Home » Languages » Hindi (Sr. Secondary) » Hindi Essay on “Vidyarthi aur Sainik Shiksha”, “विद्यार्थी और सैनिक-शिक्षा ” Complete Hindi Nibandh for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

Hindi Essay on “Vidyarthi aur Sainik Shiksha”, “विद्यार्थी और सैनिक-शिक्षा ” Complete Hindi Nibandh for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

विद्यार्थी और सैनिक-शिक्षा 

Vidyarthi aur Sainik Shiksha

निबंध नंबर : 01

प्रस्तावना : भारत ने शक्ति तथा बल के महत्त्व को भारत ने सदा से ही समझा और उसने इपी बल सम्पन्नता को ही सर्व प्रधान महत्त्व देने वाले छात्र-धर्म और क्षत्रिय जाति की स्थापना की है। आध्यात्मिकता तथा  ‘अहिंसा परमो धर्म:’ को महत्त्व देते हुए भी भारतीयों ने सदा से ही अपनी रक्षा के लिये अस्त्र-शस्त्र उठाये है। हमने किसी के धन-जन को हड़पना नहीं चाहा; परन्तु अपनी रक्षार्थ हमारे यहाँ की प्रकृति सर्वदा हमें उपदेश देती रही । वसन्त ऋतु में जो पत्ता कोमल होता है, वही पत्ता ग्रीष्म ऋतु में कठोर धूप का सामना करने के लिये कठोर हो जाता है।

सैनिक-शिक्षा की अनिवार्यता की आवश्यकता : सर्वदा शक्तिशाली राष्ट्रों ने निर्बल राज्यों को हड़पने का प्रयास किया है। हमारे भारत को भी चीनी व पाकिस्तानियों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। आज मानव महान्  हिंसावादी हो गया है। वह नरंसहार से नहीं डरता आज तो ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। वैज्ञानिक चमत्कार के कारण आज ऐसे-ऐसे अस्त्रों का निर्माण हो गया है, जो कुछ ही समय में संसार का विनाश कर सकने में समर्थ हैं। पाँच दशक पूर्व स्वतन्त्रता प्राप्त करने करने वाले हमारे भारत को भी शस्त्रास्त्र की दृष्टि से इतना समर्थ होना चाहिए कि उसकी स्वतन्त्र सत्ता पर कोई छापा न मार सके। आज भी काश्मीर की समस्या विकराल रूप धारण किए हुए है।

प्रथम राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्रप्रसाद ने भी विश्वविद्यालय में सैनिकशिक्षा को अनिवार्य करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था,  “आज आवश्यकता इस बात की है विश्वविद्यालयों में तालीमी शिक्षा के साथ-साथ सैनिक-शिक्षा भी अनिवार्य कर दी जाए। हमें अपने देश के भावी राष्ट्र निर्माताओं की बौद्धिक उन्नति के साथ-साथ शारीरिक उन्नति पर अत्यधिक ध्यान देना चाहिए।”

उक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि वर्तमान परिस्थितियों में देश को किसी भी समय अपनी रक्षा के लिए शस्त्र उठाने पड़ सकते हैं और उसके लिए जनता सुसज्जित करने के लिए सैनिक शिक्षा भी अनिवार्य करने की परम आवश्यकता है।

राष्ट्र की दृष्टि से ही नहीं अपितु व्यक्ति की दृष्टि से भी अनिवार्य सैनिक-शिक्षा परमावश्यक है। भारतीय प्राय: किसी भी कार्य को समय से नहीं कर पाते, उनमें फुर्ती का अभाव है। यदि सैनिक -शिक्षा अनिवार्य कर दी जाए, तो हमारे अन्दर नियमित रूप से समय पर कार्य करने की आदत पड़ जाएगी।

आजकल चारों तरफ अनुशासनहीनता का बोलबाला है। स्कूल, कॉलेज तो आज इसकी बाढ़ हैं। सैनिकों का अनुशासन जगत प्रसिद्ध है। सैनिक-शिक्षा से हमारे अन्दर अनुशासन की भावना आ जायेगी, जिससे हमारा जीवन क्रमबद्ध तथा सुव्यवस्थित रूप में व्यतीत होने लगेगा। और वह एक आदर्श जीवन बन जायेगा।

आज क्या नवयुवक, क्या विद्यार्थी सभी श्रम को हीनता की दृष्टि से देखते हैं और उससे जी चुराते हैं। सैनिक शिक्षा में श्रम का होना अनिवार्य है। इस प्रकार सैनिक-शिक्षा से श्रम करके हम अपना शरीर पुष्ट करेंगे और राष्ट्र निर्माण में अधिक योग प्रदान कर सकेंगे।

आज जाति-पाँति, धन तथा विद्या के कारण समाज में ऊँच-नीचे की भावना बढ़ती जा रही है। एक व्यक्ति व्यर्थ ही में दूसरे को अपने से ऊँचा समझता है। सैनिक-शिक्षा द्वारा ऊँच-नीच, छोटे-बड़े की भावना का सर्वथा अन्त हो जाएगा। सेना में एक जैसी वेशभूषा इस सहयोग की भावना को और भी अधिक पुष्टि प्रदान करती है।

सैनिक शारीरिक परिश्रम अधिक करता है। अत: उसका शरीर स्वस्थ रहता है। रोग के अभाव में मानव में अधिक कार्य करने की क्षमता होगी। इससे राष्ट्र की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।

सैनिक-शिक्षा का महत्त्व : विद्यालयों में आज सैनिक-शिक्षा अनिवार्य कर दी गई है। इसके अनेक कारण तथा उपर्युक्त लाभ है। इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर जब विद्यार्थी शिक्षा छोड़ने के पश्चात् जीवन-क्षेत्र में आते हैं, तो असमर्थता एवं असहायता का अनुभव नहीं करते है। यही नहीं, राष्ट्र को जब भी सैनिकों की आवश्यकता पड़ती। है, तो उसे उनकी कमी का अनुभव नहीं होता ; क्योंकि देश का प्रत्येक युवक ही सैनिक बन जाता है। सैनिक-शिक्षा प्रत्येक मानव में साहस का संचार करती है। जब सैनिक राइफल-ड्रिल करेंगे, जब शत्रु के आक्रमण से अपनी रक्षा के लिए युक्तियाँ विचारेंगे, जब शत्रु के चंगुल में फँस जाने पर अपनी रक्षा करना सीखेंगे तब उनमें प्रतिपल साहस का विकास होता जायेगा और वे कठिन से कठिन परिस्थिति का सामना करने के लिए अपने को प्रस्तत कर सकेंगे। हममें आत्मा को अजा-अप समझने की शक्ति सैनिक शिक्षा से प्राप्त होती है। अतः सैनिक शिक्षा का बड़ा महत्त्व है।

सैनिक-शिक्षा का रूप : विद्यालयों में सैनिक-शिक्षा को दो भागों में विभक्त किया गया है। एक भाग ए०सी०सी० (A.C.C.) कहलाता है। इसका पूर्ण रूप ‘ऑक्जलरी कैडेट कोर’ है। यह कक्षा 10 तक के विद्यार्थियों के हेतु है। ऊँची कक्षा के विद्यार्थी एन०सी०सी० की शिक्षा प्राप्त करते हैं जिसका पूर्ण रूप ‘नेशनल कैडेट कोर’ है। इसके अतिरिक्त जब से हमारे देश पर चीन ने आक्रमण किया है, हमारे विद्यालयों में एन०सी०सी०आर० तथा एन०डी०एस० आदि का भी प्रबन्ध किया गया है जिससे स्पष्टतः अनेक विद्यार्थी अनुशासन व प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। 

सैनिक-शिक्षा की समस्याएँ : आज भारत पंचशील की तटस्थता । की नीति को अपनाए हुए है। तटस्थता की नीति भी तभी सुदृढ होगी, जब हमारी स्थिति सुदृढ़ होगी। अन्य विषयों के समान सैनिक-शिक्षा भी शिक्षा का एक अंग होना चाहिए जिससे आज का विद्यार्थी अनुशासित तथा अपनी एवं अपने देश की रक्षा करने में स्वयं समर्थ हो सके। कुछ लोग आज के युग में नारी को सैनिक-शिक्षा देने के पक्ष में है। आज की नारियाँ भले ही युवकों के साथ युद्ध के मोर्चे पर न जाएँ; किन्तु आत्मरक्षा तो कर सकें। समय आने पर वे दुर्गावती और लक्ष्मीबाई बन सकें, इसलिए उनको भी सैनिक-शिक्षा का प्रशिक्षण प्राप्त करना  आवश्यक है।

परन्तु इस सैन्य-प्रशिक्षण में कुछ कठिनाइयाँ भी हैं, जिनमें आर्थिक कठिनाई विशेष महत्त्व रखती है। अर्थ-संकट हमारे देश में बहुत अधिक है। फिर भी भविष्य में ऐसी आशा है कि सैनिक-शिक्षा की योजना व्यापक रूप धारण कर लेगी । राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सैनिक-शिक्षा का बड़ा महत्त्व है। सैनिक-शिक्षा से हमारा देश बलवान हो सकता है, फिर कोई भी राष्ट्र हमारे देश पर अपना स्वत्व स्थापित करने की नहीं सोच सकता है।

उपसंहार : अकुलीन व्यक्ति के सिर पर सींग नहीं होते न कुलवान के हाथों में फूल खिलते हैं; किन्तु जब वह अपने मुख से वचन रूपी बाण छोड़ता है, तो उसके कुल और जाति का पता चलता है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए। केवल पुस्तकीय ज्ञान से ही कार्य नहीं चलेगा। अत: इसके लिए अनिवार्य सैनिक-शिक्षा की परमावश्यकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा जीवन एक सैनिक के समान जागरूक होना चाहिए ; किन्तु हमारे सैनिक-प्रशिक्षण की अवस्था ऐसी कदापि न हो जिससे अध्ययनशील छात्रों के विकास में बाधा आये ताकि किसी बर्नाड शा जैसे लेखक को फिर यह लिखने की आवश्यकता न पडे कि दस में से नौ सैनिक मूर्ख होते हैं। सैनिक शिक्षा का दृष्टिकोण केवल शरीर को स्वच्छ एवं प्रशिक्षित बनाए रखना तथा बालक में देशभक्ति की भावना को व्याप्त रखना होना चाहिए, जिससे कि संकट के अवसर पर सेना के लिए देशभक्त, साहसी एवं प्रशिक्षित युवक प्राप्त हो सकें।

बड़े हर्ष की बात है कि अब तो भारतीय ललनाएँ भी सैनिक-शिक्षा में रुचि ले रही है। अत: भारतीय शिक्षा-केन्द्रों में सैनिक-शिक्षा अनिवार्य हो जाये, तो फिर यहीं स्वर्ग है।

निबंध नंबर : 02

विद्यार्थी और सैनिक शिक्षा

Vidyarthi aur Sainik Shiksha

आध्यात्मिकता तथा अहिंसा परमोधर्मः को महत्त्व देते हुए भी भारतीयों ने सदा से अपनी रक्षा के लिए अस्त्र-शस्त्र उठाये हैं। हमने किसी के धन-जन को हडपना नहीं चाहा, परन्तु अपनी रक्षार्थ हमारे यहाँ की प्रकृति सर्वदा हमको उपदेश देती रही। वसन्त ऋतू में जो पत्ता कोमल होता है, वहीं पत्ता ग्रीष्म ऋतु में कठोर धूप का सामना करने कठोर हो जाता है। युद्ध करना भी भारतीय क्षत्रियों का धर्म रहा है।

सर्वदा शक्तिशाली राष्ट्रों ने निर्बल राज्यों को हड़पने का प्रयास किया है। हमारे को भी चीनी व पाकिस्तानियों का सामना करना पड़ा। आज मानव महान हिंसावादी हो गया है। वह नरसंहार से नहीं डरता है। आज तो ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली दावत चरितार्थ हो रही है। वैज्ञानिक चमत्कार के कारण आज ऐसे-ऐसे अस्त्रों का निर्माण हो गया है, जो कुछ ही समय में संसार का विनाश कर सकने में समर्थ है। 48 साल पहले स्वतन्त्रता प्राप्त करने वाले भारत को भी शस्त्रास्त्र की दृष्टि से इतना समर्थ होना चाहिये कि उसकी स्वतन्त्र सत्ता पर कोई छापा न मार सके। आज भी काश्मीर की समस्या विकराल रूप धारण किए हुए है। स्व० राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जी ने भी विश्वविद्यालय में सैनिक शिक्षा को अनिवार्य करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था कि आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्वविद्यालयों में तालीमी शिक्षा के साथ-साथ सैनिक शिक्षा भी अनिवार्य कर दी जाये। हमें अपने देश के भावी राष्ट्र निर्माताओं की बौद्धिक उन्नति के साथ-साथ शारीरिक उन्नति पर अत्यधिक ध्यान देना चाहिये। स्पष्ट है कि पतमान परिस्थितियों में देश को किसी भी समय अपनी रक्षा के लिए शस्त्र उठाने पड़ सकते हैं और उसके लिए जनता को ससज्जित करने के लिए सैनिक शिक्षा भी अनिवार्य रन की परम आवश्यकता है। दूसरे युद्ध के समय जब नियमित सेना युद्ध क्षेत्र में चली जायगा तब देश की आन्तरिक सुरक्षा तथा व्यवस्था के लिए भी सैनिकों की आवश्यकता पड़गी। शान्ति के समय में भी जब बाढ. सखा, महामारी और हड़तालों आदि के समय जब कभी विशिष्ट सहायता की आवश्यकता पड़ती है, तो हमारे सैनिक जी-जान लड़ाकर पशुवासियों की सहायता करते हैं।

राष्ट्र की दृष्टि से ही नहीं अपितु व्यक्ति की दृष्टि से भी अनिवार्य सैनिक-शिक्षा परमावश्यकता है। भारतीय प्रायः किसी भी कार्य को समय से नहीं कर पाते उनम उता का अभाव है। यदि सैनिक शिक्षा अनिवार्य कर दी जाये, तो हमारे अन्दर नियमित रूप से समय पर कार्य करने की आदत पड़ जायेगी और अनुशासन की भावना आ जाएगा। निडरता और श्रम का महत्त्व समझ जाएँगे। सैनिक शिक्षा दारा ऊँच-नीच. छोट-बड का भावना का सर्वथा अन्त हो जाएगा। सेना में एक जैसी वेश-भूषा इस सहयोग की भावना को और भी अधिक पुष्टि प्रदान करती है। सैनिक शारीरिक परिश्रम अधिक करता है। उसका शरीर स्वस्थ रहता है। रोग के अभाव में मानव में अधिक कार्य करने की होगी इससे राष्ट्र की आर्थिक स्थिति का सुधार होगा।

विद्यालयों में आज सैनिक शिक्षा अनिवार्य कर दी गई है। इसके अनेक कारण क.. उपर्युक्त लाभ हैं। इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर जब विद्यार्थी शिक्षा छोड़ने के पान जीवन-क्षेत्र में आते हैं, तो असमर्थता एवं असहायता का अनुभव नहीं करते हैं। यही न राष्ट्र को जब भी सैनिकों की आवश्यकता पड़ती है, तो उसे उनकी कमी का अनुभव नाई होता; क्यों कि देश का प्रत्येक युवक ही सैनिक बन जाता है। सैनिक शिक्षा प्रत्येक मानव में साहस का संचार करती है। जब सैनिक-राइफल-ड्रिल करेंगे, जब शत्रु के आक्रमण से अपनी रक्षा के लिए युक्तियाँ विचारेंगे, जब शत्रु के चंगुल में फंस जाने पर अपनी रक्षा करना सीखेंगे तब उनमें प्रतिपल साहस का विकास होता जायेगा और वे कठिन से कठिन परिस्थिति का सामना करने के लिए अपने को प्रस्तुत कर सकेंगे। हममें आत्मा को अजर-अमर समझने की शक्ति सैनिक शिक्षा से प्राप्त होती है। अतः सैनिक शिक्षा का बड़ा महत्त्व है।

विद्यालयों में सैनिक शिक्षा को दो भागों में विभक्त किया गया है। एक भाग एक सी० सी० कहलाता है। इस का पूर्ण रूप ‘ऑक्जलरी केडेट कोर’ है यह कक्षा 10 तक के विद्यार्थियों के हेतु है। ऊँची कक्षा के विद्यार्थी एन० सी० सी० की शिक्षा प्राप्त करते हैं जिसका पूर्ण रूप ‘नेशनल केडेट कोर’ है। इसके अतिरिक्त जब हमारे देश पर चीन ने आक्रमण किया था, तब से हमारे विद्यालयों में एन० सी० सी० तथा एन० डी० एस० आदि का भी प्रबन्ध किया गया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि अनेक विद्यार्थी अनुशासन व प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।

किसी-किसी देश में तो बिना सैनिक शिक्षा के नागरिक ही नहीं घोषित किया। जाता है। वोट देने तथा लेने का अधिकार उसी व्यक्ति का है जो सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त कर लेता है। हमारे भारत में भी यदि इस व्यवस्था को लागू कर दिया जाये, तो हर व्यक्ति सैनिक हो, आवश्यकता पड़ने पर हम सभी स्वतः अपनी भारत माँ की रक्षा करने के लिए कटने-मरने को वैसे ही तैयार हो जायें जैसे प्राचीन काल में माँ-बहनें ही क्या, नारिया। स्वयं अपने हाथ से तिलक करके युद्ध में सहर्ष भेज देती थीं।

आज स्वतन्त्र भारत पंचशील की तटस्थता की नीति को अपनाए हुए है। तटस्थता की नीति भी तभी सुदृढ़ होगी, जब हमारी स्थिति सृदृढ़ होगी। अन्य विषयों के समान सैनिक शिक्षा भी शिक्षा का एक अंग होना चाहिए जिससे आज का विद्यार्थी अनुशासिता तथा अपनी एवं अपने देश की रक्षा करने में स्वयं समर्थ हो सके। कुछ लोग आज के युग नारी को सैनिक शिक्षा देने के पक्ष में हैं। आज की नारियाँ भले ही युवकों के के साथ युद्ध के मोर्चों पर न जाये; किन्तु आत्म-रक्षा कर सकें, समय आने पर वह दुर्गावती, लक्ष्मीबाई बन सकें, इसलिए उनको भी सैनिक शिक्षा का प्रशिक्षण प्राप्त करना आवश्यक है। परन्तु इस सैन्य प्रशिक्षण में कुछ कठिनाइयाँ भी हैं, जिनमें आर्थिक कठिनाई विशेष खती है। अर्थ-संकट हमारे देश में बहुत अधिक है। फिर भी भविष्य में ऐसी आशा सनिक शिक्षा की योजना व्यापक रूप धारण कर लेगी। राष्ट्र की सरक्षा के लिए कि शिक्षा का बड़ा महत्त्व है। देश के नवयुवकों का गिरा हुआ नैतिक स्तर सैनिक शिक्षा से उच्च होता है। सैनिक शिक्षा से हमारा देश बलवान हो सकता है, फिर कोई भी राष्ट्र हमारे देश पर अपना स्वत्व स्थापित करने की नहीं सोच सकता है।

अकुलीन व्यक्ति के सिर पर सींग नहीं होते, न कुलवान के हाथों में फूल खिलते हैं; किन्तु जब वह अपने मुख से वचन रूपी बाण छोड़ता है, तो उसके कुल और जाति का पता चलता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि शिक्षा की पूर्णता, व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए केवल पुस्तकीय ज्ञान से ही कार्य नहीं चलेगा। अतः इसके लिए अनिवार्य सैनिक-शिक्षा की परमावश्यकता है। किन्तु हमारे सैनिक प्रशिक्षण की व्यवस्था ऐसी कदापि न हो, जिससे अध्ययनशील छात्रों के विकास में बाधा हो।

About

The main objective of this website is to provide quality study material to all students (from 1st to 12th class of any board) irrespective of their background as our motto is “Education for Everyone”. It is also a very good platform for teachers who want to share their valuable knowledge.

Leave a Reply

Your email address will not be published.