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Hindi Essay on “Suraksha Parishad me Bharat ki Davedari” , ”सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी

Suraksha Parishad me Bharat ki Davedari

                                संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद विश्व शांति एवं सुरक्षा से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के दायित्वों को पूरा करने वाली संस्था है। इस संस्था को संयुक्त राष्ट्र की कार्यकारिणी या संयुक्त राष्ट्र संघ की कुंजी भी कहा जा सकता है। इसके (सं.रा.संघ) चार्टर की मूल व्यवस्था में 5 स्थायी तथा 10 अस्थायी सदस्य थे लेकिन 17 दिसम्बर 1965 में इसमें संशोधन कर 4 और अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। इस अस्थायी सदस्यों की सदस्यता केवल दो वर्षोें की होती है। अस्थायी सदस्यों का निर्वाचन क्षेत्रीय आधार पर होता है, इनमें एफ्रो-एश्यिन देशों से पांच, लैटिन अमेरिकी देशों से दो, पश्चिम यूरोप से दो तथा पूर्वी यूरोप से दो प्रतिनिधि चुने जाते हैं।

                पांच स्थायी सदस्यों – अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन – के परमाणु क्षमता सम्पन्न घोषित होने के कारण उन्हें विषेधाधिकार (टमजव चवूमत) प्राप्त है। किन्तु समय के साथ-साथ होने वाले परिवर्तनों के मद्देनजर सदस्य संख्या की इस अभिवृद्धि, क्षेत्रीय सामा्रज्यों का विघटन, सोवियत संघ के विघटन, शीतयुद्ध का अंत, अमेरिका का एकमात्र महाशक्ति रह जाना आदि ने संयुक्त राष्ट्र के संशोधन की आवश्यकता को बढ़ा दिया है। किन्तु उसमें सबसे महŸवपूर्ण अंग सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन किए बिना संयुक्त राष्ट्र को एक लोकतांत्रिक संगठत मानना दुष्कर होगा।

लंबे समय से भारत सुरक्षा-परिषद में सदस्यता के लिए अपना दावा पेश करता रहा है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में समीकरण न बन पाने के कारण वह अभी तक सब योजनाएं रखने के बाद भी स्थायी सदस्यता प्राप्त नहीं कर सका है। जनसंख्या, क्षेत्रफल, सैन्यशक्ति ( परमाणु शक्ति सम्पन्न परंतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं) एवं संयुक्त राष्ट्र के गठन से लेकर वर्तमान समय तक भारत ने इस संस्था के प्रति अपने दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। एशिया में महत्वपूर्ण स्थिति के साथ ही साथ भारत तृतीय विश्व के देशों  का सबसे उपयुक्त प्रतिनिधि है। विश्व शांति एवं निरस्त्रीकरण हेतु भारत की प्रतिबद्धताएं किन्हीं अन्य राष्ट्रों से कम नहीं आंकी जा सकती। संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के पश्चात अंतर्राष्ट्रीय जगत में बहुत परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तनों के बाद सुरक्षा परिषद में भी दो श्रेणियां हो गई हैं जो जापान, जर्मनी को तो सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता देना चाहता है लेकिन भारत को नहीं। कारण शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका का पाक परस्त होना इसमें सबसे बड़ा बाधा साबित हो रहा है। भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में संशोधन महासंघ के दो तिहाई सदस्य एवं सुरक्षा परिषद के 9 सदस्य (5 स्थायी सदस्यों सहित) कर सकते हैं।

                सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी काफी मजबूत है। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव तथा विश्व के अधिकांश राष्ट्रों का समर्थन मिला हुआ है। इन राष्ट्रों में मुख्यतः चार स्थायी सदस्यों -रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन- सहित इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, कुछ मध्य एश्यिा के देश, मोरिसिअस , भूटान, जापान, जर्मनी, इजराइल, नेपाल, श्रीलंका, सिगांपुर, कुछ यूरोप के देश तथा त्रिनिडाड एवं टोबैगो इत्यादि देश हैं। तथा विरोध स्वरूप सबसे बड़ा और विश्व की एक महाशक्ति माने जाने वाला अमेरिका के साथ पाकिस्तान है।

                अमेरिका के विरोध का कारण पाकिस्तान प्रेम के साथ ही साथ यह भी है कि वह यह नहीं चाहता कि भारत शक्तिशाली बनकर उसकी प्रतिद्वन्द्विता में उतरे। अमेरिकी सोच है कि भारत, रूस और चीन के साथ मिलकर उसके खिलाफ सामरिक त्रिकोण बना सकता है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अमेरिका समर्थन के बदले कुछ प्रतिदान चाहता है। वह चाहता है कि भारत रूस के बदले अमेरिका से सैन्य साज-सामान खरीदे तथा उसे भारत में नौसैनिक अडडे प्रदान करे। भारत अपना प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम स्थगित कर दे तथा अपने आणविक संयंत्रों की अंतराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से जांच कराए; कश्मीर समस्या का समाधान अमेरिकी मर्जी के मुताबिक हो। परन्तु भारत इस प्रकार के अंतराष्ट्रीय संबंध नहीं बना सकता। भारत ने स्थायी सदस्यता के लिए अपनी पुरानी रणनीति को छोड़कर दूसरी रणनीति बनाई है जिस पर अमेरिकी सरकार को भारत का समर्थन मजबूरी में करना की पड़ेगा।

                दूसरी रणनीति के तहत संयुक्त राष्ट्र संघ में अपनी आवाज को बुलंद करना तथा सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता को सुनिश्चित करने के लिए भारत ने पश्चिमी देशों का मुंह जोहने की बजाय अपने पक्ष में संख्या बल को मजबूत करने की नीति पर अमल करने का निर्णय लिया है। इसमें भारत, अफ्रीका महाद्वीप, हिमतश्वेस, बिम्स्टेक, शंघाई सहयोग संगठन, यूरोपीय देशों से मजबूत संबंध तथा लैटिन अमेरिकी देशों के साथ विकसित करने का प्रयास कर रहा है।

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