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Posts tagged "Hindi Essay" (Page 135)
स्वास्थ्य ही सम्पत्ति है Swasthya hi Sampatti hai प्रसिद्ध कहावत है कि अगर मनुष्य की धन-सम्पत्ति नष्ट हो जाए, तो समझो कुछ भी नष्ट नहीं हुआ या फिर कोई बड़ी बात नहीं। एक स्वस्थ व्यक्ति लगातार परिश्रम सम्पत्ति दुबारा कमा और बना सकता है। लेकिन अगर उस का स्वास्थ्य ही रण नष्ट हो गया, तो समझो कि सभी कुछ गया, नष्ट हो गया। क्योंकि उस का अवस्था में व्यक्ति कुछ...
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November 11, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), Languages3 Comments
अपनी करनी पार उतरनी Apni karni Paar Utarni आज क्या, किसी भी युग में व्यक्ति का अपना कर्म ही सब से बढ़कर उसका विश्वसनीय सहायक रहा और हमेशा रहेगा भी। आज के युग में तो अपने कर्म पर और भी भरोसा इस कारण आवश्यक है कि आज हर व्यक्ति केवल अपने लिए जी रहा है। उसे दूसरों के जीने-मरने की कतई कोई चिन्ता नहीं। वैसे भी जमाना आत्मविश्वासी और स्वावलम्बी...
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November 11, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
पानी केरा बुदबुदा अस मानुष की जात Pani kera Budbuda as Manush ki Jaat संसार की प्रत्येक वस्तु, यहाँ तक कि उन वस्तुओं को बनाने और उपयोग करने वाला सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य भी हमेशा रहने वाला नहीं। देखने में जो कुछ भी सुन्दर और स्थायी लगता है, मन को आकर्षित करता है, अच्छे-बुरे कर्म करके उसे पा लेने की मन को प्रेरणा दिया करता है; वह सब भी नाशवान...
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November 11, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा Jaisa Karam Karoge Wesa Phal Milega जिस प्रकार चन्दन जैसा जड़ भूरुह अपनी शीतलता के स्वभाव को नहीं त्यागता। उसी प्रकार हमें भी अपनी कल्याणकारी महान् प्रवृत्ति का त्याग नहीं करना चाहिए और हमारे प्रति भले ही कोई व्यक्ति दुर्व्यवहार करे; किन्तु हमें उसके साथ भी सद्व्यवहार ही करना चाहिये, यही इस सूक्ति की सीख है। फलतः जो व्यक्ति दूसरों के प्रति दुर्व्यवहार करता...
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November 11, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
हानि-लाभ, जीवन-मरण विधि हाथ Hani Labh, Jeevan Maran Vidhi Hath इस वैज्ञानिक युग का मानव हृदय प्रधान नहीं अपितु बुद्धि प्रधान है। वह प्रत्येक कार्य को अपने बुद्धि कौशल के द्वारा पूर्ण करना चाहता है। आज वह चन्द्रलोक में सुख-वैभव के उपभोग के स्वप्न देख रहा है। आज वह प्रत्येक कार्य को अपने अधीन मानता है। इस काव्योक्ति के अनुसार किसी भी कर्म को करने के पश्चात् उस कार्य के...
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November 11, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
मनुष्य वही है जो मनुष्य के लिए मरे Manushya wahi hai jo Manushya ke liye Mare निबंध संख्या:- 01 मानव एक सामाजिक प्राणी है। वास्तव में मानवों के संगठन का ही नाम समाज है। आपस में संगठित होने के कारण मानवों में परस्पर सम्बन्ध एवं सम्पर्क भी है। यह पारस्परिक सहयोग एवं प्रेम की धारणा परोपकार के अन्तर्गत मानी जाती है। इस काव्योक्ति का तात्पर्य है कि जो मानव दूसरों के...
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November 11, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
धीरज धर्म मित्र अरु नारी Dheeraj Dharam Mitra Aru Nari यह काव्योक्ति रामचरितमानस से उद्धृत है। इन शब्दों में बहुत बड़ा सार, गम्भीरता एवं अर्थगौरव है। वैसे तो सभी अपने बनते हैं; परन्तु वास्तव में आपत्ति के दिनों ही में धैर्य, मित्र और नारी की परीक्षा होती है। धीर तो वही हैं जो गरजती हुई आपत्ति-घटायें गिरने पर भी विचलित न हों। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को राज्य सिंहासन के स्थान...
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November 11, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
सब दिन जात न एक समाना Sab Din Jaat na Ek Saman समय परिवर्तनशील है, यह कठोर सत्य है। समय हमेशा एकसा नहीं रहता। इसके सहस्रों उदाहरण वर्तमान हैं। समय-समय पर समाज में अनेक प्रकार के परिवर्तन हए। ये परिवर्तन ही इस उक्ति के द्योतक हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि ‘मन दिन जात न एक समाना’ । उदाहरणताः भारत का वैभव सूर्य कभी विश्व-गगन में पूर्ण तेज...
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November 11, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment