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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Majdoor”, “मजदूर” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation Classes.

मजदूर

Majdoor

 

                मैं मजदूर हूँ। मेरे कंधों पर निर्माण का भार टिका हुआ है। मैंने नए भारत का निर्माण किया है। मैं निर्माता हूँ। मैं मजदूर होते हुए भी अपने काम में निरंतर लगा रहता हूँ। मैंने अपने कंधे कभी नहीं गिराए। मैं काम करने से कभी नहीं घबराता। मैं अनेक पीढ़ियों से निरंतर काम करता चला आ रहा हूँ। मैंने बड़े-बड़े पुल बनाए, बड़ी-बड़ी भव्य आलीशान इमारतें बनाई। मैं मजदूर जो हूँ।

                यह ठीक है कि मैंने बड़ी-बड़ी इमारतें बनाईं, पर मेरे रहने के लिए कोई जगह नहीं है। मैं अब भी टूटी-फूटी झांेपड़ी में रहता हूँ। मेरी दशा के बारे में जानने की किसी को फुर्सत नहीं है। मैं किस प्रकार की दीन-हीन दशा में रहता हँू, यह किसी के ध्यान में नही आता, और आए भी क्यांे? उन्हें इसकी जरूरत ही क्या है। उनका कहना है कि वे मुझे मेरे काम की मजदूरी दे देते हैं। मेरे बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल नहीं है, उनको खेलने के लिए गेंद नहीं है, पर इससे उनको क्या फर्क पड़ता है।

                मैं कभी-कभी इस गर्व से भर जाता हूँ कि भले ही मेरी दशा दीन-हीन हो, पर देश की दशा तो उन्नत हो रही है। मेरा निर्माता होना देश के काम आ रहा है, देश का स्वरूप  निरंतर बदलता जा रहा है। तब मैं स्वयं के निर्माता होने पर इठलाने लगता हूँ।

                तुम ध्यान से देखोगे तो पाओगे कि मेरे जैसे मजदूरों ने ही सदा से श्रम किया है, मालिकों ने तो हमारे श्रम के बलबूते पर मौज उड़ाई है। वे मजदूरों को मजदूर ही भले समझें, पर वे हमारे काम की अनदेखी नहीं कर सकते। यदि देश का कोई सच्चा निर्माता है तो वे हमीं हैं। हम मजदूर भले ही कहलाते हों, पर हैं निर्माता। मेरे बारे में ही कहा गया हैः

‘‘मैं मजदूर, मैं मजदूर, मैं सब चीजों का निर्माता, पर सब चीजों से दूर।’’

                चीजों के खरीदनें के लिए पैसा चाहिए और मैं पैसे से दूर हूँ। मैं तो किसी क्रांति की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

                मैं मजदूर भले ही हूँ, पर मैं निर्माता भी हूँ। मजदूर ही नव-निर्माण करता है। बाकी लोग तो जबानी जमा-खर्च करते हैं। निर्माता के दायित्व से तो आप सभी भली-भाँति परिचित होेंगंे। निर्माता के कंधे पर बड़ी जिम्मेदारी होती है। इस जिम्मेदारी का पालन करना कितना कठिन होता है, यह मैं ही जानता हूँ।

                आप मजदूर को हल्के में मत लें। आपको यह समझना होगा कि मजदूर न हों तो न तो कोई निर्माण हो सकता है और न किसी कल-कारखाने में कोई काम हो सकता है। सभी वस्तुओं के निर्माण का दायित्व तो मजदूर के कंधों पर ही होता है। इस दृष्टि से मैं निर्माता हूँ और आप उपभोक्ता हैं। मेरा स्थान ऊँचा है।

                पर मेरी विडंबना यह है कि मैं सभी चीजों का निर्माता होकर भी अपनी बनाई चीजों का उपभोग नहीं कर सकता। इसके लिए पैसों की आवश्यकता होती है और मैं पैसों के अभाव में जीता हूँ। मुझे जीना तो है क्योंकि मूझे आपके लिए निर्माण जो करना है।

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