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Hindi Essay on “Paradhinta ” , ”पराधीनता ” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

पराधीनता

Paradhinta

निबंध नंबर : 01 

     पराधीनता का आशय – पराधीनता का आशय है – दुसरे के अधीन | अधीनता बहुत बड़ा दुःख है | हर आदमी स्वतंत्र रहना चाहता है | यहाँ तक कि सोने के पिंजरे में बंद पक्षी भी राजमहल के सुखों और स्वादिष्ट भोगों को छोड़कर खुले आकाश में उड़ जाना चाहता है |

     स्वतंत्रता : जन्मसिद्ध अधिकार – प्रत्येक बच्चा सवतंत्र पैदा होता है | किसी मनुष्य, देश, समाज या राष्ट्र को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति, देश समूह या राष्ट्र को बलपूर्वक अपने अधीन करे | आज विश्व के अधिकांश संविधान यह स्वीकार कर चिके हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता का अधिकार है |

     मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है –

अधिकार खोकर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है |

न्यायार्थ अपने बंधू को भी दंड देना धर्म है |

     पराधीनता की हानियाँ – पराधीन व्यक्ति जीवित होते हुए भी मृत के समान होता है | वह दासों के समान परायी और बसी ज़िंदगी जीता है | वह सदा अपने मालिक की और टुकर-टुकर निहारता है | हितोपदेश में कहा गया है – “जो प्रधीन्होने पर भी जीते हैं तो मरे हुए कौन हैं ?”

     पराधीनता के प्रकार – पराधीन केवल बही नहीं होता, जिसके पैरों में बेड़ियाँ हों या चारों और दीवारों का घेरे हो | वह व्यक्ति भी पराधीन होता हिया जिसका मन गुलाम है | जैसे अंग्रेजों ने भारतियों को आज़ाद कर दिया, परंतु अनके भारतियों के मन अब भी अंग्रेजों के गुलाम हैं | जैसे अंग्रेजों ने भारतियों को आज़ाद कर दिया, परंतु अनके भारतियों के मन अब भी अंग्रेज़ों के गुलाम हैं | वे आज भी अंग्रेज़ीदां होने में गर्व अनुभव करते हैं | भला ‘निज संस्कुती’ से उखड़े हुए ऐसे लोगों को स्वाधीन या स्वतंत्र कैसे कहें ?

     आर्थिक पराधीनता – पराधीनता का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रकार है – अधिक पराधीनता | गरीब देशों को न चाहते हुए भी अपने ऋणदाता देशों की कुछ गलत बारें माननी पड़ती हैं | अतः यदि भारतवासियों को आज़ादी का सुख भोगना है तो उन्हें पराधीनता की हर बेड़ी को तोड़ना होगा |

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

     मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति : मन – मानव की सबसे बड़ी शक्ति ‘मन’ है | मनुष्य के पास मन है, इसलिए वह मनुष है, मनुज है, मानव है | मानसिक बाले पर ही मनुष ने आज तक की यह सभ्यता विकसित की है | मन मनुष्य को सदा किसी-न-किसी कर्म में रत रखता है |

     मन के दो पक्ष : आशा-निराशा – धुप-छाँव के समान मनव-मन के दो रूप हैं – आशा-निराशा | जब मन में शक्ति, तेज और उत्साह ठाठें मारता है तो आशा का जन्म होता है | इसी के बल पर मनुष्य हज़ारों विपतियों में भी हँसता-मुस्कराता रहता है |

     निराश मन वाला व्यक्ति सारे साधनों से युक्त होता हुआ भी युद्ध हर बैठता है | पांडव जंगलों की धुल फाँकते हुए भी जीते और कौरव राजसी शक्ति के होते हुए भी हारे | अतः जीवन में विजयी होना है तो मन को शक्तिशाली बनाओ |

     मन को विजय का अर्थ – मन की विजय का तात्पर्य है – काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे शत्रुओं पर विजय | जो व्यक्ति इनके वश में नहीं होता, बल्कि इन्हें वश में रखता है, वह पुरे विश्व पर शासन कर सकता है | स्वामी शंकराचार्य लिखते हैं – “जिसने मन जो जीत लिया उसने जगत को जीत लिया |”

     मन पर विजय पाने का मार्ग – गीता में मन पर नियंत्रण करने के दो उपाय बाते गए हैं – अभ्यास और वैराग्य | यदि व्यक्ति रोज़-रोज़ त्याग या मोह-मुक्ति का अभ्यास करता रहे तो उसके जीवन में असीम बल बल आ सकता है |

     मानसिक विजय ही वास्तविक वियज – भारतवर्ष ने विश्व को अपने मानसिक बल से जीता है, सैन्य-बल से नहीं | यही सच्ची विजय भी है | भारत में आक्रमणकारी शताब्दियों तक लड़-जीत कर भी भारत को अपना न बना सके, क्योंकि उनके पास नैतिक बल नहीं था | शरीर-बल से हारा हुआ शत्रु फिर-फिर आक्रमण करने आता है, परंतु मानसिक बल से परास्त हुआ शत्रु स्वयं-इच्छा से चरणों में लोटता है | इसीलिए हम प्रभु से य्ह्ही प्राथना करते हैं – मानसिक बल से परस्त हुआ शत्रु स्वयं-इच्छा से चरणों में लोटता है | इसीलिए हम प्रभु से यही प्रार्थना करते हैं –

हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें |

दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें ||

 

निबंध नंबर : 02 

पराधीनता

Paradhinta

                                मनुष्य के लिए पराधीनता अभिशाप के समान है। पराधीन व्यक्ति स्वप्न में भी सुख का अनुभव नहीं कर सकता है। समस्त भोग-विलास व भौतिक सुखों के रहते हुए भी यदि वह स्वतंत्र नहीं है तो उसके लिए यह सब व्यर्थ है। पराधीन मनुष्य की वही स्थिति होती है जो किसी पिंजड़ें में बंद पक्षी की होती है जिसे खाने-पीने की समस्त सामग्री उपलब्ध है पंरतु वह उड़ने के लिए स्वतंत्र नहीं है। हालाँकि मनुष्य की यह विडंबना है कि वह स्वंय अपने ही कृत्यों के कारण पराधीनता के दुश्चक्र में फँस जाता है।

                                पराधीनता के दर्द को भारत और भारतवासियों से अधिक कौन समझ सकता है जिन्हें सैकड़ों वर्षों तक अंग्रेजी सरकार के अधीन रहना पड़ा। स्वतंत्रता के महत्व को वह व्यक्ति पूर्ण रूप से समझ सकता है जो कभी पराधीन रहा है। हमारी स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इस स्वतंत्रता के लिए कितने वर्षों तक लोगों ने संघर्ष किया, कितने ही अमर शहीदों ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए हँसते-हँसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।

                                पराधीनता के स्वरूप को यदि हम देखें तो हम पाएँगें कि पराधीन व्यक्ति के लिए स्वेच्छा अर्थहीन हो जाती है। उसके सभी कार्य दूसरों के द्वारा संचालित होते हैं। पराधीन मनुष्य एक समय अंतराल के बाद इन्हीं परिस्थितियों मंे जीने और रहने का आदी हो जाता है। उसकी अपनी भावनाएँ दब जाती हैं। वह संवेदनारहित हो जाता है। तत्पश्चात वह यंत्रवत् होकर काम करता रहता है। ऐसे व्यक्ति को मरा हुआ ही समझा जाता है क्योंकि संवेदनारहित व्यक्ति जिसकी स्वंय की इच्छा या भावनाएँ न हो तो उसका जीवन ही निरर्थक हो जाता है। ऐसे में कोई महापुरूष ही सामान्य जनों को जागृत कर सकते हैं। आम आदमी अपनी पारिवारिक चिंताओं से बाहर निकलने का साहस नहीं जुटा पाता है।

                                प्रसिद्ध फ्रांसीसी रूसों के अनुसार – मानव स्वतंत्र जन्मा है किंतु वह प्रत्येक जगह बंधनों से बँधा हैं। इस कथन पर यदि प्रकाश डालें तो हम पाते है कि मनुष्य प्रत्येक ओर से सांसारिक बंधनों में जकड़ा हुआ है परंतु कुछ बंधन उसने स्वीकार नहीं किए है। परिवार के प्रति उत्तरदायित्वों का निर्वाह, देश अथवा राष्ट्र के उत्थान के लिए प्रयत्न तथा आत्मविश्वास के लिए स्वंय को नियंत्रित करके चलना आदि को पराधीनता नहीं की सकते। इल कृत्यों सें उसकी संवेदनाएँ एवं उसकी स्वेच्छा सम्मिलित है। परंतु अपनी इच्छा के विरूद्ध विवश्तापूर्वक किया गया कार्य पराधीनता का ही एक रूप है। बाल मजदूरी, बँधुआ मजदूरी, धनी एवं प्रभुत्व संपन्न व्यक्तियों की चाटुकारिता पराधीनता के ही विभिन्न रूप कहे जा सकते हैं।

                                पराधीनता से स्वंय का अस्तित्व ही नहीं रह जाता हे। इसके दूरगामी परिणाम होते हैं। आज हमारा युवा वर्ग देश की संस्कृति को उपहास और उपेक्षा की दृष्टि से देखता है तथा पाश्चात्य संस्कृति में विलीन होना चाहता हैं। यह भी पराधीनता का ही एक रूप है। यह एक प्रकार की परतंत्रता की मानसिकता का ही उदाहरण है। अपनी निजता और अस्तित्व को भुलाकर दिखावे और बाह्य आंडबर को प्राथमिकता देना भी पराधीनता का ही एक रूप है। निःसंदेह पराधीनता व्यक्ति को ही नहीं अपितु पूरे समाज और राष्ट्र को पतन की ओर ले जाती है।

                                हमारे देश के लिए इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात और क्या हो सकती है कि हम सैंकड़ों वर्षों की परतंत्रता के बाद मिली आजादी के महत्व को भुला बैठे हैं। देश के सभी क्षेत्रों मे व्याप्त भ्रष्टाचार, लूटमार, कालाबाजारी, व्यभिचार, दुराचार, कमजोरों का उत्पीड़न आदि अनैतिकता को सहज रूप मंे अपनाकर हम स्वतंत्रता के महत्व को भुला रहे हैं। यह उन शहदों और अमर सेनानियों के बलिदान व कुर्बानियों का तिरस्कार ही होगा। अतः हम सभी देशवासियों के महत्व को समझें और प्रयास करें कि हमें पुनः पराधीनता का सामना न करना पड़े।

निबंध नंबर : 03

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं

Paradhin Sapnehu Sukh Nahi

 

गोस्वामी तुलसीदास जी ने ’रामचरितमानस’ में कहा है- ’’पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’’ अर्थात् पराधीन व्यक्ति कभी सपने में सुख प्राप्त नहीं कर सकता। इसी प्रकार वियोगी हरि ने भी पराधीनता को सबसे अधिक दुःख वस्तु माना है-

’’ पराधीन जेच र नहीं, स्वर्ग-नरक ता होत।

पराधीन जेच र, नहीं स्वर्ग-नरक ता होत।।’’

                अर्थात् पराधीन व्यक्ति के लिए सुुख और दुःख में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। यह स्वर्ग और नरक में कोई में कोई भेद नहीं कर पाता। स्वर्ग का महत्व तो स्वतंत्र व्यक्ति के लिए होता है।

संस्कृत में एक उक्ति है- ’’पारतन्त्रय महादुःखम् स्वातन्त्रयम् परम् सुखम्।’’ अर्थात् परानन्त्रता महादुःख है और स्वतंत्रता महासुख। लोकमान्य तिलक ने भी नारा लगाया था-’’स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्व अधिकार है।’’ यह अधिकार केवल मानव को ही प्राप्त नहीं है, बल्कि सृष्टि के समस्त प्राणियांे को प्राप्त है। मुक्त गगन में विचरण करने वाला पक्षी कभी भी  पिंजरे में बंद नही होना चाहता। वह सोने के पिंजरे मे भी अपनी मुक्ति के लिए पंख फड़फड़ाता है। जब पक्षी अपनी स्वतन्त्रता के लिए इतना व्याकुल रहता है तो मनुष्य जाति का स्वाधीनता के लिए तड़प रखना स्वाभाविक है। मनुष्य तो बुद्विमान प्राणी है। इसी स्वतन्त्रता को पाने के लिए हमारे स्वतनत्रता-प्रेमियों ने अपने प्राणों की बलि दे दी। वे हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने देशवासियों को ललकारा-’’तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’’ अर्थात् हमने अपना खून बहाकर भी आजादी चाही थी।

                पक्षी उन्मुक्त गगन में उड़ना चाहते हैं। उन्हें पिंजरे में बंद होकर सोने की कटोरी मे खाना प्रिय नहीं लगता। उनकी भावानाओं को व्यक्त करते हुए शिवमंगल सिंह ’सुमन’ लिखते है-

                                                ’’हम पंछी उन्मुक्त गगन के, पिंजरबद्व न गा पाएँगे।

                                                कनक-तीलियों से टकराकर, पुलकित पंख टूट जाएँगे।

                                                स्वर्ण-श्रृंखला के बन्धन में, अपनी गति, उड़ान सब भूले।

                                                बस सपनों मे देख रहे हैं, तरू की फुगनी पर के झूले।’’

                पराधीनता मानव के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। स्वतंत्रता के अभाव में मानव का पूर्ण विकास सम्भव ही नहीं है। पराधीन व्यक्ति अकर्मण्य हो जाता है क्योंकि उसमें आत्मविश्वास खत्म हो जाता है। उसका बौद्विक विकास रूक जाता है। पराधीन व्यक्ति भौतिक सुखों को ही सब कुछ मान बैठता है और कई बार तो वह इनसे भी वंचित रहता है। पराधीनता व्यक्ति के बौद्विक हास के लिए जिम्मेदार है। उनके सोचने-समझने की शक्ति समाप्त हो जाती है। उसकी सजृनात्मक क्षमता भी धीरे-धीरे लुप्त होती चली जाती है।

                इस संसार में स्वाधीन बनकर जीना सीखो। स्वतंत्रता का महत्व बताते हुए कवि बनकर लिखते हैं-

                                                ’’स्वतंत्रय गर्व उनका, जो नर फाकों में प्राण गंवाते हैं,

                                                पर, नहीं बेच मन का प्रकाश, रोटी का मोल चुकाते हैं।’’

                पराधीनता हमें कभी भी नहीं बना सकती। सुख वस्तुओं में निहित नहीं है। व्यक्ति की स्वतन्त्रता सबसे बड़ी चीज है। पराधीन व्यक्ति की हँसी-खुशी गायब हो जाती है। भारतभूषण अग्रवाल के शब्दों में-

                                                                ’’हँसी फूल में नहीं, हँसी गंध मंे नहीं।

                                                                गीत कंठ में नहीं, हँसी, गंध, गीत सब मुक्ति में हैं।’’

                पराधीनता की स्थिति में न केवल व्यक्ति ही, बल्कि राष्ट्र भी अपना विकास नहीं कर पाता है। एक पराधीन राष्ट्र की जनता किसी भी स्थिति में सुखी नहीं हो सकती है। किसी राष्ट्र की पराधीनता की स्थिति में होने पर उसके जनमानस का विकास रूक जाता है।

 

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