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Hindi Essay, Paragraph on “Bharat mein Bhikariyo ki Samasya”, “भारत में भिखारियों की समस्या” 1000 words Complete Essay for Students of Class 9, 10 and 12 Examination.

भारत में भिखारियों की समस्या

Bharat mein Bhikariyo ki Samasya 

भारत कई प्रकार की अंदरुनी समस्याओं से जूझ रहा है। समाज और राष्ट्र के स्तर पर इसकी कई कठिन समस्याएं हैं। उनमें से एक गंभीर समस्या भिक्षुक समस्या भी है। भिक्षुक समस्या से भारत की छवि नष्ट होती है। किसी विदेशी पर्यटक को अगर भाव से भिखारी दिख जाए, तो उसे यह प्रतीत होता है कि भारत में अधिकतर लोग भिखमंगे ही हैं। भारत के कई राज्यों में भिखमंगी पर कानूनी रोक लगाई गई है। लेकिन जिस राज्य में रोक लगाई जाती है, उस राज्य के भिखमंगे दूसरे जगह जाकर अपना कारोबार शुरू कर देते हैं। गांवों, शहरों, सड़कों, मैदानों, तीर्थस्थलों, मेलों आदि में हमारी भेंट भिखमंगों से हो जाती है। भिक्षुक समस्या वास्तव में देश की एक जटिल समस्या है। इसे न सुलझा पाने के कारण समाज में अन्य समस्याएं भी पैदा हो रही हैं।

भारत में भिक्षा वृत्ति को प्रोत्साहन मिलने के कई कारण हैं। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण भारतीयों की उदार भावना है, जो सहज ही किसी की करुण स्थिति से प्रभावित हो जाती है। भिक्षु के प्रति उनकी उदारता भीख मांगने के लिए प्रोत्साहित करती है। दूसरी बात यह भी है कि अंधविश्वास और अंधभक्ति से भारतीय समाज इतना अधिक प्रभावित है कि छद्मवेशी ढोंगियों को योगी समझकर उनके स्वागत से बाज नहीं आते। इसी कारण से साधु-संन्यासियों को हम भिखमंगों की श्रेणी से अलग रखते हैं और उनके कर्म को अध्यात्म से जोड़ देते हैं। देश का प्रशासन तंत्र भी इतना शिथिल एवं आरामतलब है कि वह भिक्षाटन का क्षेत्र में व्याप्त अपराध मनोवृत्ति की ओर ध्यान नहीं देता है। शासन की उपेक्षा के कारण ही छद्मवेशी भिक्षुक तथा भिक्षाटन के क्रूर व्यापारी निरंकुश भाव से अपने-अपने धंधे चलाते हैं।

भिक्षाटन एक ऐसा सामाजिक रोग हैं, जो धीरे-धीरे भारत के आर्थिक, नैतिक व्यक्तित्त्व को कमजोर बना रहा हैं क्योंकि कबीर ने लिखा है-

आंगन मरन समान हैं मत कोई मांगे भीख।

मांगन ते मरना भला, यह खत गुरु की सीख ॥

यद्यपि भिक्षावृत्ति में लगे लाखों नागरिक राष्ट्र के वृहत् समाज से कटे हुए हैं तथा राष्ट्रीयता की भावना से शून्य हैं। उनमें न तो देशाभिमान है और न जातीयता की भावना हैं। समाज की आचार-संहिता उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखती। वे समाज के लिए बोझ स्वरूप हैं। चूंकि उनके भरण-पोषण का दायित्व समाज को ही वहन करना पड़ता है, इससे समाज की शक्ति का अपव्यय होता है। कोलकाता, मद्रास जैसे अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के महानगरों में विदेशी पर्यटक जब सड़कों और फुटपाथों पर भिक्षावृत्ति भारतीयों को देखते हैं, तो इस देश के प्रति उनकी धारणाएं दूषित हो जाती हैं। गौरवशाली संस्कृति के धनी भारत के लिए यह बड़े शर्म का विषय है कि उसकी सड़कों पर कोढ़ी, अपंग, अबोध, भिक्षुगण भीख मांगते फिरते हैं। देश की अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक नैतिकता के लिए यह चिंताजनक बात है। संक्रामक रोगों से ग्रस्त भिखारियों का समाज में खुले रूप से घूमना स्वास्थ्य की दृष्टि से भी समाज के लिए अतिकर है। असामाजिक तथ्यों का भी छद्मवेश में घूमनाफिरना संकट पूर्ण है।

भारत में भिक्षावृत्ति को अपनाकर जीविका चलाने वालों की कई श्रेणियां हैं, जो विभिन्न कारणों से इसके साथ जुड़े हुए हैं।

इन श्रेणियों में कुछ प्रमुख श्रेणियां हैं जो इस प्रकार हैं

  1. निराश्रित असहाय भिक्षुक
  2. शारीरिक दृष्टि से अक्षम भिक्षुक
  3. साधु-संन्यासी वेशधारी भिक्षुक
  4. जातीय-पारिवारिक पेशागत भिक्षुक
  5. अबोध बाल-भिक्षुक और
  6. छद्मवेशी भिक्षुक।

भिक्षुक समस्या में अबोध सुकुमार बाल भिक्षुक और उद्यमवेशी भिक्षुक विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। छोटे-छोटे बच्चों को अकसर भीख मांगते देखा जा सकता है। इसमें कुछ तो भिखारियों के ही बच्चे होते हैं तो कुछ बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें भीख मंगवाया जाता है।

कवि निराला की ‘भिक्षुक’ कविता की पंक्तियां देखिए, जिसमें उन्होंने लिखा-

वह आता, दो टूक कलेजे के करता पछताता

पेट-पीठ दोनों मिलकर है एक

चल रहा लकुटिया टेक

मुट्ठीभर दाने को

भूखे मिटाने को…

छद्मवेशी भिक्षुक मूलतः भिक्षुक नहीं होते और न भीख मांगना उनका उद्देश्य होता है। वे चोर, उठाईगीर, पॉकेटमार जैसे अपराधी लोग होते हैं। वे शिकार की तलाश में जहां-तहां भिक्षुक वेश में घूमते और भीख मांगते रहते हैं। मौका लगते ही पॉकेट मार देना तथा रात को घर में सेंध मारना इनका काम होता है। कुछ ऐसे छद्मवेशी भी होते हैं जो संभ्रात लोगों की वेश-भूषा में मनगढंत विपति की चर्चा कर लोगों की सहानुभूति पाने की चेष्टा करते हैं।

भिक्षाटन की समस्या का निदान यद्यपि सरलता से प्राप्त नहीं होता। तथापि उसका निवारण अनिवार्य है। इसके लिए कानूनी रोक के साथ-साथ दूसरे उपाय भी करने पड़ेंगे। इस दिशा में सरकार और समाज दोनों को समान रूप से सचेत रहना पड़ेगा। कानून बनाकर भिक्षाटन पर रोक लगा देना आसान हैं, किंतु निराश्रित असहाय भिक्षुकों के लिए ऐसे आवास गृह बनाने होंगे। स्वस्थ और मानसिक क्षमता वाले लोगों के लिए औद्योगिक शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी पड़ेगी, ताकि प्रशिक्षितों को यथाशीघ्र जीवकोपार्जन का सुयोग्य प्राप्त हो सके। देश की बेकारी दूर करने के लिए वृद्ध योजना के आधार पर कार्य करना होगा, ताकि बेकारी का यह सामाजिक आर्थिक रोज सदा के लिए समाप्त हो जाए। कानून द्वारा छद्मवेशी भिक्षुक का अंत आसानी से हो जाएगा। अबोध अनाथ बच्चों के लिए महानगरों में ऐसे केंद्रों की स्थापना की जानी चाहिए। जहां उन्हें स्वस्थ नागरिक बनाने की सारी व्यवस्था हो।

उपयुक्त सारी योजनाएं, साधन और व्यवस्थाएं तभी सफल हो पाएंगी, जब हमारा राष्ट्रीय चरित्र, अनैतिक, स्वार्थपरता और असामाजिकता जैसी भावनाओं से मुक्त होगा। हममें स्वदेशाभिमान, स्वदेश प्रेम, सांस्कृतिक निष्ठा तथा स्वार्थत्याग की भावना जितनी अधिक होगी हम सफलता के उतने ही निकट होंगे।

भिक्षाटन राष्ट्र के अंग पर कोढ़ की भांति हैं जो राष्ट्र की आत्मा को कुंठित बना रहा है। इसे दूर करने की शीघ्रताशीघ्र कोशिश न की गई तो भारतीय समाज निरंतर इस कोढ़ से प्रभावित होता रहेगा और किसी दिन छद्मवेशी भिक्षक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती बन जाएंगे। हमें भिखारियों तथा दीन-दुखियों के प्रति सहानभूति से काम लेना चाहिए तथा उनकी यथासंभव सहायता करनी चाहिए। विनोबा भावे न कहा है, “मांगने पर भिक्षुक को देना श्रेष्ठ है, किंतु बिना मांगे स्वयं भिक्षुक की खोज करके देना श्रेष्ठतर है।”

किंतु स्पष्टतः भिक्षुओं पर कड़ी निगाह भी रखनी चाहिए, ताकि कोई प्रोत्साहन न प्राप्त हो। भिक्षाटन की समस्या साधारण समस्या नहीं है। इसके लिए सारे राष्ट्र को एकजुट होकर सोचना-समझना तथा सक्रिय होना पड़ेगा।

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