Mera Priya Lekhak “मेरा प्रिय लेखक” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
मेरा प्रिय लेखक
Mera Priya Lekhak
भूमिका, प्रिय लेखक, प्रिय लगने के कारण, परिचय, साहित्य, उपसंहार
हिंदी साहित्य को उन्नत बनाने में अनेक कलाकारों ने योगदान दिया है। प्रत्येक कलाकार का अपना महत्त्व है, पर प्रेमचंद जैसा असाधारण कलाकार किसी भी देश की बड़े सौभाग्य से मिलता है। यदि उन्हें भारत का गोकी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। प्रेमचंद के उपन्यासों में लोक जीवन के व्यापक चित्रण तथा सामाजिक समस्याओं के गहन विश्लेषण को देखकर कहा गया है कि प्रेमचंद के उपन्यास भारतीय जनजीवन के मुंह-बोलते चित्र हैं। इसी कारण मैं इन्हें अपना प्रिय लेखक मानता हूँ ।
मां भारती के इस आराधक का जन्म वाराणसी के निकट लमही ग्राम में सन् 1880 ई० में हुआ । घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए उनका बचपन संकटों में बीता । कठिनाई से बी०ए० किया और शिक्षा विभाग में नौकरी की किंतु उनकी स्वतंत्र विचारधारा आड़े आई । नवाब राय के नाम से उर्दू में लिखी ‘सोजे वतन’ पुस्तक अंग्रेज़ सरकार ने जब्त कर ली। इसके पश्चात् उन्होंने प्रेमचंद के नाम से लिखना शुरू किया।
प्रेमचंद ने एक दर्जन उच्चकोटि के उपन्यास और लगभग तीन सौ कहानियां लिखकर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनके उपन्यासों में गोदान, कर्म भूमि, ग़बन तथा सेवासदन आदि प्रसिद्ध हैं। कहानियों में पूस की रात तथा कफ़न अत्यंत मार्मिक हैं। उनकी सभी कहानियां जन-जीवन का मुंह बोलता चित्र प्रस्तुत करती हैं।
प्रेमचंद को आदर्शोन्मुख यथार्थवादी साहित्यकार कहा जाता है। साहित्य में अश्लीलता तथा नग्नता के वे विरोधी थे। वे मानते थे कि साहित्य समाज का चित्रण करता है किंतु साथ ही समाज के सामने एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत करता है जिसके सहारे लोग अपने चरित्र को ऊंचा उठा सकें। उनके उपन्यासों के अनेक पात्र जैसे-होरी, धनिया, सोफी, सुमन जालपा, निर्मला आज भी हमारे चारों ओर जीते-जागते पात्र लगते हैं। ग्रामीण जीवन का चित्रण करने में प्रेमचंद को विशेष सफलता प्राप्त हुई है।
प्रेमचंद की भाषा सरल तथा मुहावरेदार है। भारत में हिंदी का प्रचार करने में प्रेमचंद के उपन्यासों ने सब से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ऐसी भाषा अपनाई जिसे जनता बोलती और समझती थी। यही कारण है कि हिंदी में किसी अन्य लेखक के उपन्यास इतने अधिक नहीं बिके जितने प्रेमचंद के बिके हैं।
गोदान प्रेमचंद का ही नहीं, हिंदी का सर्वोत्तम उपन्यास माना जाता है। गोदान में कृषक जीवन का जो मर्मस्पर्शी चित्र अंकित किया गया है, वह आज भी हमारा दिल दहला देता है। सूद-खोर बनिये, जागीरदार, ढोंगी ब्राह्मण, सरकारी कर्मचारी सभी की कलई खोलकर प्रेमचंद ने अपने साहित्य को शोषित, निर्धन और दुःखी जनता का प्रवक्ता बना दिया।
यह खेद की बात है कि हिंदी का यह महान् सेवक जीवन भर आर्थिक संकटों में घिरा रहा। जीवन भर अथक परिश्रम के कारण स्वास्थ्य गिरने लगा और सन् 1936 में हिंदी के उपन्यास सम्राट् का देहांत हो गया। उनका साहित्य भारतीय जीवन का दर्पण है। उनके साहित्यिक आदर्श बड़ा मूल्य रखते हैं ।






















