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Hindi Essay-Paragraph on “Rajniti ka Apradhikaran” “राजनीति का अपराधीकरण” 500 words Complete Essay for Students of Class 10-12 and Competitive Examination.

राजनीति का अपराधीकरण

Rajniti ka Apradhikaran

भारत में इस समय अपराधियों की पौ बारह हैं। क्योंकि उनके हित में दोनों दिशाओं से नेक काम हो रहे हैं। अगर अपराध का राजनीतिकरण हो रहा है तो भी अपराधियों को ही लाभ हो रहा है और राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है, तो भी अपराधियों को ही लाभ है। दोनों ही अवस्थाओं में राजनीति की मर्यादाएं टूट रही हैं और राजनीतिज्ञों की प्रतिष्ठा नष्ट हो रही है। राजनीति क्षेत्र में क्रियाशील व्यक्तियों की साख देश और समाज में गिरती जा रही है। नेताओं की छवि खराब ही नहीं हुई, बल्कि लोग नफरत करने लगे हैं। खादी का पहनावा अब धोखा नजर आ रहा है।

अपराध में संलिप्त लोग विशुद्ध अपराधी होते हुए भी नेताओं की पसंद हो चुके हैं। चुनाव में उनके आपराधिक तिलस्म से विधान सभाओं एवं संसद में पहुंच कर देश का बंटाधार करने के लिए अधिकृत हो जाते हैं। ये वैसे नेता होते हैं, जिन्हें राजनीति के सिद्धांतों का क, ख, ग नहीं आता है। नैतिकता उनके पास फटक नहीं सकती है। देशभक्ति उनके लिए पौराणिक कथाएं हैं। ऐसे तमाम नेता अपराधियों की खातिरदारी करते हैं, काफी तरजीह देते हैं, गुणानुवाद करते हैं और पुलिस के साये में उन्हें हर संभव बचाते हैं। उनके लिए करोड़ों के ठेके की व्यवस्था कराते हैं। जघन्य अपराध के लिए प्रेरित करते हैं।

ऐसे तमाम अपराधी अपराधी होते हुए भी राजनीति से संबद्ध होते हैं। राजनीति इनके लिए कवच का काम करती है। पुलिस के अधिकारी भी ऐसे अपराधी से पंगा लेना उचित नहीं समझते हैं। ऐसी हालत में उनके लिए उचित रास्ता यही होता है कि वे अपराध वृत्ति से धन का हिस्सा निर्धारित कर देते हैं।

पुलिस वाले, नेता और अपराधी तीनों इत्मीनान से चले आते हैं। यह अपराध के राजनीतिकरण की प्रक्रिया है।।

जो अपराधी बबूल से बरगद में प्रोन्नत हो जाते हैं वे नेताओं के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने में स्वाभिमान को ठेस समझते हैं और समय की निरर्थक बर्बादी तथा व्यर्थ जोखिम उठाने से बेहतर खुद विधायक या सांसद बन जाना उचित समझते हैं। चूंकि बबूल से अस्तित्त्व में रहते हुए नेताजी छुटमैये अपराधियों से बेमार ले चुके हैं। इसलिए बरगद हो जाने की हालत में उसके सामने नेताओं के सिर नहीं उठ पाते हैं। वे चाहने पर उन्हें चुनाव लड़ने के लिए दल का टिकट दे देते हैं। उन्हें टिकट देते समय इतना भरोसा तो जरूर रहता है कि टिकट बर्बाद नहीं होगा क्योंकि उसके बस पर नेताजी स्वयं कई बार जीत चुके होते हैं। यह प्रवृत्ति किसी एक दल के नेताओं की नहीं है। बल्कि सभी दलवालों की मानसिकता में राष्ट्रव्यापी एक्ट है। नतीजा इतना बुरा है कि अधिक से अधिक अपराधी जनप्रतिनिधित्व बनने लगे हैं। कितने को मंत्रालय का प्रभार भी मिल चुका है। आज स्थिति यह है कि आज का नेता कल तक अपराधी था या कल तक का अपराधी आज का नेता है। अपराधी को नेता की बैसाखी चाहिए तो नेता को अपराधी की बैसाखी।

ऐसी परिस्थिति में आम आदमी जो देश में असली मतदाता है, घर के दरवाजे से साफ कर कचरा फेंकने की मानसिकता से अपना वोट डालकर मुक्त हो जाता है। अगर हमारे लोकतंत्र के केंद्र में अपराध इसी तरह रह गया, तो वह दिन दूर नहीं जब सब कुछ होते हुए सब कुछ हम अपनी अमूल्य निधि आजादी से हाथ धो बैठेंगे।

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