Meri Priya Pustak “मेरी प्रिय पुस्तक” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
मेरी प्रिय पुस्तक
Meri Priya Pustak
भूमिका, प्रिय पुस्तक, प्रिय लगने के कारण, पुस्तक की विशेषताएँ, उपसंहार
महात्मा गांधी में राम-राज्य स्थापित करने की उच्च भावना जगाने वाली प्रेरणा शक्ति रामचरितमानस, मेरी सर्वप्रिय पुस्तक है। यह पुस्तक महाकवि तुलसी दास का अमर स्मारक है । तुलसीदास ही क्यों, वास्तव में इससे हिंदी साहित्य समृद्ध होकर समस्त जगत् को आलोक दे रहा है। इसकी श्रेष्ठता का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि यह कृति संसार की प्रायः सभी समृद्ध भाषाओं में अनुदित हो चुकी है।
रामचरितमानस, मानव जीवन के लिए अमूल्य निधि है । पत्नी का पति के प्रति, भाई का भाई के प्रति, बहू का सास- ससुर के प्रति, पुत्र का माता-पिता के प्रति क्या कर्त्तव्य होना चाहिए आदि इस कृति का मूल संदेश है। इसके अतिरिक्त साहित्यिक दृष्टि से यह कृति हिंदी साहित्य उपवन का वह कुसुमित फूल है, जिसे सूंघते ही तन-मन में एक अनोखी सुगंधि का संचार हो जाता है । यह ग्रंथ दोहा – चौपाई में लिखा महाकाव्य है ।
ग्रंथ में सात कांड हैं जो इस प्रकार हैं – बाल – कांड, अयोध्या-कांड, अरण्य-कांड, किष्किंधा – कांड, सुंदर-कांड, लंका-कांड तथा उत्तर- कांड । हर कांड भाषा, भाव आदि की दृष्टि से पुष्ट और उत्कृष्ट है और हर कांड के आरंभ में संस्कृत के श्लोक हैं । तत्पश्चात् कला फलागम की ओर बढ़ती है ।
यह ग्रंथ अवधी भाषा में और दोहा – चौपाई में लिखा हुआ है। इसकी भाषा में प्रांजलता के साथ-साथ प्रवाह तथा सजीवता दोनों हैं। इसमें अलंकार स्वाभाविक रूप में आने के कारण सौंदर्य प्रदत्त है । उनके कारण कथा का प्रवाह रुकता नहीं, स्वच्छंद रूप से बहता चला जाता है । इसमें रूपक तथा अनुप्रास अलंकार मुख्य रूप में मिलते हैं । इसके मुख्य छंद हैं दोहा और चौपाई । शैली वर्णनात्मकं होकर भी बीच-बीच में मार्मिक व्यंजना शक्ति लिए हुए है।
इसमें प्रायः समस्त रसों का यथास्थान समावेश है। वीभत्स रस लंका में उभर कर आया है । चरित्रों का चित्रण जितना प्रभावशाली तथा सफल इसमें हुआ है उतना हिंदी के अन्य किसी महाकाव्य में नहीं हुआ । राम, सीता, लक्ष्मण, रावण, दशरथ, भरत आदि के चरित्र विशेषकर उल्लेखनीय तथा प्रशंसनीय हैं ।
इस पुस्तक के पढ़ने से प्रतिदिन की पारिवारिक, सामाजिक आदि समस्याओं को दूर करने की प्रेरणा मिलती है। परलोक के साथ-साथ इस लोक में कल्याण का मार्ग दिखाई देता है और मन में शांति का सागर उमड़ पड़ता है। बार- बार पड़ने को मन चाहता है ।
रामचरितमानस हमारे सामने समन्वय का दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है । इसमें भक्ति और ज्ञान का, शैवों और वैष्णवों का तथा निराकार और साकार का समन्वय मिलता है । गोस्वामी तुलसीदास ज्ञान और भक्ति में कोई भेद नहीं मानते । रामचरितमानस में नीति, धर्म का उपदेश जिस रूप में दिया गया है वह वास्तव में प्रशंसनीय है । ” राम-भक्ति का इतना विराट तथा प्रभावी निरूपण और राम-कथा का इतना सरस तथा धार्मिक कीर्तन किसी और जगह मिलना अति दुर्लभ है। इसमें जीवन के मार्मिक चित्र का विशद चित्रण किया गया है । जीवन के प्रत्येक रस का संचार किया है और लोक मंगल की उच्च भावना का समावेश भी किया गया है। यह वह पतित पावनी गंगा है जिसमें डुबकी लगाते ही सारा शरीर शुद्धमय हो उठता हो उठता है तथा एक मधुर रस का संचार होता है । सहृदय भक्तों के लिए यह दिव्य तथा अमर वाणी है।
उपर्युक्त विवेचन के अनुसार अंत में कह सकते हैं कि रामचरितमानस साहित्यिक तथा धार्मिक दृष्टि से उच्चकोटि की रचना है जो अपनी उच्चता तथा भव्यता की कहानी स्वयं कहती है । इसलिए मैं इसे अपनी प्रिय पुस्तक मानता हूँ ।






















