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Hindi Essay on “Pustak Ki Atam Katha” , ” पुस्तक की आत्मकथा ” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

पुस्तक की आत्मकथा

निबंध नंबर : 01

वर्तमान में मै एक पुस्तक हूँ | मुझे पाकर मानो मानव ने एक अमर निधि प्राप्त कर ली है | मै उसे सदा ज्ञान – विचारो का दान देती रहती हूँ | मुझे आज ज्ञान – विज्ञान और समझदारी का , आनन्द और मनोरंजन का खजाना माना जाता है | परन्तु आदर – मान की यह स्थिति मुझे एकाएक या सरलता से नही मिल गई है | मेरा यह रूप सृष्ट – मानव की तपस्या और साधना का फल है |

सृष्टि के आदिकाल में तो मेरा सृष्टा बड़ी- बड़ी शिलाओं के उपर चित्रों तथा तस्वीरों के रूप में ही मेरा निर्माण करता था | वह मेरा रूप आज भी शिलाओं पर या कन्दराओ में देखा जा सकता है | लेखन कला की प्रगति के साथ मेरा रूप बदला, फिर मुझे ताड़ व भोज पत्रों पर लिखा जाने लगा | आज भी अजायबघर में मेरा यह रूप देखने को मिल सकता है | कुछ और समय पश्चात् कागज का आविष्कार हुआ तो मेरा निर्माण कागज पर होने लगा | यह कार्य सर्वप्रथम चीन में प्रारम्भ हुआ था | कागज के निर्माण तथा मुद्रण कला की प्रगति ने तो मेरी काय ही पलट दी | फिर तो मै नए- नए रूपों में अपने पाठको के सम्मुख प्रस्तुत होने लगी | मेरा आवरण भी आकर्षक बन गया | मेरी सुरक्षा के लिए मुझ पर सुदृढ़ जिल्द भी चढाई जाने लगी |

मेरा सृष्टा लेखक , कवि , इतिहासकार , कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार, निबंधकार तथा एकाकी लेखन कोई भी हो सकता है | मेरा यह लेखक पहले अपने विचारो तथा भावो को लेखनी द्वारा कागज पर लिपिबद्ध करता है | मेरा यह प्रारम्भिक रूप पाण्डुलिपि रूप को कम्पोजिटरो के हाथो में दे दिया जाता है जो मुझे टाइपो के सूत्र में बाँध देते है | इसके बाद एक- एक फार्म को मशीन पर छपने भेज दिया जाता है | छपने के पश्चात मै दफ्तरी के हाथो में भेज दी जाती हूँ | वह एक- एक फार्म को मोडकर सभी फार्मो को इकटठा करता है | जिन्द बैधती है फिर उस पर सुन्दर सा आवरण चढाया जाता है | तत्पश्चात  इस पर मेरा और लेखक का नाम सुन्दर अक्षरों में लिखा जाता है |

इस प्रकार मुझे वर्तमान स्वरूप और आकार मिल पाया और मै पुस्तक कहलाने लगी मै दुकानदारों के माध्यम से पाठको के हाथो में पहुँच पाई जो मेरे सच्चे साथी है | मै ज्ञान- विज्ञान , आनन्द – मनोरंजन का भण्डार कहलाती हूँ | मेरे अभाव में पढाई – लिखाई कतई संभव नही | जिस देश व् समाज में मेरा सम्मान नही होता, वह असभ्य तथा अशिक्षित समझा जाता है |

निबंध नंबर : 02

पुस्तक की आत्म-कथा

Pustak ki Atmakatha 

अतीत…बीता हुआ समय और जीवन…… वर्तमान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, पर सभी को अपना अतीत हमेशा सुखद और आकर्षक लगा करता है। सभी उस तरफ लौट जाने की इच्छा किया करते हैं। मैं अपने अनुभव के आधार पर ही यह सब कह सुना रही हूँ-मैं पुस्तक।

आज यानि वर्तमान में मैं एक पुस्तक हूँ। मेरी गणना श्रेष्ठ मानी जाने वाली पुस्तकों में होती है, आम घटिया और सड़क छाप पुस्तकों में नहीं। मुझे ज्ञान-विज्ञान और समझदारी का. आनन्द और मनोरंजन का खजाना माना जाता है। इस कारण मैं धडाधड बिका करती हैं। आज तक मेरे अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। बड़े-बड़े विद्वान् मुझे अपना और मेरी प्रशंसा कर चुके और निरन्तर करते रहते हैं। लेकिन आदर-मान की यह स्थिति मुझे एकाएक या सरलता से नहीं मिल गई है। मेरा अतीत बड़ा गहरा सुहावना और हरा-भरा है, आनन्द-मस्ती से झूमता हुआ।

मेरा मूल घर एक सघन जंगल में था। वहाँ कई जातियों के पेड-पौधे, वनस्पतियाँ आदि हम मिल-जुल कर रहा करते थे। हवा चलने पर साथ हिल कर मस्ती में झूमा करते थे। कई बार तेज बवण्डर या तूफान आकर हमें झुकने या तोड़ डालने का प्रयास भी करते; पर आकर गुजर जाते । हाँ, उन की तीव्रता के कारण हमारी डालियाँ पर रहने वाले बेचारे अनेक पक्षियों के घोंसले अवश्य ही उड़, गिर और नष्ट हो जाते। हमारे आस-पास कई जातियों-प्रजातियों के पशु भी मुक्त भाव से रहा और विचरा करते। लेकिन लगता है, प्रकृति को और तुम मनुष्यों को हमारा सब सुख स्वीकार नहीं था। तभी तो उन का प्रकोप कुल्हाड़ा बन गिरा हम पर।

एक दिन सुबह-सुबह आँख खुलने पर देखा, कुल्हाडे उठाए कुछ लोग आए और विशेष कर हमारी जाति के पेड़ों को काटने लगे। साँझ ढलने तक उन्होंने मेरे सभी साथी जाति भाइयों को काट कर ढेर कर दिया। अगले दिन कुछ लोगों ने आकर आरी से रत-रेत कर हमारे विशाल शरीर को छोटे टुकड़ों में बाँट दिया। कुछ दिनों बाद ट्रको पर लाद कर हमें एक विशाल आँगन में लाकर पटक दिया गया। वहाँ आ कर पता चला कि वह कोई मिल है। लोग उसे कागज मिल कह रहे थे। कुछ दिन वहीं पड़े रहने के बाद हमें उठाकर एक मशीन के तख्ते पर रख दिया गया। वह चला और हम करहाने लगा ओह ! हाय ! आह ! कड-कडडड देखते-ही-देखते हमारे वे टुकड़े किए और कूटे जाकर चूर्ण-चूर्ण हो गए। इसके बाद हमे बड़े हौजों में भरे पानी में डाल दिया गया और काफी समय तक हम उन्ही में डूबते-उतरते, सडते-गलते हुए एक गाढा घोल-सा बन गए। वहां से निकाल कई रासायनिक प्रक्रियाओं और मशीनों की गर्मी से गुजरने के बाद एक तरफ से जब हम बाहर निकले, तब हमारा रंग रूप और नाम तक सभी कुछ बदल चुका था। मैंने सुना. वहाँ के लोग आपस में कह रहे थे-‘वाह ! कितना बढ़िया कागज बना है इस बार।

वहाँ से मिल-गोदाम और कुछ दिनों बाद एक ट्रक पर बण्डलों के रूप में लाद कर हमे शहर में एक कागज-विक्रेता के गोदाम में पहुँचा दिया गया। कुछ दिन के बाद एक आदमी आया और हमें खरीद कर अपने यहाँ ले जा कर एक ढेर-सा कोने में लगा दिया। देखा, वहाँ एक तरफ तो कुछ लोग खानों में से अलग-अलग अक्षर निकाल कर उन्हें जोडते जा रहे थे, जबकि एक तरफ घरघरांती हुई एक मशीन-सी चल रही थी। साँस रोककर सोचते रहे-पता नहीं, अब हमारे साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा? जल्दी ही हमें उठा कर उस मशीन पर चढ़ा दिया गया और हम एक-एक पर छप-छप कर कुछ छपने लगा। छपने के बाद एक दिन एक अन्य आदमी हमें उठवा कर अपने यहाँ ले गया। वहाँ बैठे अन्य छोटे-बड़े आदमी हमें मोड़-मोड़ कर रखने लगे। फिर एक मशीन से स्टिच किया और सिया गया। उसके बाद आस-पास से काँट-छाँट कर संवारा और जिल्द बन्दी की गई ऊपर लेई से कुछ चिपकाया और एक कवर-सा लपेट दिया गया। हाँ यही जो इस समय भी मुझ पर चढा हआ मेरे तन की रक्षा तो कर ही रहा था मेरी शोभा भी बढ़ा रहा था।

इस प्रकार मुझे वर्तमान स्वरूप और आकार मिल पाया और मैं पुस्तक कही जाने लगी। अरे, हाँ: मैं उस का नाम तो भूल ही गई, जिस बेचारे ने कड़ी मेहनत कर के मेरे गीतर छपने-सजने वाला सब-कुछ दिया। उस बेचारे व्यक्ति को लेखक कहा जा सकता है कि जिस के बिना मैं बन ही नहीं सकती। परन्तु मैं क्या, प्रकाशक तक पुस्तक छप जाने के बाद उस बेचारे लेखक के हित का ध्यान नहीं रखा करते। उसे कतई भूल जाया करते हैं।

जो हो, मेरे बनने और अस्तित्व में आने की कहानी मात्र इतनी ही है। लेखक महोदय ने अपने लम्बे जीवन-व्यवहारों के अनुभव से जो सीखा, उसे भाव और विचार के रूप में मुझ में संजो रखा है। इसी कारण मैं ज्ञान-विज्ञान, आनन्द-मनोरंजन का भण्डार कहलाती और मानी जाती हूँ। मेरे अभाव में पढ़ाई-लिखाई कतई संभव नहीं। जिस देश समाज में मुझ पुस्तक को सम्मान न हो, उसे असभ्य और अशिक्षित माना जाता है।

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commentscomments

  1. Nandish Thakwani says:

    Thanks for publishing this essay. It was very usefuk to me…

  2. tanzeem says:

    phati pustak ki aatmakatha chahie hai plzz

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