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Hindi Essay on “Nirastrikaran” , ”निरस्त्रीकरण” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

निरस्त्रीकरण

Nirastrikaran

शस्त्रास्त्रों की दौड़ और उसके फलस्वरूप होने वाले युद्धों से मुक्त समाज का निर्माण ही निरस्त्रीकरण का मूल लक्ष्य है। निरस्त्रीकरण का सामान्य और व्यावहारिक अर्थ है, आज जो भयानकटतम मारक शस्त्रास्त्र बन रहे हैं, उनका निर्माण रोकना और विनाशक युद्धों का भय टालना। इसके सथ यह बात भी जुड़ी हुई है कि आज तक जिते भी आणविक शस्त्रास्त्र बन चुके हैं, सभी निर्माता राष्ट्र एक साथ  मिलकर उन्हें नष्ट कर दें। ताकि आज जो तीसरे विश्व-युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं, जिसके कारण मानवता भयभीत होकर अनेक प्रकार की आशंकाओं में जी रही है, उनका खतरा टल सके। सभी देश शांतिपूर्वक रहकर प्रगति और विकास की राहों पर बढ़ते हुए मानव की बुनियादी समस्याओं के समाधान खोज सकें। यह एक मान्य तथ्य है कि निरस्त्रीकरण के बिना ऐसा सब कर पाना कतई संभव नहीं हो सकता।

निरस्त्रीकरण क्यों आवश्यक है? प्रश्न का उत्तर स्पष्ट है। वह यह कि आज जो संघातक आणविक शस्त्रास्त्रों का लगातार निर्माण हो रहा है, वह निकट भविष्य में ही विश्व-युद्ध की आशंकाओं को जन्म देने वाला है। दूसरे-यदि इस प्रकार के शस्त्रास्त्रों से युद्ध होगा तो आक्रामक और आक्रांत तो मरेंगे ही, बाकी विश्व भी उस महानाश से अप्रभावित न रह सकेगा। तीसरे, युद्ध की स्थिति में युग-युगों की अनवरत साधना के बाद सभ्यता, संस्कृति, कला-विज्ञान आदि विभिन्न क्षेत्रों में मनुष्य ने जो उपलब्धियां प्राप्त की हैं, वे सभी विनष्ट होकर भूली-बिसरी कहानी बनकर रह जाएंगी। स्वंय विज्ञान भी नहीं रह पाएगा। चौथे, शस्त्रास्त्रों के निर्माण से शक्ति-संतुलन बिगड़ता है। निहित स्वार्थी तानाशाही प्रवृतियों वाले छोटे-छोटे देशों के लोग और नेता भी अपने विकास एंव जनहित के कार्यों को भूल-भाल अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए उन्हें पाने के प्रयत्नों में जुट जाएंगे, जैसा कि पाकिस्तान आदि कुछ देशों में हो भी रहा है। इसका प्रभाव आस-पड़ोस के देशों पर पड़ता है। परिणामस्वरूप और सब भूल उन्हें भी शस्त्रास्त्रों की अंधी होड़ में शामिल हो जाना पड़ता है। जैसा कि शांतिप्रिय और युद्ध के कट् अर विरोधी भ्ज्ञारत को होना पड़ रहा है। पांचवें, शस्त्रबल का प्रयोग आज अपनी चौधराहट जमाने, दूसरे राष्ट्रों को नाहक दबाने और तनाव पैदा किए रहने के लिए भी किया जाता है। अमेरिका जैसे संपन्न और शस्त्र बल से उन्नत देश यही सब कर रहे हैं। इस मनोवृत्ति को कदापि उचित एंव स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार शस्त्रों का निर्माण अनेक प्रकार की समस्यांए उत्पन्न कर देता है। यही कारण है कि आज संयुक्त राष्ट्रसंघ के मंचों से ही नहीं, अन्य सभी प्रकार के मानव-हितैषी मंचों से भी निरस्त्रीकरण की मांग निरंतर उठती रहती है।

शस्त्रों के अंधाधुंध निर्माण का एक और कुफल भी सामने आ रहा है। यह कुफल व्यावसायिक दृष्टिकोण के कारण उभरकर सारी मानवता के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन चुका है। शस्त्रों का व्यापार-व्यवसाय करने वाले आर्थिक मुनाफाखोरी के लिए उचित-अनुचित सभी उपाय अपनाकर, अपनी बिक्री बढ़ाने का यत्न करते हैं। इस प्रकार जब शस्त्रास्त्रों के अंबार लग जाएंगे, तब प्रश्न उठेगा कि इतनी खपत कहां और कैसे हो? जब तक पुराने खप नहीं जाते, नए बनाने से लाभ नहीं हो सकता। तब इन शस्त्र-व्यापारियों के एजेंट और दलाल ओछे हथकंडे अपनाकर बिना कारण या सामान्य कारणों के लिए देशों में तनाव और युद्ध की स्थितियां पैदा कर दिया करते हैं। मानवता चाहे मरकर अतीत की कहानी बन जाए, मौत के इन व्यापारियों को तो अपने लिए शुद्ध आर्थिक लाभ चाहिए। इन सब दूषित मनोवृत्तियों एंव प्रवृत्तियों के निराकरण के लिए भी आज निरस्त्रीकरण बहुत आवश्यक है। ऐसा करके उपलब्ध साधनों और बचे धन से मानवता का हित-साधन हो सकता है। गरीबी, भुखमरी और अन्य प्रकार की बुराइयों के विरुद्ध संषर्घ छेड़ा जा सकता है।

शस्त्रीकरण की प्रवृत्ति का प्रयोग एंव उपयोग अपने राजनीतिक लाभों, शक्ति की राजनीतिक सफलता के लिए आज सर्वाधिक हो रहा है। यही कारण है कि बड़े और उन्नत राष्ट्र निरस्त्रीकरण की बातें तो करते हैं, पर खुले दिलोदिमाग से नहीं बल्कि संदेह-आशंकाओं से भरकर और मन में खोट या अपने लाभ की बात सोचकर। इसलिए उचित परिणाम सामने नहीं आ पाता। यही कारण है कि आज तक निरस्त्रीकरण के लिए कई सम्मेलन हो चुके हैं, संबंद्ध बड़े राष्ट्रों में वार्ताएं हो चुकी हैं पर परिणाम नदारद है।यदि वास्तव में हम मानवतावादी हैं, मानवता का भविष्य सुरक्षित रख फलता-फूलता देखना चाहते हैं, तो सभी प्रकार के स्वार्थों से ऊपर उठ एक साथ और एक ही बार में निरस्त्रीकरण करना होगा। इसके लिए बातों की नहीं, व्यवहार की आवश्यकता है। परंतु क्या वणिक मनोवृत्ति वाले राष्ट्र ऐसा व्यवहार अपना सकेंगे? लगता तो यही है कि वे अपने स्वार्थों को आगे रख मानवता को मर जाने देंगे। कितना भयावह होगा वह दिन और दृश्य? सोचकर अमल करने की बात है। रूस द्वारा इस दिशा में उठाया गया गया कदम एक अच्छी पहल और शुरुआत है। उसका अनुकरण कर जब अमेरिका आदि देश भी वैसा ही करेंगे, तभी यह उद्देश्य पूरा हो सकेगा, अन्य किसी भी तरह नहीं।

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