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Hindi Essay/Paragraph/Speech on “Ahimsa evm Vishv Shanti”, “अहिंसा एवं विश्व शान्ति” Complete Essay, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

अहिंसा एवं विश्व शान्ति

Ahimsa evm Vishv Shanti

प्रस्तावना : आज के इस भौतिकवादी युग में ‘मत्स्य न्याय’ का सिद्धान्त लेकर बड़े-बड़े महान् राष्ट्र अपनी थोथी महानता तथा प्रभुता का डंका पीटते हैं। आज विज्ञान ने शनै:-शनै: उन्नति कर अणु अस्त्रों एवं विस्फोटक बमों का निर्माण कर लिया है। आज विकासशील देशों द्वारा निर्मित एक अणु बम पूरे विश्व के विध्वंस के लिए पर्याप्त होगा। ऐसे आपस के तनावपूर्ण वातावरण में आज विश्व की सुख शान्ति ‘गूलर का पुष्प’ हो रही है। संसार में आज यदि शान्ति का कोई तरीका है, तो केवल अहिंसा, इसके बल पर ही विश्व मैत्री की भावना हो सकती है। अहिंसा एवं सुख प्राप्ति की धारणा से ही हमारे भूतपूर्व प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गाँधी के पाँच सिद्धान्तों के आधार पर ‘पंचशील’ की स्थापना की थी। महात्मा बुद्ध ने भी अपने शिष्यों को शिष्टाचार के पाँच नियम बतलाए थे. जिनका सामहिक नाम पंचशील था जो इस प्रकार हैं-

(1) अहिंसा की भावना

(2) अस्तेय की भावना

(3) सत्य भाषण

(4) अप्रमाद

(5) ब्रह्मचर्य।

बौद्ध काल में इस पंचशील’ का स्वरूप आध्यात्मिक था ; किन्तु आज के संघर्षशील एवं अशान्त वातावरण में इनका लक्ष्य व आधार राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय बन गया है ।

अशान्ति का कारण: ‘जैसा खाओ अन्न वैसी बुद्धि बनती है ।’ आज का मानव दूसरों का खून चूसना चाहता है। वह अनुचित साधनों से पैदा किये गये अन्न का उपयोग करता है, इससे उसकी बुद्धि भी आज भ्रष्ट हो रही है। वह आज किसी के भी कल्याण की बात नहीं सोचता है।

अशान्त मानव बुद्धि के प्रेरक तत्त्व : आज मानव में अशान्ति उत्पन्न करने के अनेक तत्त्व हैं।

(अ) भौतिकवादी सभ्यता: आज का मानव अपने भौतिक सुखों के लिए सूक्ष्म-से-सूक्ष्म तत्त्वों का पता लगाकर अणु और परमाणु तक पहुँच गया है। आज का मानव अपनी भौतिक आवश्यकताओं को पर्याप्त मात्रा में बढ़ा चुका है।

(ब) पूँजीवाद: आज का मानव दूसरे को देख कर किसी भी तरह पैसा कमाना चाहता है। वह पूँजीवाद की दौड़ में शामिल हो चुका

(स) साम्प्रदायिकता: भारत का समाज अनेक सम्प्रदायों में विभाजित है। इन विभिन्न सम्प्रदायों में मत मतान्तर हैं जो मानव कलह तथा अशान्ति का कारण हैं।

विश्व की समस्याएँ : फ्रांस की राज्य-क्रान्ति का भयानक रूप देखकर विश्व क्रान्ति की भावना से डर गया था । सब यही कल्पना कर रहे थे कि अब भूमण्डल से कलह, क्रूरता, हिंसा, पशुता एवं स्वार्थ सदा के लिए समाप्त हो जायेंगे और सुख-शान्ति, समता, बन्धुत्व एवं स्वतन्त्रता का एक क्षेत्र साम्राज्य स्थापित होगा; किन्तु जगत के दु:ख दारिद्रय का निवारण, तो दूर रहा उसके स्थान पर विकराल अभाव, बेकारी और भूख ने आकर अपने पैर जमा लिये । पूँजी और साम्राज्य के लोलुप राष्ट्र अपना विकराल सँह खोलकर विश्व के शोषण में लग गये । आज विश्व के सम्मुख घृणा, द्वेष एवं अशान्ति आदि की अनेक समस्याएँ आ गई हैं।

आणविक अस्त्र : बडे दुर्भाग्य की बात है कि आज हम विज्ञान की उन्नति एवं प्रकृति के स्वामित्व का उपयोग समाज के निर्माण के लिए उतना नहीं कर रहे हैं, जितना कि उसके विनाश के लिए। हम परमाणु जैसी महान् शक्ति से इस धरा को स्वर्ग बना सकते थे; परन्तु उसका उपयोग जनता के सुख वैभव के लिए न करके हम आज विनाशकारी अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण में कर रहे हैं। इसी प्रकार वायुयान या जलपोतों के निर्माण में हमारी दृष्टि कल्याण के स्थान पर विनाश की ओर अधिक आकर्षित है।

संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व शान्ति : द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति पर 26 जून, 1945 को 51 राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने संयुक्त राष्ट्र संघ को जन्म दिया। इसका कार्य शान्ति स्थापित रखने हेतु आपस में राष्ट्रों में सद्भावना बढ़ाना है। दो तनावपूर्ण राष्ट्रों में से जो गलती करे उसे सब राष्ट्र मिलकर दोषी ठहरा कर समस्या को दबाएँ। इसमें ब्रिटेन, अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन प्रतिनिधि राष्ट्र हैं। जब तक यह पाँचों राष्ट्र किसी समस्या पर सहमत नहीं होंगे समस्या सुलझ नहीं सकेगी। इन्हें विशेषाधिकार (वीटो पावर) प्राप्त है जिसके द्वारा किसी प्रस्ताव को रद्द किया जा सकता है। इस संघ का मुख्य लक्ष्य परस्पर न्याय व्यवस्था कर शान्ति स्थापित रखना है। यहाँ भी आपस की दलबन्दी एवं गुटबन्दी ने शान्ति में बाधा डाली है।

भारत का पंचशील और विश्व शान्ति: आज का युग एटम युग है। अणु शक्ति आविष्कार ने विश्व के सम्मुख नरसंहार की भयंकर समस्या प्रस्तुत कर दी है। भारत आरम्भ से ही शान्तिप्रिय देश रहा है। उसने चाहा कि राष्ट्र आपस में कलह न करें और सभी लोग आपस में मिलजुल कर रहें, इसी धारणा को लेकर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू और चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाई ने जन 1954 को विश्व में ‘शान्ति एवं सहयोग फैलाने वाले पाँच सिद्धान्त। को स्वीकार किया। स्वीकार किये। बाद में विश्व की दो-तिहाई जनता ने इन सिद्धान्तों

पंचशील के सिद्धान्त और उनका महत्त्व : ‘जियो और जीने दो’ की भावना पंचशील के सिद्धान्तों में मिलती है। व्यक्तिगत स्वार्थ, हेय, छल, कपट आदि के समापन के लिए पंचशील की भावना संजीवनी बुटी है। पंचशील के पाँचों सिद्धान्त बडे ही उपयोगी एवं महत्त्वशाली हैं। ‘पंचशील’ वह प्रेम और शान्ति का संदेश है जिसने संसार की आग्नेय दृष्टि को शान्त कर परस्पर द्वेष तथा घृणा के स्थान पर परस्पर स्नेह की भावना को जाग्रत किया है।

उपसंहार : आज इन महान् सिद्धान्तों के होते हुए भी कभी-कभी सबल राष्ट्र निर्बलों को दबाने का प्रयास करते हैं। आज बेकारी और भुखमरी आदि समस्याएँ मुँह फैला रही हैं। ऐसे में इस पंचशील को और भी अधिक सतर्क हो जाना चाहिये।

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