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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Bathukamma ka Tyohar”, ”बतकम्मा त्यौहार” Complete Hindi Anuched for Class 8, 9, 10, Class 12 and Graduation Classes

बतकम्मा त्यौहार

Bathukamma ka Tyohar

बतकम्मा आंध्रप्रदेश की महिलाओं का एक प्रमुख पर्व है। जो उत्साह और उल्लास बतकम्मा के दिनों मे आंध्रप्रदेश की स्त्रियों में पाया जाता है वह वर्षभर फिर कभी देखने को नहीं मिलता। यह पर्व चलता भी पूरे पन्द्रह दिनों तक है। सौन्दर्य और लालित्य की छटा छिटकाने का यह अनुपम पर्व है।

वर्षा के अन्तिम दिनों में प्राकृतिक दृश्य चारों ओर हरे भरे दिखाई देते हैं। फूलों की इस समय भरमार रहती है। अनेक प्रकार के वन्य और घरेलू पुष्प विकसित होकर प्रकृति की शोभा बढ़ाते हैं। ऐसे ही समय में फूलों की प्रदर्शिनी, नाच-गान एवं श्रृंगार से विभूषित यह पर्व सौन्दर्य का पर्व बन जाता है।

वास्तव में बतकम्मा गौरी पूजन का उत्सव है। अविवाहित किशोरियाँ भविष्य के सुख और विवाहित स्त्रियाँ अपने सौभाग्य के लिए इस पर्व को मनाती है। गणेश चतुर्थी से अमावस्या तक यह पर्व किशोरियों का रहता है। अनेक रंगों के फूलों से सुशोभित थालियों में सजी सजाई बतकम्मा को घर के आंगन में रखकर गौरी देवी के गीत गाए जाते हैं। बतकम्मा के गीतों में प्रत्येक गीत के प्रत्येक चरण का अन्त “उय्यालो’ शब्द से होता है।

घर में कुछ देर तक बतकम्मा खेल कर किशोरियों का दल गाँव के तालाब की ओर चल देता है। यहाँ पूरे गाँव की लड़कियाँ इकट्ठी होती है। सामूहिक नृत्य और गान घंटों तक चलता रहता है। नवरात्रि के प्रथम सातदिनों में यह पर्व विवाहित स्त्रियों का हो जाता है। वे भी इसी प्रकार बतकम्मा खेलती हैं।

स्त्रियाँ बिना विश्राम लिए लगातार तीन या चार घंटों तक गाती रहती हैं। वे न तो साक्षर होती है नहीं संगीत के स्वरों की जानकारी फिर भी उनके कोमल कंठ से जो संगीत की धारा बहती है, उसे सुनकर ग्रामवासी मुग्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार प्रतिदिन रात को दुग्ध धवल चांदनी में आश्विन शुक्ल सप्तमी तक बतकम्मा पर्व मनाने का क्रम जारी रहता है।

अश्विन शुक्ल सप्तमी पर्व की अन्तिम तिथि है। इस दिन तक सभी युवतियाँ ससुराल से मैके पहुँच जाती है। जो किसी कारण से नहीं पहुँच पाती वे अपने भाग्य को कोसती हैं। घर की लड़कियाँ बतकम्मा पर्व पर उपस्थित न हों तो गौरी देवी अप्रसन्न होती हैं – ऐसा विश्वास है। अतएव निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी अपनी पुत्रियों को ससुराल से लाने का प्रयत्न करता है। घर की लड़कियाँ ही इस पर्व का नेतृत्व करती हैं।

बतकम्मा लगभग दस बाहर रंगों के फूलों से रची जाती हैं। एक पंक्ति में एक ही रंग के फूल होते हैं। इसकी ऊँचाई एक फुट से चार पाँच फुट तक और चौड़ाई एक से दो फुट तक होती है। इसके निर्माण में चार पाँच घंटों का समय लग जाता है। कुछ लोग फूलों के स्थान पर रंगीन कागजों से भी बतकम्मा बनाते हैं। सायंकाल होते ही स्त्रियाँ घरों को गोबर से लीपती हैं और अनेक रंगों से रंगोली बनाती हैं, फिर उस स्थान पर बतकम्मा की स्थापना करती हैं। उपस्थित महिलाएँ एक दूसरे को रोली-कुंकुम लगाती हैं। इसके पश्चात बतकम्मा का खेल प्रारंभ होता है। सर्व प्रथम गौरी देवी की स्तुति का गान किया जाता है।

इसके पश्चात महिलाएँ बतकम्मा को लेकर गाँव के चौराहे पर पहुँचती हैं। यहाँ वे रास रचकर नाचती हैं। इसकी शोभा देखने योग्य होती है। बतकम्मा के गीतों से सारा वातावरण गूंज उठता है। सभी सौभाग्यवती महिलाएँ इसमें भाग लेती हैं। बड़ा उत्साह एवं उल्लास दृष्टिगोचर होता है।

नाच गान समाप्त होते ही महिलाएँ बतकम्मा को सिर पर धारण ‘करके गाजे-बाजे के साथ तालाब की ओर चल पड़ती हैं। तालाब पर पहुँच कर एक बार फिर सामूहिक नृत्यगान होता है और कि प्रसाद बॉटा जाता है। अन्त में पुरुष बतकम्मा को अपने सिरों व धारण करते हैं। वे तालाब में बहुत दूर जाकर उन्हें विसर्जित करने हैं। तालाब से घर लौटते हुए भी महिलाएँ गीत गाती रहती हैं।।

यद्यपि बतकम्मा गौरी देवी का पर्व है तथापि इस समय जो गाए जाते हैं। उनमें से अनेक गंगा, सीता, सावित्री, अनुसूय, शकुन्तला शैव्या आदि के संबंध में भी होते हैं। इन गीतों में इन पतिव्रता लियो के करुणापूर्ण जीवन की झाँकी होती है। करुण रस से पूर्ण इन गीतों को सुनकर गाँव की जनता विभोर हो उठती है।

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