Nari Aur Naukari “नारी और नौकरी” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
नारी और नौकरी
Nari Aur Naukari
वर्तमान युग अर्थ-प्रधान है। भौतिकवादी विचारधारा के विकास के साथ-साथ यह विचार विकसित हुआ कि जीवन का वास्तविक सुख अधिकाधिक उपभोग में है। सुख का आधार है अधिक-से-अधिक वस्तुओं, पदार्थों का उपभोग। इच्छाओं की पूर्ति के लिए अधिक परिश्रम करके, अधिक धन कमाकर सुखी हुआ जा सकता है, यही आज के युग का मूल मन्त्र है। जो व्यक्ति आज भी इच्छाओं को कम करने, संयम से रहने की वकालत करता है उसे आज पुरातनपंथी, पिछड़ा हुआ माना जा सकता है। आज सुखी जीवन का पर्याय है सुन्दर बड़ा-सा घर, नौकर-चाकर, प्रत्येक कमरे में टी०वी०, पंखा, एयर-कन्डीशनर, फ्रिज, संलग्न बाथ-रूम, स्टीरियो सिस्टम आदि। अब घर में प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए कार चाहता है। सप्ताहांत में रेस्तरां में भोजन, सैर-सपाटा और मौज-मस्ती यही आज के सुखी जीवन के आधार हैं।
निश्चय ही इन सबके लिए पैसा चाहिए। मध्यम वर्ग भी इन सारी वस्तुओं और सुविधाओं को पाने के लिए लालायित रहता है इसलिए घर की महिलाओं को नौकरी करके पैसा कमाना पड़ता है। अब आमतौर पर कहा जाता है कि एक आदमी की आय से घर नहीं चल सकता। सुखी, समृद्ध जीवन के लिए पत्नी का काम करना आवश्यक हो गया है।
आज की आधुनिक शिक्षित नारी नौकरी किसी विवशता से ही करती हो, ऐसा नहीं है। बड़े-बड़े अधिकारियों यहां तक कि राजनेताओं की पत्नियां नौकरी कर रही हैं. व्यावसायिक परिवारों की महिलाएं नौकरी कर रही हैं क्योंकि नौकरी उनके लिए अपनी स्वतन्त्रता को स्थापित करने का माध्यम है, अपने स्व को, अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने का साधन है। नौकरी करके वे सिद्ध करना चाहती हैं कि वे समाज में उपयोगी काम करके अपनी आजीविका कमा सकती है। मध्यम वर्ग की नारी पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रायः नौकरी करती है। आर्थिक आत्म-निर्भरता प्रायः उसके व्यक्तित्व के विकास में साधक बनती है उसमें आत्मविश्वास पैदा करती है। निम्न वर्ग की महिलाएं तो सदा से खेत खलियान में, मिल कारखानों में, सड़क पर रोड़ी कूटते हुए अथवा मजदूरी करते हुए देखी जा सकती है। उनके लिए आजीविका जीने के लिए साधन जुटाने का माध्यम है।
समाज में परिवर्तन की सूचना मध्यम वर्ग में आ रहे परिवर्तनों से ही मिलती है। आज भारत में मध्यम वर्ग नारी की नौकरी को एक तथ्य के रूप में स्वीकार कर चुका है और प्रत्येक परिवार अपनी बेटियों, बहुओं को नौकरी के लिए प्रोत्साहित करता है। आज नौकरी करना नारी के लिए गौरव एवं सम्मान का सूचक है, निन्दा अथवा अपमान का कारण नहीं नौकरी करने वाली युवतियों को अच्छे वर अच्छा घर-बार मिलने में सुविधा रहती है और प्रायः दहेज भी कम देना पड़ता है। महिलाओं की नौकरी को आज सामाजिक स्वीकृति पूरी तरह मिल चुकी है।
नौकरी करके महिलाएं जहां अपने अहम् की तुष्टि करती है वहीं पर पुरुष की दासता के लौहपाश से मुक्ति पाने का अनुभव भी करती हैं। अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अब उसे पति-परमेश्वर के आगे हाथ नहीं पसारने पड़ते। नौकरी करने वाली महिला अपने बच्चों से भी अधिक सम्मान पाती है क्योंकि वे बच्चों की शिक्षा में सहायक होती है और उनकी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम होती है।
नौकरी करने वाली महिलाएं केवल धन ही नहीं कमाती, उनके व्यक्तित्व का भी विकास होता है। नौकरी करते समय ये अनेक लोगों के सम्पर्क में आती हैं और नई बातें सोखती हैं। नौकरी की आवश्यकतानुसार नए कौशल सीखने का अवसर उन्हें मिलता है। उनकी चेतना का निरंतर विकास होता है। उसे लगता है कि वह सामाजिक संघर्ष में अधिक उपयोगी भूमिका निभा सकती हैं। आधुनिक समाज में महिलाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि वे सभी प्रकार के कार्य पूरी कुशलता से कर सकती है। भारत के अन्तरिक्ष कार्यक्रम की बात हो अथवा आणविक शस्त्रास्त्रों का अनुसन्धान, प्रयोग शालाओं में महिला वैज्ञानिक मौजूद है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में डॉक्टरों, परिचारिकाओं (नर्सों) के रूप में नहीं, औषध निर्माण और औषध विक्रम तक का काम महिलाएं करती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में महिला अध्यापिकाओं का वर्चस्व स्वीकार किया जाने लगा है। सेना के विभिन्न विभागों में महिलाएं आगे आ रही हैं और पुलिस विभाग में किरण बेदी जैसी महिलाएं अपना सिक्का मनवा चुकी हैं। बस कण्डक्टर से लेकर ऑटो रिक्शा चालक तक महिलाएं, राष्ट्र को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। है। जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं दिखता जहां महिलाएं अपना लोहा नहीं मनवा रहीं। नारियों का नौकरी करना, नारी के नौकरी करने से परिवारों का परम्परागत स्वरूप बदलना आवश्यक है। घर के कामकाज में पुरुष और बच्चों को सहयोग देना होगा। बच्चों को अधिक आत्म-निर्भर और जिम्मेदार बनकर अपनी देखभाल स्वयं करना सीखना होगा। यह कहना कि कामकाजी महिलाओं के बच्चे उपेक्षित रहते हैं ठीक नहीं। प्रायः देखा गया है कि घर में रहने वाली महिलाएं किटी पार्टियों या फिर घर के पालतू कामों अथवा निन्दा-चुगली में इतनी लीन रहती हैं कि बच्चों की ओर ध्यान ही नहीं देतीं। प्रायः उनको अपनी चेतना कुंठित हो जाती है और वे बच्चों को प्रेरित करने में असफल रहती हैं। जिन परिवारों में पुरुष अपनी सोच नहीं बदल पाते और महिलाओं को दासी मानते हैं वहां प्रायः कलह रहती है। ससुर फिजूलखर्ची करार देने लगते हैं जो अनुचित है। कामकाजी महिलाओं को प्रायः घर के कामकाज में सहायता के लिए नौकर, नौकरानी रखनी पड़ती है जिसे प्राय: सास- नारी की नौकरी आज मात्र फैशन नहीं, आवश्यकता है। इससे पारिवारिक जीवन में कुछ बाधाएं आती हैं परन्तु उनके कारण नारी को नौकरी छोड़ने की सलाह नहीं दी जा सकती। चावल में यदि कंकर हों तो उन्हें निकाल कर चावल पका कर खाते हैं न कि कंकरों के कारण चावल फेंक देते हैं।






















