकार का कोई द्वेष-भाव नहीं रहे और मानव का जीवन नि:स्पन शांत रूपी ज्योत्सना के वातावरण में स्वस्थ और प्रफुल्लित रहे। तब मनुष्य सबको भाई-भाई समझे और ‘वसुधैव कटुंबकम’ का महामंत्र वास्तव में जग-जीवन में अनुभव करे।

वह दृश्य कितना रमणीक, अनुपम और मनोमुज्धकारी हो, यह तो कल्पना से भी दूर की बात आज प्रतीत होती है। हां, कविगण तो अवश्य ही इस महामंत्र से प्रभावित हुए दिाते हैं। वह भी कभी-कभी परिस्थितियों के चक्कर में पड्कर डगमगाते दृष्टिगोचर होते हैं। इतनी तो कवियों से आशा की जा सकती है कि वह एक न एक दिन अवश्य ही संसृति के कण-कण को अनुराग के रंग में रंग देंगे और इस मत्र्य को अमत्र्य बना देेंगे।

कवियों के भक्त वत्सल हृदय ने इस होली को बड़े पुनीत एंव सुंदर ढंग से अपने नायक एंव नायिकाओं की आपस में होली खिलाकर व्यक्त किया है। सूर का निष्कट, निष्पाप एंव छल-रहित ह्दय तभी गा उठता है।

स्याम-स्यामा खेलत दोड़ होरी।

फागु मच्यौं अति ब्रज की खोरी।।

यह नहीं मीरा तो गिरधर की प्रेमिका बनी हुई है। वह तो बिना मोर-मुकुट-मुरलीधर के किसी के साथ होली नहीं खेल सकती। विरहिणी होने के कारण यह सब होली का सुख-दुख में बदल जाता है। तब ही मीरा का विरही हृदय गा उठता है-

होली पिया बिना मोहिन भावै, घर आगण न सुहावै

दीपक जोय कहा करूंग होली, पिय परदेश रहायै।

सूने सेज जहर ज्यां लागे, सुसक-सुसक जिय जावै।।

भक्त कवयित्री प्रताप कुंवरि बाई अपने ज्ञान एंव वैराज्य की उच्च भावनओं को होली-वर्णन में व्क्त करती है। यह निर्माण संप्रदाय की है। इन्होंने अपने इस बैरागी हृदय को निम्र चरण में बड़े सुंदर ढंग से प्रकट किया है।

होरि या रंग खेलत आओ।

इड़ला प्रिड़ला सुखमणि नारी ता संग खेल खिलाओ

सुरत पिचाकारी चलाओ।

कायो रंग जगत को छोड़ो, सांची रंग लगाओ।

बाहर भूल कबों मत जावों, काया नगर बसायो।

तब गिरभै पद पाआ।

पांयो उलट धरै धर भीतर अनहदनाव बजाओ

सब बगवाद दूर तक दीर्ज, जान गीत नित गाओ

पिया के मन तब ही भायो।

आपका भक्त हृदय अपने दृष्ट से ही होली खेलता है। आपका कच्चे रंग की आवश्यकता नहीं वरन ज्ञान के गुलाल से होली खेलती है। अनायास ही कवियित्री का हृदय गा उठता है।

होरी खेलन की रुत भारी

नर-तन पाया अरे भज हरि को मास एक दिन चारी

अरे अब तो चेन अनारी।

ज्ञान गुलाल अबीर प्रेम करि, प्रीत मयी पिचाकारी

लाल उसास राम रंग भर-भर सूरत सरीरी नारी

खेल इन संग रचारी

रीतिकालीन कवियों में श्रंगारिक भावना प्रेम का बहुत प्रचार हुआ। इनके नायम-नायिका अनेक प्रकार के हो गए तथा सामान्य जन भी नायक-नायिका हो गए। इनके श्रंगार में मांरूल प्रेम की झलक अधिकांश में देखने को मिलती है। अधिकतर इस काल के कवियों के लिए किसी वस्तु का वर्णन करना हो तो किस-किस वस्तु की आवश्यकता होगी, उस सब सामग्री को इकट्ठ कर कविता होने लगी थी। इस काल में कवि बस इतना ही जानते थे कि राजा को प्रसन्न कर अच्छा इनाम पांए। अनेक कवियों ने इस उक्ति को कि कवि पैदा होता है, बनाया नहीं जाता को गलत करने का बीड़ा उठा लिया था। इसका कारण यह था कि उन्होंने संस्कृत के एक ग्रंथ ‘कवि कपर्टिका’ को कंटस्थ कर लिया था। इस ग्रंथकार की प्रतिज्ञा है कि –

यत्नादिमां कंडगतां विधाय,

श्रुतोपदेशात विदितोपदेश:।

अज्ञात शब्दार्थ विनिश्चयोज्यि:

श्लोक करोत्येव समासु शीघ्रम।।

रसखान किस से कम है। वह भी पूर्व रसिक है। वह आनंद धन के होली वर्णन की छटा को भी फीका करने का दावा करते हुए कहते हैं कि-

खेलत फाग सहागभरी अनुरागहि लालिन कौंधरि के।

भारत कुकुंभ केसरि के पिचारिन में रंग को भरि के।।

गेरत लाल गुलाल लली मनमोहिनि मौज लुटा करके।

जात चली रसखान अली मदस्त मनी मन की हरि के।।

हिंदी साहित्य में महिला कवियों ने भी बहुत कुछ दिया है। रसिक बिहारी भी एक अच्छी कवयित्री हुई हैं। आपको बनी ठनी जी भी कहा जाता है। आपने ब्रज की होली का वर्णन कितनी निपुणता से किया है। उसका एक उदहारण नीचे प्रस्तुत है-

होरी-होरी कहि बोले सब ब्रज की नारि।

नंद गांव बरसानों हिल मिलि गावत इतउत रसकी गरि

उड़त गुलाल अरुण भयो अंबर खेलत रंग पिचकारि धारि।

रसिक बिहारी भानु दुलारी नायक संग खेलैं खिलवारि।।

जब भारत स्वतंत्र हुआ तो फिर कवियों को कुछ सोचने के लिए विश्राम प्राप्त हुआ। पर वह विश्राम आर्थिक समस्या को सुलझाने में लगा। पर कुछ ऐसे कवि थे जो अपना महाकाव्य लिखने में मस्त हो गए और कुछ रोमांटिक भावना का अनुकरण कने लगे तथा कुछ नई धाराओ की ओर झुक गए। फिर भी, कवियों ने निरंतर होली के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना का परिचय दिया।

 

निबंध नंबर : 03

 

होली

त्यौहारों के देश भारत में हर त्योहार का अपना अलग ही रंग और मस्ती है। उनमें रंगों का और मौज-मस्ती का त्योहार होली वास्तव में अपना सबसे अलग आनंद और महत्व रखता है। यों तो इस त्योहार के साथ एक पौराणिक कहानी भी जुड़ी है, पर वास्तव में यह ऋतु और मौसम संबंधी उत्सव या पर्व ही है। कुछ प्रांतों में इसे फाग या फगुआ भी कहा जाता है। फाल्गुन मास में मनाए जाने के कारण ही इस त्योहार के ये नाम पड़े स्वीकारे जाते हैं। ये नाम भी इसके ऋतु-संबंधी त्योहार होने की ओर ही संकेत करते हैं। फाल्गुन मास के आरंभ होते ही प्रकृति पर वसंत उतर जाता है। ऋतुराज वसंत अपने विविध रंग-रूपों के लिए विख्यात है। वह पतझड़ के बाद नए विकास, आनंद और उन्माद का संदेश लेकर आया करता है। चारों ओर का प्राकृतिक वातावरण नए-नए, रंग-बिरंगे फूलों और उनकी महक से भर जाता हैह्व। उसे देख नवयुवकों के ही नहीं, बाल-वृद्धों के मन भी मस्ती से झूम उठते हैं। यह मस्ती ही होली के रूप में अनेक प्रकार के रंग-गुलाल से एक-दूसरे को रंग डालने, एक-दूसरे के गले मिलने, खाने-खिलाने के रूप में प्रगट हुआ करती है। मुख्यत-इसी कारण होली को ऋतु और मौसम का त्योहार माना जाता है। यह मान्यता बहुमान्य तो है ही, उचित भी प्रतीत होती है।

होली को फसल का त्योहार भी स्वीकार जाता है। इस मौसम के आते-आते खेतों में एक ओर जहां सरसों पीली पडक़र फूल-महक उठती है, वहां चने की फसल भी प्राय: पककर तैयार हो जाती है। लोग पके हुए पर हरे चने की बालियों सहित पौधे उखाडक़र उन्हें आग में भूनते हैं। इस प्रकार भुने हुए चने की बालियों ‘होलां’ या ‘होरां’ कही जाती हैं। लोग बड़े चाव से देहात में उन्हें आपस में बांट कर खाते हैं। चने की फसल पककर तैयार हो जाने, उस पर रंग-बिरंगा बासंती मौसम होने पर झूमते-गाते लोग रंग-गुलाल लुटाकर होली का त्योहार मनाते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि होली वास्तव में ऋतु और फसल का त्योहार ही है।

दूसरी ओर होली मनाने के मूल में धार्मिक कारण भी माना जाता है। पौराणिक कहानी के अनुसार हिरण्यकश्यपु नामक एक असुर राजा था। उसका राज्य मुल्ता तथा आसपास के इलाके में था। उसके बेटे का नाम था प्रह्लाद। वह अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध राम-नाम की भजन-भक्ति किया करता था। पिता के चाहने और अनेक कष्ट देने पर भी प्रह्लाद ने जब राम-नाम का भजन नहीं छोड़ा, तो हिरण्यकश्यपु ने उसे जलाकर मार डालने का निश्चय किया । उसने आग से न जलने का वरदान-प्राप्त अपनी होलिका नाम बहन को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए। उस ने ऐसा ही किया। परंतु भगवान की लीला, होलिका स्वंय जलकर राख हो गई, जबकि प्रह्लाद हंसता-खेलता बच गया। कहा जाता है कि तभी से लोग आसुरी शक्ति पर दैवी-शक्ति की विजय की याद में यह त्योहार रंग-गुलाल खेलते, खाते-पीते और गले मिलकर आनंद प्रगठ करते हैं। इससे उनकी धार्मिक और ऋतु-फसल संबंधी सभी प्रकार की धारणांए पूर्ण हो जाती हैं।

जो भी कारण हो, इतना स्पष्ट है कि होली आनंद-मंगल का त्योहार है और प्राय: सारे देश में किसी-न-किसी रूप में अवश्यक मनाया जाता है। किंतु अब कुछ दुष्प्रवृत्तियों वाले लोगों के कारण, कुछ जीवन-व्यवहार और दृष्टिकोण बदल जाने के कारण, अनेकविध अभावों और महंगाई के कारण होली का रंग-रूप फीका पड़ता जा रहा है। कई बार अनिच्छित लोगों पर रंग डालने के कारण दंगे तक भडक़ उठते हैं। कुछ लोग होली के नाम पर अश्लील हरकतें, धींगा-मुश्ती और मनमानी भी करने लगते हैं। लड़कियों पर रंग-भरे गुब्बारे मारकर छेड़छाड़ और शरारतें की जाती हैं। रंगों के नाम पर कीचड़ तथा विषैले तत्वों का प्रयोग भी किया जाता है। परिणामस्वरूप कई बार लोगों का अंग-भंग हो जाता है। इस प्रकार की बुराइयों की रोकथाम करके ही होली की पवित्रता और वास्तविक महत्व बनाए रखा जा सकता है। भांग-शराब पीना और हुड़दंग मचाना होली जैसे सांस्कृतिक पर्व का महत्व स्वत: ही घटा देता है। इन बुराइयों के कारण ही अधिकांश लोग अब होली के अवसर पर घरों में बंद रहना ही उचित समझते हैं। वातावरण और परिस्थितियों को देखते हुए उनका ऐस सोचना-करना अनुचित नहीं कहा जा सकता।

गंभीरता से विचार करके कहा जा सकता है कि होी वास्तव में मानव-मन की विविध और पवित्र, रंग-बिरंगी उमंगों का परिचय देने वाला त्योहार है। यह दिन सभी प्रकार के बैर-विरोध भुलाकर एक ही रंग में रंग जाने का संदेश देता है। अत: इसी रूप से इसे मनाकर ही हम इसके वास्तविक महत्व और स्वरूप को बनाए रख सकते हैं। गाना-बजाना, नाचना-कूदना, मिष्ठान खाना-पीना और हल्के एंव उचित रंग गुलाल का प्रयोग कर मन का उल्लास प्रकट करना ही वास्तविक होली है। वह सब नहीं, जो आज होकर इस सुंदर और पवित्र त्योहार को कुरूप और अपवित्र बना रहा है। इसकी सुंदरता और पवित्रता बनाए रखना हम सबका कर्तव्य है। सदभावनापूर्वक प्रयत्न करके ही इसे तथा इसके माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखा जा सकता है।

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commentscomments

  1. Anshika Goyal says:

    Very good matter u have take

  2. Urvashi kanwer says:

    it is very nice and very easy essay i like it …
    Please
    Send Vasant Panchami essay …. Also ..
    Tnq

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