Home » Languages » Hindi (Sr. Secondary) » Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Vidyarthi Aur Anishashan”, “विद्यार्थी और अनुशासन” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation Classes.

Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Vidyarthi Aur Anishashan”, “विद्यार्थी और अनुशासन” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation Classes.

विद्यार्थी और अनुशासन

Vidyarthi Aur Anishashan

                प्रासाद की चिरस्थिरता और उसकी दृढ़ता जिस प्रकार आधारशिला की मजबूती पर आधारित है, लघु पादपों का विशाल वृक्षत्व जिस प्रकार बाल्यावस्था के सिंचन और संरक्षण पर आश्रित होता है, उसी प्रकार युवक की सुख-शांति में समृद्धिशालिता का संसार छात्रावस्था  पर आधारित होता है। यह अवस्था नवीन वृक्ष की मृदु और कोमल शाखा है, जिसे अपनी मनचाही अवस्था में सरलता से मोड़ा जा सकता है और एक बार जिधर आप मोड़ देंगे, जीवन भर उधर ही रहेगी। अवस्था प्राप्त विशाल वृ़क्षों की शाखाएँ टूट भले ही जाएँ पर मुड़ती नहीं हैं क्योंकि समय अनुभव और जीवन के सुख-दुःख उन्हें कठोर बना देते हैं। अतः मानव जीवन की इस प्रारम्भिक अवस्था को सच्चरित्रता और सदाचारिता आदि उपायांे से सुरक्षित रखना प्रत्येक मनुष्य का परम कत्र्तव्य है।

                आज विद्यर्थियों की अनुशासनहीनता अपनी चरम सीमा पर है- क्या घर, क्या स्कूल, क्या बाजार, क्या मेले और क्या उत्सव, क्या गलियाँ और क्या सड़कें, आज का विद्यार्थी घर में माता-पिता की आज्ञा नहीं मानता, उनके सदुपदेशों का आदर नहीं करता, उनके बताए हुए मार्ग पर नहीं चलता। अनुशासनहीनता का मुख्य कारण माता-पिता की ढिलाई है। माता-पिता के संस्कार ही बच्चों पर पड़ते हैं। बच्चे की प्राथमिक पाठशाला घर होती है। वह पहले घर में ही शिक्षा लेता है, उसके बाद वह स्कूल और काॅलेज में जाता है, उसके संस्कार घर में ही खराब हो जाते हैं। पहले तो प्यार के कारण माता-पिता कुछ करते नहीं, पर जब हाथी के दाँत बाहर निकल आते हैं, तब उन्हें चिंता होती है, फिर वे अध्यापक और काॅलेजों की आलोचना करना आरम्भ कर देते हैं। दूसरा कारण आज की अपनी शिक्षा-प्रणाली है। इसमें नैतिक और चारित्रिक शिक्षा को कोई स्थान नहीं दिया गया है। पहले विद्यार्थियों को दंड का भय बना रहता था, क्योंकि ‘‘भय बिन होय न प्रीति’’, पर अब आप विद्यार्थियों को हाथ नहीं लगा सकते, क्योंकि शारीरिक दण्ड अवैध है। केवल जबानी जमाखर्च कर सकते हैं। इसमें विद्यार्थी बहुत तेज होता है, आप एक कहेंगे वह आपको चार सुनायेगा।

                शिक्षा-संस्थाओं का कुप्रबन्ध भी छात्रों को अनुशासनहीन बनाता है। परिणामस्वरूप  कभी वे विद्यालय के अधिकारियों की आज्ञाओं का उल्लंघन करते हैं और कभी अध्यापकों की अवज्ञा। अधिकांश कक्षा-भवन छोटे होते हैं और छात्रों की संख्या सीमा से भी अधिक होती है। काॅलेजों में तो एक-एक कक्षा में सौ-सौ विद्यार्थी होते हैं। ऐसी दशा में न अध्ययन होता है और न अध्यापन। कभी-कभी राजनैतिक तत्त्व विद्यार्थियों को भड़काकर काॅलेजों में उपद्रव करवा देते हैं। ‘‘खाली दिमाग शैतान का घर’’ वाली कहावत बिल्कुल ठीक है। काॅलेजों में छात्रों के दैनिक कार्य पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। यदि उनके रोजाना पढ़ने-लिखने की  देखभाल हो और उसी पर उनकी वार्षिक उन्नति आश्रित हो तो विद्यार्थी के पास इतना समय ही नहीं रहेगा कि वो  बेकार की बातों में अपना समय व्यतीत करें। दूसरी बात यह है कि कक्षाओं में छात्रों पर व्यक्तिगत ध्यान नहीं दिया जाता और न ही उनकी कार्यप्रणाली पर कोई नियंत्रण होता है।

                देश में अनुशासन की पुनः स्थापना करने के लिए यह आवश्यक है कि हमारी शिक्षाप्रणाली व्यवस्था में नैतिक और चारित्रिक शिक्षा पर विशेष बल होना चाहिए जिससे छात्र को अपने कर्तव्य और अकर्तव्य का ज्ञान हो जाए। नैतिक शिक्षा का समावेश हाईस्कूली पाठ्यक्रम में सब प्रदेशों में किया जा रहा है, यह बहुत ही सराहनीय प्रयास है। हमारी शिक्षा-प्रणाली में कक्षा एक से लेकर एम.ए. तक के विद्यार्थियों के नैतिक उत्थान की शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी, सिवाय इसके कि वे कबीर और रहीम के नीति दोहे पढ़ लें, वह भी परीक्षा में अर्थ लिखने की दृष्टि से। दूसरी बात यह है कि शारीरिक दंड का अधिकार होना चाहिए, क्यांेकि बालक तो माता-पिता की तरह गुरू के भय से ही अपने कर्तव्य का पालन करता है। तीसरी बात यह है कि माता-पिता को बचपन से ही अपने बच्चों के कार्याें पर कड़ी दृष्टि रखनी चाहिए, क्योंकि गुण और दोष संसर्ग से ही उत्पन्न होते हैं। हमारी शिक्षा पद्धति में भी परिवर्तन की आवश्यकता हैं माध्यमिक शिक्षा के छात्रों के लिए व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। जो विद्यार्थी काॅलेज की ऊँची शिक्षा प्राप्त करना नहीं चाहते उनके लिए उचित काम की व्यवस्था होनी चाहिए। तथा इन्हें संचालित करने की उचित शिक्षा देनी चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि  देश के विद्यार्थियों में अनुशासन स्थापित किए बिना देश का कल्याण नहीं हो सकता। देश के कल्याण का रास्ता विद्यार्थियों के अनुशासित होने मंे ही है। हमंे अपनी शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने होंगे, तभी आज का विद्यार्थी कल का सभ्य नागरिक बन सकेगा। देश के नागरिकों का निर्माण अध्यापकों के हाथों में है, उन्हें भी अपने कत्र्तव्य का पालन करना होगा।

About

The main objective of this website is to provide quality study material to all students (from 1st to 12th class of any board) irrespective of their background as our motto is “Education for Everyone”. It is also a very good platform for teachers who want to share their valuable knowledge.

Leave a Reply

Your email address will not be published.