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Hindi Essay on “Paropkar ” , ” परोपकार” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

परोपकार

Paropkar

 

Best 7 Hindi Essay on “Paropkar”

निबंध नंबर : 01

     परोपकार का महत्व – परोपकार अर्थात् दूसरों के काम आना इस सृष्टि के लिए अनिवार्य है | वृक्ष अपने लिए नहीं, औरों के लियेफल धारण करते हैं | नदियाँ भी पाना जल स्वयं नहीं पीतीं | परोपकारी मनुष्य संपति का संचय भी औरों के कल्याण के लिए करते हैं | साडी प्रकुर्ती निस्वार्थ समपर्ण का संदेश देती है | सूरज आता है, रोशनी देकर चला जाता है | चंद्रमा भी हमसे कुछ नहीं लेता, केवल देता ही देता है | कविवर पंत के शब्दों में –

 

हँसमुख प्रसून सिखलाते

पलभर है, जो हँस पाओ |

अपने उर की सौरभ से

  जग का आँगन भर जाओ ||

परोपकार से प्राप्त आलौकिक सुख – परोपकार का सुख लौकिक नहीं, अलौकिक है | जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से किसी छायल की सेवा करता है तो उस क्षण उसे पाने देवत्व के दर्शन होते हैं | वह मनुष्य नहीं, दीनदयालु के पद पर पहुँच जाता है | वह दिव्य सुख प्राप्त करता है | उस सुख की तुलना में धन-दौलत कुछ भी नहीं है |

परोपकार के विविध उदाहरन – भारत में परोपकारी महापुरषों की कमी नहीं है | यहाँ दधीची जैसे ऋषि हुए जिन्होंने अपने जाति के लिए अपने शरीरी की हड्डियाँ दान में दे दीं | यहाँ सुभाष जैसे महँ नेता हुए जिन्होंने देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपना तन-मन-धन और सरकारी नौकरी छोड़ दी | बुद्ध, महावीर, अशोक, गाँधी, अरविंद जैसे महापुरषों के जीवन परोपकार के कारण ही महान बन सके हैं |

     परोपकार में ही जीवन की सार्थकता – परोपकार दिखने में घाटे का सौदा लगता है | परंतु वास्तव में हर तरह से लाभकारी है | महात्मा गाँधी को परोपकार करने से जो गौरव और समान मिला ; भगत सिंह को फाँसी पर चढ़ने से जो आदर मिला ; बुद्ध को राजपाट छोड़ने से जो ख्याति मिली, क्या वह एक भोगी राजा बन्ने से मिल सकती थी ? कदापि नहीं | परोपकारी व्यक्ति सदा प्रसन्न, निर्मल और हँसमुख रहता है | उसे पश्चाताप या तृष्णा की आग नहीं झुलसाती | परोपकारी व्यक्ति पूजा के योग्य हो जाता है | उसके जीवन की सुगंध सब और व्याप्त हो जाती है | अतः मनुष्य को चाहिए की वह परोपकार को जीवन में धारण करें | यही हमारा धर्म है |

 

निबंध नंबर – 02 

 

परोपकार

 

‘अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन द्वंच

परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम।।’

 

उपर्युक्त पंक्तियों में परोपकार सबसे बड़ा पुण्य कहा गया है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। परस्पर सहयोग उसके जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। वह दूसरों के सहयोग के बिना जीवनयापन नहीं कर सकता है, तो दूसरी और समाज को उसके सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार समाज में प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे को सहयोग, सहायता देते तथा लेते रहते हैं। इसे परोपकार भी कहा जाता है।

परोपकार शब्द-दो शब्दों के मेल से बना है-‘पर’+उपकार करना। इस प्रकार परोपकार का अर्थ  है अपनी चिंता किए बिना, सभी सामान्य विशेष की भले की बात सोचना आवश्यकता अनुसार और यथाशक्ति हर संभव उपाय से भलाई करना। भारतीय संस्कृति की आरंभ से ही व्यक्ति को स्वार्थ की संकुचित परिधि से निकलकर परोपकार की ओर उन्मुख करने की प्रेरणा देती रही है। भारतीय संस्कृति में ‘पर पीड़ा’ को सबसे बड़ा अधर्म कहकर संबोधित किया गया है।। गोस्वामी तुलसीदास ने इसलिए कहा था-

‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।’

सीताजी की रक्षा में अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाले गोधराज जटायु से राम ने कहा था-

‘परहित बस जिन्ह के मन माहीं

तेन्ह कहुजग दुलर्भ कछु नाही।’

तुतने अपने सत्कर्म से ही सदगति का अधिकार पाया है। इसमें मुझे कोई श्रेय नहीं क्योंकि जो परोपकारी है उसके लिए संसार में कुछ दुर्लभ नहीं है। प्रकृति का कण-कण हमें परोपकार की प्रेरणा देता है। कविवर नरेंद्र शर्मा ने इसलिए कहा है-

‘सर्जित होते में धविसर्जित, कण-कण पर हो जाने,

सरिता कभी नहीं बहति, अपने प्यास बुझाने।

देती रहती है आधार धरा हम से क्या पाने

अपने लिए न रत्नाकर का अंग-अंग दहता है।’

बादल अपने लिए नहीं बरसते, नदियां अपना जल स्वंय नहीं पीती। पृथ्वी हमसे कुछ पाने के बदले हमें सहारा नहीं देती, समुद्र के कण-का भी परोपकार के लिए ही तो है। ठीक इसी प्रकार सज्जनों का धन-ऐश्वर्य आदि परोपकार के लिए होता है।

‘परमारथ के कारने साधुना धरा शरीर’

मनुष्य और पशु में एक ही बात का प्रमुख अंतर है। पशु केवल अपने लिए जीता है जबकि मनुष्य दूसरों के लिए भी जी सकता है-

‘यही पशु प्रवत्ति है आप आप ही चरे

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।’

हमारा प्राचीन इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि जिससे ज्ञात होता है कि किस तरह यहां के लोगों ने परोपकार के लिए अपनी धन संपत्ति तो क्या अपनी देह तक अर्पित कर दिए। महर्षि दधीचि के उस अवदान को कैसे भुलाया जा सकता है जिन्होंने असुरों का नाश करने के लिए देवराज इंद्र को अपनी अस्थियां दे दी थी, ताकि उनका वज्र बनाकर आसूरी शक्तियों पर वज्रपात किया जा सके।

भारतीय जीवन में परहित-साधन को हमेशा एक शुभ कार्य, परम धर्म और परम कर्तव्य माना जाता रहा है। यहां जो यज्ञों का विधान मिलता है, कई प्रकार के व्रतोपवासों की योजना मिलती है, उत्सव और त्योहार मिलते हैं, सभी के मूल में एक ही तत्व काम करता हुआ दिखाई देता है। वह तत्व है जन-कल्याण और परोपकार का। यहां जो गुरुकुलों-ऋषिकुलों में शिक्षा की व्यवस्था सामाजिक दायित्वों का अंग रही है, उसके मूल भी आम-खास को एक समान समझकर समान स्तर और रूप से शिक्षित बनाकर ऊपर उठाने की भावना रही है। ऐसी-ऐसी व्यवस्थाएं मिलती हैं कि जो हर कदम पर परोपकार की शिक्षा और प्रेरणा देने वाली है। भूखे को रोटी खिलाना, प्यासे को पानी पिलाना, अतिथि-सेवा करना, धर्मशालाएं बनवाना जैसी सारी बातें परोपकार की ही तो शिक्षा और प्रेरणा देने वाली हैं।

यहां धर्मपूर्वक अर्थ (धन) कमाने, धर्मपूर्वक अपनी कामनांए पूरी करने और ऐसा करते हुए अंत में मोक्ष पाने को जीवन का चरम लक्ष्य रखा गयया है। सभी पुरुषार्थों के साथ ‘धर्म’ शब्द जोडऩे का यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि कुछ भी करने से पहले धूप-दीप जलाकर पूजा-पाठ करो, बल्कि यह है कि हर कार्य मानवीय मर्तव्य-पाल की दृष्टि से करो। धर्मपूर्वक अर्थ कमाने की वास्तविक व्याख्या रही है कि किसी को दुखी पीडि़त एव शोषित करके धन न कमाओ, बल्कि इसलिए कमाओ कि उससे सभी का असमर्थों और पिछड़े हुओं का उत्थान संभव हो सके। सभी समान रूप से उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकें। सभी की सभी तरह की आश्यकतांए पूरी हो सकें। तभी तो यहां के वैदिक मंत्र द्रष्टाओं तक ने परोपकार को महत्व देने वाले उदघोष स्थान-स्थान पर किए-

सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया

सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित दुख भाग भवेतु।’

अर्थात सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी का कल्याण हो और कोई दुख न पावे।

आज के वैज्ञानिक युग में परोपकार की भावना का लोप हो गया है। पश्चिम के प्रभाव ने हमें अपनी उदात्त सांस्कृतिक चेतनाओं से विमुख कर दिया है। आज चारों ओर अशांति, हिंसा, ईश्र्या, स्वार्थपरता, कलह आदि का बोल बाला है। आज बड़े तथा समृद्ध राष्ट्र जिस पर विकासशील, दुर्बल और निर्धन राष्ट्रों का शोषण कर रहे हैं, उन्हें अपनी उंगलियों पर नचाने का प्रयास कर रहे हैं। यह भी कुत्सित स्वार्थ वृत्ति का ही दयोतक है। स्वार्थवृत्ति के कारण ही आज समूचा विश्व विनाश के कगार पर खड़ा है। क्योंकि संहारक अस्त्र-शस्त्र कुछ ही पलों में समूची मानवता एंव सभ्यता का ध्वंस कर रहे हैं। ऐसी स्ाििति में केवल परोपकार की भावना ही मानवता को बचा सकती है। आज हमें कवि की इन पंक्तियों को अपने जीवन में उतारना होगा।

‘हम हों समष्टि के लिए व्यष्टि बलिदानी।’

 

निबंध नंबर : 03

परोपकार

Paropkar

 

‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई‘

                प्रस्तावना- मानव एक सामाजिक प्राणी है। अतः समाज में रहकर उसे अन्य प्राणियों के प्रति कुछ दायित्वों एवं कर्तव्यों का निर्वाह करना पड़ता है। इसमें परहित सर्वोपरि है। जिनके हदय में परहित का भाव विद्यमान है, वे संसार में सब कुछ कर सकते हैं। उनके लिए कोई भी कार्य मुश्किल नहीं है।

                मानव-मानव मंे समानता- ईश्वर द्वारा बनाए गए सभी मानव समान है। अतः इन्हें आपस में प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। जब कभी एक व्यक्ति पर संकट आए तो दूसरे को उसकी सहायता अवश्य करनी चाहिए। जो व्यक्ति अकेले ही भली भांति के भोजन करता है और मौज करता है, वह पशुवत् प्रवृति का कहलाता है। अतः मनुष्य वहीं है, जो मानव मात्र के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए हमेशा तैयार रहता है।

                                प्रकृति और परोपकार- प्राकृतिक क्षेत्र में हमें सर्वत्र परोपकार भावना के दर्शन होते हैं। चन्द्रमा की शीतल किरणें सभी का ताप हरती है। सूर्य मानव को प्रकाश विकीर्ण करता है। बादल सबके लिए जल की वर्षा करते हैं फूल मानव के लिए अपनी सुगंध लुटाते हैं। इसी प्रकार सत्पुरूष दूसरों के हित के लिए शरीर धारण करते हैं।

                                परोपकार के लाभ- परोपकार से मानव के व्यक्तित्व का विकास होता है। परोपकार की भावना का उदय होने पर मानव ‘रस’ की सीमित परिधि से ऊपर आकर पर के विषय में सोचता है।

                                परोपकार मातृत्व भाव का परिचायक है। परोपकार की भावना ही आगे बढ़कर विश्व बंधुत्व के रूप में उत्पन्न होती है। परोपकार के द्वारा भाईचारे की वृद्धि होती है, तथा कभी प्रकार के लड़ाई झगड़े समाप्त होते हैं।

                                परोपकार द्वारा मनुष्य को अलौलिक आनन्द की प्राप्ति होती है। हमारे यहां परोपकार को पुण्य तथा परपीड़न को पाप माना गया है।

                                परोपकार के विभिन्न रूप- परोपकार की भावना अनपेक रूपों में प्रस्फुटित होती दिखाई पड़ती है। धर्मशालाओं, धमार्थ, औषधालयोें, जलाशयों आदि का निर्माण तथा भोजन, वस्त्र आदि का दान सब परोपकार के अन्तर्गत आते हैं। इनके पीछे सर्वजन हित एवं प्राणिपत्र के प्रति प्रेम की भावना निहित रहती है।

  आधुनिक युग में परोपकार की भावना मात्र तक सीमित नहीं है। इसका विस्तार प्राणिमात्र में भी निरन्तर बढ़ता जा रहा है। अनेक धर्मात्मा गायों द्वारा वो संरक्षण के लिए गौशालाओं, पशुओं के पानी पीने के लिए हौजों का निर्माण किया जा रहा है। यहां ताऊ के बहुत से लोग बंदरों को चने व केले खिलाते हैं मछलियों को दाने व कबूतरों को बीज तथा चींटियों के बिल पर शक्कर डालते हैं।

                                उपसंहार- परोपकार में ‘सर्वभूतहिते रत‘ की भावना विद्यमान है। यदि इस पर गम्भीरता से विचार किया जाए तो ज्ञात पड़ता है कि संसार के सभी प्राणी परमात्मा के ही अंश हैं। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम सभी प्राणियों के हित के चिंतन में रत रहें।

                                यदि संसार के सभी लोग इस भावना का अनुसरण करें तो संसार के दुःख व दरिद्रता का लोप हो जाएगा।

 

निबंध नंबर : 04

परोपकार

Paropkar

                परोपकार दो शब्दों के योग से बना है। पर और उपकार। पर का अर्थ हुआ ’दूसरों की’ और उपकार का अर्थ हुआ ’भलाई’। अर्थात दूसरों की भलाई करना ही परोपकार है। लेकिन दूसरों की भलाई करते वक्त भाव निःस्वार्थ होने चाहिए। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से किए गए दूसरों के उपकार को ही परोपकार कहा जाता है। परोपकारी वही है जिसका हृदय दीन-दुखियों की आत्र्त पुकार सुनकर द्रवित हो जाता है। परोपकारी वही है जो अपने सामने आए भूखे को देखकर अपने भोजन की थाली उसकी ओर बढ़ा देता है। इसके ठीक विपरित जो इस संसार में सिर्फ अपने लिए जीता है, वह मनुष्य नहीं, अपितु पशु और दानव है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है-

                                यही पशु प्रवृत्ति है कि आप ही आप चरें,

                                मनुष्य वही है जो मनुष्य के लिए मरे।

                सम्पूर्ण प्रकृति परोपकार पर ही आधारित है। सूर्य हमें प्रकाश देता है ओर बदले में कुछ नहीं मांगता। चांद हमें शीतल चांदनी देता है और बदले में कुछ नहीं मांगता; पृथ्वी माता के समान पालन-पोषण करती है और बदले में कुछ नहीं मांगती; वृक्ष जग को मीठे फल खिलाता है और बदले में कुछ नहीं मांगता; सरिता हमें शीतल जल प्रदान करती है और बदले में हमसे कुछ नहीं मांगती। इसी प्रकार मानव-जीवन की भी सार्थकता केवल इसी में है कि वह परोपकार के लिए जिए। कविवर रहीम शब्दों में-

                                वृक्ष कबहू नहीं फल भखै, नदी न सचै नीर।

                                परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।।

                परोपकार की बलिवेदी पर सर्वस्व न्योछावर कर देना ही भारतीय संस्कृति रही है। इस सम्बन्ध में महर्षि दधीचि और राजा शिवि की कहानी उल्लेखनीय है। महर्षि दधीचि ने देवताओं के कल्याण के लिए अपनी हड्डियां तक दान में दे डाली और राजा शिवि ने एक कबूतर की जान बचाने के लिए अपना सम्पूर्ण शरीर काट-काटकर दान में दे दिया। महात्मा बुद्ध एक राजा के पुत्र थे, फिर भी संसार के लोगों के दुख निवारण हेतु उन्होंने राज वैभव को त्याग कर जंगल की राह ली। महाप्रभु ईसा हंसते-हंसते सूली पर चढ़ गए। जनकल्याण हेतु महात्मा गांधी ने बैरिस्टरी का चोंगा उतारकर लंगोटी धारण कर ली।

                अतएव हर मनुष्य को चाहिए कि अगर वह धनी है तो निर्धनों की सहायता करे। यदि वह शक्तिमान है तो अशक्तों को अवलम्बन दे। यदि ज्ञानी है तो अज्ञानों को ज्ञान दे। विघर्थियों को तो प्रारम्भ से ही परोपकार का पाठ पढ़ना चाहिए। पठन-पाठन में समय निकालकर उन्हें गरीब की झोपड़ियों में जाकर वहां कराह रहे लाचार लोगों की सेवा करनी चाहिए। उन्हें टोली बनाकर महामारी एवं अन्य आपदाओं में फंसे लोगों की सहायता करनी चाहिए।

                हमारे मनीषियों एवं साधु-सन्तों ने परोपकार को ही मानव-जीवन का सारतत्त्व माना है।

 

निबंध नंबर : 05

परोपकार

Paropkar

विद्वानों का कथन है कि परोपकार के लिए वृक्ष फलते हैं. नदियाँ बहती है, गऊ माता दूध देती है और सज्जन पुरुषों का ऐश्वर्य दूसरों के हित में रहता है। इसी प्रकार सूर्य-चन्द्रमा भी दूसरों की भलाई के लिए बहुत से काम करते हैं। इसी हेतु धरा सभी प्राणियों के भार को सहन करती है। मेघ बरस-बरस कर सबके लिए अन्न पैदा करते हैं। स्पष्ट है कि सारी प्रकति हमें परोपकार की शिक्षा देता है।

परोपकार करने के कितने ही ढंग हैं? हम धन से दूसरों का हित कर सकते हैं, नंगे को वस्त्र दे सकते हैं, अनपढ़ों के लिए शिक्षा का प्रबन्ध कर सकते हैं। कुएँ खुदवा सकते है और धर्मशालाएँ बनवा सकते हैं। यदि हम भगवान की कृपा से धन से वंचित हैं, तो तन और मन से भी दूसरों की भलाई कर सकते हैं। भूले भटके को राह दिन सकते हैं। प्यासे को पानी पिला सकते हैं और अबलाओं की रक्षा कर सकते हैं। वास्तव में परोपकार ही सच्चा दान है।

आज का मानव यह सब करने से कोसों दूर भाग गया है। उसका हृदय स्वामी से परिपूर्ण हो गया है। उसे हर समय अपने ही सुख की सूझती रहती है। इस का से उसका हृदय परोपकार की भावनाओं से पूर्णतया खाली होता जा रहा है। धनी गान की सदवृत्तियों में बहुत कमी आ गई है। जनता की कराहट, बच्चों का क्रन्दन और असहा अबलाओं की आवाज उनके कान के पर्यों तक पहुँचती ही नहीं। यदि ऐसा ही रहा हो वह दिन शीघ्र ही आ जायेगा, जबकि सारा विश्व प्रलय की भँवर में फँसा होगा।

हमें मानव के मन को पूर्ण रूप से सुधारना होगा, उसकी इस कुवृत्ति को परिष्कत करना होगा और मानव हित के लाभों को समझकर उसकी सदवृत्तियों को इस कार्य में पुनः लगाना पड़ेगा; क्योंकि इसी के द्वारा हम दूसरे के दुःखों को दूर करके आनन्द की प्राप्ति कर सकते हैं। यह हमें यश देकर जनता के हृदय में श्रद्धा का पात्र बना देता है। हमारे कर्णधारों का नाम इसी कारण अधिक उज्ज्वल हुआ है। उनका लक्ष्य और सारा जीवन अपने भाइयों के हित एवं देश को स्वतंत्र कराने में बीता है। उनके परोपकारों को हम कभी भी नहीं भूल सकते।

इतना ही नहीं, भारतीय इतिहास परोपकारी महात्माओं की कथाओं से भरा पड़ा है। महर्षि दधीचि ने देवताओं की भलाई के लिए अपनी हड्डियाँ तक दे डाली थीं। महाराज शिवि ने शरणागत की रक्षा के लिए शरीर का माँस काट-काट कर दे दिया था। दानवीर कर्ण ने याचक के रूप में आए हुए देवता को अपना सोने का दाँत तोडकर दे दिया था। इन्हीं लोगों के परोपकार पूर्ण कार्यों से मानवता सुख और शान्ति की सांसें ले रही है। वास्तव में मानव जीवन की समर्थता परोपकार की पवित्र भावना में ही निहित है। यदि हममें इसका अभाव है, तो हम पशुओं से भी बदतर हैं।

परोपकार के द्वारा सुख, शांति, स्नेह, सच्चा त्याग, सहानुभूति और सहनशीलता आदि गुणों से मानव जीवन परिपूर्ण हो सकता है। अतः हमें परोपकार यश पाने के उद्देश्य से नहीं अपितु कर्त्तव्य समझकर करना चाहिए। यही मानव का सबसे बड़ा धर्म है।

निबंध नंबर : 06

 

परोपकार

Paropkar

 

परोपकार का अर्थ है-दूसरों का उपकार करना । बिना किसी स्वार्थ, लोभ या लालच के दूसरों की भलाई करना ही परोपकार है । ब्रह्मपुराण में लिखा है-जीवितं सफलं यः परार्थोद्यतः सदा अर्थात् उसी का जीवन सफल माना जाता है जो नित्य परोपरकार में प्रवृत्त रहता है । परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है तथा दूसरों को पीड़ा देने के समान कोई पाप नहीं है । महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी भी पाप और पुण्य की व्याख्या करते हुए लिखते हैं-

परहित सरिस धरम नहिं भाई

पर पीड़ा सम्नहिं अधमाई

 

जो व्यक्ति दूसरे को सुख,मान, धन देता है उसे अपने आप ही सुख, मान” और धन प्राप्त हो जाता है जैसे उपकारी व्यक्ति के साथ रहकर इस प्रकार सुख मिलता है जैसे मेहंदी बांटने वाले को भी मेहंदी का थोड़ा सा रंग लग ही जाता है ।

प्रकृति का कण कण हमें परोपकार के लिए प्रेरित करता है । वृक्ष कभी भी अपने फल आप नहीं खाते नदियाँ अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं तथा सुबह से शाम तक निरन्तर प्रवाहित होती रहती हैं । सन्तों का जीवन परोपकार के लिए होता है । कबीर जी कहते हैं-

वृक्ष कबहुँ फल भटवें, नदी संचै नीर

परमार्थ के कारने,साधुन धरा शरीर

भारतीय संस्कृति के मूल में मानव कल्याण की भावना ही तो निहित है । ऋगवेद में लिखा है-“सैंकड़ों हाथों से इक्ट्ठा करो और सहस्त्रों हाथों से बांटो

यहाँ पर कार्य इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही होता था । भारतीय संस्कृति की भूल भावना ‘वसुदैव कुटुम्बकम्’ पर आधारित थी अर्थात् सारा विश्व ही सारा परिवार है (The whole universe is one family.) । इसीलिए भारत के ऋषि मुनियों ने सारे विश्व के कल्याण की कामना करते हुए लिखा-

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत

अर्थात् विश्व के सभी लोग सुखी हों, सभी नीरोग हो, सबका कल्याण हो, किसी को भी कोई दुःख न हो । मनुष्य का वैभव भी प्रकृति के समान दूसरों के काम आए ; यही ईश्वर की कामना जान पड़ती है ।

मनुष्य और पशु में खाने-पीने, सोने और भोग प्रवृति समान होने पर अन्तर यह है कि पशु केवल अपने तक ही सीमित रहते हैं । यदि मनुष्य के साथ ऐसा व्यवहार करें तो फिर मनुष्य और पशु में अन्तर ही क्या रह जाएगा । गुप्त जी कहते हैं-

यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे

मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे

मानव जीवन का उद्देश्य यही है कि वह अपने कल्याण के साथ साथ दूसरों का भी कल्याण करे । ज्ञान देने से ज्ञान बढ़ता है, सुख देने से सुख बढ़ता है तथा इसी प्रकार धन देने से धन की वृद्धि होती है । जो वस्तु आपके पास है उससे दूसरों को लाभ उठाने दो । कुछ नहीं दे सकते तो दूसरों को मंगल कामना ही दीजिए, आशीर्वाद दीजिए, शुभ सम्मति सान्तवना दीजिए, उनके कष्टों की ओर ध्यान दीजिए, भूलों के लिए क्षमा कीजिए और बड़ों को सम्मान तथा छोटों को प्यार दीजिए । किसी को अपना बना बनाया घर नहीं तो कम से कम संकट के समय उसे शरण तो दे ही सकते हैं । जीवन का केवल उद्देश्य खाओ, पियो और ऐश करो नहीं बल्कि उस परमेश्वर की सन्तान के साथ सहानुभूति, संवेदना और सहयोग के साथ सेवा करे । परहित साधना ही मनुष्यता है और यही सबसे बड़ा परमात्मा का भजन है ।

ऐसी महान विभतियों का आज ही हमारा इतिहास यशोगान कर रहा है जिन्होंने परोपकार के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगा दी । वृत्तासुर के वध के लिए दधीचि ऋषि ने अपनी जांघ की हड्डी दे दी । राजा शिवि ने कबूतर की रक्षा के लिए कबूतर के बराबर अपने शरीर का माँस दे दिया । दानवीर कर्ण ने ब्राह्मण वेश में आए भगवान् को अपने कवच कुण्डल दान कर दिए ।

परोपकार के लिए सुपात्र का ध्यान रखना भी परमावश्यक है । जिस प्रकार वर्षा का प्रभाव समुद्र में नहीं, खेतों में ही देखा जाता है इसी प्रकार परोपकार भी दीन दुखियों के लिए ही होना चाहिए । सुपात्र वह है जो शारीरिक आर्थिक अथवा सामाजिक दुर्बलताओं के कारण असमर्थ हो । उसी को शक्ति प्रदान करना, उठाना, मुक्त बनाना परोपकार कहा जाएगा, निर्बल, अनाथ और रोगी दान के पात्र होते है ।

आज जब चारों ओर युद्ध की विभीणिका अपना तांडव नृत्य कर रही है और इस संसार को श्मशान बनाने के लिए उत्सुक दिखाई दे रही हैं इस बात की आवश्यकता है कि संसार के लोग पंचशील के शान्ति सन्देश को अपनाकर अपने ही देश का नहीं परन्तु पूरे विश्व का कल्याण करे और पूरी मानवता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दें । जिस शरीर से धर्म न हुआ, यज्ञ न हुआ और परोपकार न हो सका, उस शरीर को धिक्कार है । ऐसे शरीर को तो पशु-पक्षी भी नहीं छूते । यदि मनुष्य निरन्तर सुखी रहना चाहता है तो उसे परोपकार के लिए जीवित रहना चाहिए ।

निबंध नंबर : 07

परोपकार

Paropkar

 

संकेत बिंदुभारतीय संस्कृति में परोपकारपरोपकार का अर्थप्रकृति से उदाहरणपरोपकार श्रेष्ठ धर्म

भारतीय संस्कृति में सदैव से ‘बहुजन हिताय’ को महत्त्व दिया जा रहा है। ‘परोपकार’ शब्द की रचना भी ‘पर + उपकार’ से हुई है अर्थात् दूसरों की भलाई करना। परोपकार में स्वार्थ का दश नहीं रहता। दूसरों की नि:स्वार्थ सेवा ही परोपकार की श्रेणी में आती है। जिस कार्य में स्वार्थ छिपा हो, उसे परोपकार नहीं कहा जा सकता। प्रकृति में भी परोपकार की भावना दृष्टिगोचर होती है। नदियाँ अपना जल कभी नहीं पीती, यद्यपि अनंत जलराशि समेटकर वे अनवरत रूप से प्रवाहित होती हैं। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते। आँधी और तूफान सहकर भी वे दूसरों को आश्रय देते हैं। बादल युग-युगांतर से जल लाकर पृथ्वी के अंचल को सिंचित करते हैं, परंतु प्रतिदान में कुछ भी नहीं मांगते। प्रकृति परहित के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करती रहती है। हमारे इतिहास में परोपकार के अनेक दृष्टांत दृष्टिगोचर होते हैं। ऋषि दधीचि ने तो परोपकार के लिए अपनी अस्थियाँ तक दान दे दी थीं। महाराज शिवि ने अपना मांस तक दे डाला था। संतों का जीवन तो परोपकार के लिए ही होता है। परोपकार मानव का सबसे श्रेष्ठ धर्म है। मनुष्य समस्त जीवन अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु प्रयत्नशील रहता है, परंतु सच्चा मानव वही होता है जो ‘स्व’ की संकुचित परिधि को लांघकर ‘पर’ के लिए जीता तथा मरता है। इन सब उदाहरणों से सिद्ध होता है कि परहित से अधिक महत्त्वपूर्ण अन्य कार्य नहीं है। हमें अपने जीवन का कुछ भाग परोपकार के कामों में लगाना चाहिए। परोपकार करके हमारे मन को बड़ी शांति का अनुभव होता है। यह एक ऐसा सद्गुण है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अपनाना चाहिए। यह सबसे बड़ा धर्म है। इससे बड़ा धर्म और कोई नहीं है।

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commentscomments

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