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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Hamari Rashtriya Bhasha Hindi”, “हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation Classes.

हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी

Hamari Rashtriya Bhasha Hindi

                भारतवर्ष शताब्दियों तक दासता की बेड़ियों में जकड़ा रहा। विदेशी शासकों ने हमारे देश के धन-संपत्ति भंडार को तो खूब लूटा ही, हमारी संस्कृति तथा भाषा के विनाश का प्रयत्न भी जी भरकर किया। पहले मुसलमानों ने उर्दू तथा फारसी को हमारी भाषाओं के ऊपर लादा। कालांतर में अंग्रेजों ने हमारे ऊपर अंग्रजी लाद दी। अंग्रेजो की सलाह पर शिक्षा का अंग्रेजीकरण कर दिया गया क्योंकि अंग्रेजी सरकार को भारत पर राज्य करने के लिए ऐसे कर्मचारियांे की आवश्यकता थी जो वेशभूषा तथा विचार से अंग्रेज हो तथा शरीर से भारतीय। ताकि वे कम पारिश्रमिक पर अंग्रेजी सरकार के अनुकूल कार्य कर सकें और स्वयं को अन्य भारतीयों की अपेक्षा श्रेष्ठतर मानें।

                स्वतंत्रता मिलने पर सविधान-सभा ने हिंदी को एक मत से राष्ट्रभाषा स्वीकार किया-’’संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।’’ साथ ही सोलह प्रादेशिक भाषाओं को भी मान्यता दी गई। हिंदी भाषा को इसका पूर्ण स्थान प्रदान करने हेतु पंद्रह वर्ष का समय दिया गया ताकि सभी राजनेता, राजकीय अधिकारी तथा कर्मचारी हिंदी सीख सकें। सरकार ने इस दिशा में कार्य भी प्रारम्भ किया तथा हिंदी शिक्षण की सुविधाएँ भी दीं, परंतु भरतीय राजनीति तथा सरकार के बडे़ पदों पर उन लोगों का वर्चस्य था जिनकी जड़े विदशों में थी, जिन्हे हिंदी में कार्य करना कठिन लगता था। राजनैतिक नेता भी अपना-अपना दाँव खेलने लगे। लोग प्रांतीय तथा भषाई संकीर्णता की दल-दल में फँसने लगे। दक्षिण भारत के लोग सोचने लगे कि हिंदी के सरकारी भाषा बनने से वे लोग सरकारी नौकरियों में पिछड़ जायेंगे तथा नीतियों में हिंदी भाषियों का प्रभुत्व हो जाएगा। कुछ लोग कहने लगे कि प्रादेशिक भाषा समाप्त हो जाएगी। यही नहीं अंग्रेजी समर्थकों ने अंग्रेजी के उत्कृष्ट साहित्य, राज्य कार्य में सरल तथा वैज्ञानिक शब्दावली की दुहाई दी। हिंदी के विरूद्ध प्रदर्शन हुए, दंगे हुए तथा सरकार ने किसी भी राज्य पर हिंदी न लादने का वचन दिया, परन्तु समस्या का समाधान न हुआ, भाषाई प्रान्तों की माँगें उभरने लगीं तथा भाषाई प्रांत बनने भी लगे।

                हिंदी समर्थकों ने हिंदी के समर्थन में अकाट्य तर्क प्रस्तुत किए। हिंदी भारत के सर्वाधिक लोगों की भाषा है। समझने में सरल है। तर्कपूर्ण वैज्ञानिक भाषा है। हिंदी को दो-तीन मास के अल्पप्रयास से सीखा जा सकता है। हिंदी भाषा में जो कुछ लिखते है, वही पढा़ तथा समझा जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी को एक जीवन्त भाषा बनाया जाए जो सभी वर्गों व क्षेत्रों के बीच सम्पर्क-सूत्र बन सके। हिंदी भाषा को सरल तथा लचीला बनाया जाए। आवश्यकता पड़ने पर तथा बदलती परिस्थितियों में अन्य भाषाओं के शब्दों को हिंदी शब्दावली में ज्यों का त्यों सम्मिलित कर लिया जाए। हिंदी व्याकरण को भी सरल तथा लचीला बनाया जाए। सरकारी कामकाज के लिए आवशयक शब्दावली का मानकीकरण किया जाए। इस विषय में बाबू गुलाबराय के विचार अति महत्वपूर्ण है-’’परिभाषिक शब्दावली का सारे देश के लिए प्रमाणीकरण आवश्यक है, क्योंकि जब तक हमारी शब्दावली सारे देश में नहीं समझी जाएगी, तब तक न तो वैज्ञानिक क्षेत्रों में सहकारिता ही संभव हो सकेगी और न विद्यार्थी ही लाभ उठा सकेंगे।’’

                भारत एक बहुभाषी देश है। भारत में अनेक धर्मावलम्बी निवास करते हैं। अनेक भाषाएँ तथा बोलियाँ बोली जाती हैं। भारतवासियों के लिए आवश्यक है कि उनकी संताने अपनी मातृभाषा सीखें, राष्ट्रीय सम्पर्क भाषा के रूप में हिंदी सीखें तथा अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित करें। तभी भारत के भावी नागरिक अपनी प्रादेशिक संस्कृति, राष्ट्रीय विरासत तथा विश्व के साथ सामंजस्य तथा समन्वय स्थापित कर सकेंगे।

                भारत के सभी नागरिकों को चाहे वे किसी क्षेत्र के निवासी हों, किसी धर्म के उपासक हों अथवा किसी भी भाषा के बोलने वाले हों एक बात खुले मस्तिष्क से समझनी होगी कि निज भाषा की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है। राष्ट्र तो किसी भी क्रांति की लहर से स्वतंत्र हो सकते हैं परंतु भषा के पराधीन होने पर उसकी मुक्ति कठिन होती है। उदाहरण हम भारतीय हैं जो आज पचपन वर्ष की स्वाधीनता के पश्चात् भी अपनी भाषा को अंग्रेजी दासता से मुक्त नहीं करा पाए। वे लोग जो अंग्रेजी को तो अपना समझते हैं और हिंदी को इसलिए पराया मानते हैं, कि वह उत्तर भारत में बोली जाती हैं, वे देश को विनाश, भटकाव तथा अलगाववादी तत्वों के हाथ का खिलौना बना रहे हैं। उनकी आत्मा मर गई है। वे जो हिंदी को तुच्छ तथा अंग्रेजी साहित्य को विशाल मानते हैं उन्हें हिंदी साहित्य के विशाल भंडार का ज्ञान ही नहीं है। हिंदी के विरोध में प्रारम्भ से ही वे लोग हैं जो अंग्रेजी भाषा में प्रवीण हैं। वे उच्च साकारी पदों पर आसीन हैं। उन्हें हिंदी पढ़ना-लिखना अच्छा नहीं लगता, क्योंकि उनका रहन-सहन विदेशी है। वे इस भय से भी आक्रान्त हैं कि हिंदी की राष्ट्र भाषा के स्थान पर आरोहण से उन लोंगों का वर्चस्व खत्म हो जाएगा। उनकी स्वार्थ-बुद्धि ने राष्ट्रीय भावना को बंदी बनाया हुआ है।

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