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Hindi Essay on “Dr. Zakir Hussain” , ”डॉ. जाकिर हुसैन” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

डॉ. जाकिर हुसैन

Dr. Zakir Hussain

डॉ. जाकिर हुसैन भारत के तीसरे राष्ट्रपति थे। उनके जीवन में अनेक कठिनाइयां आई, किंतु उन्होंने धैर्य के साथ सभी कठिनाइयों का सामना किया। वह एक साधारण परिवार में जनमें थे। हां, उनका हौसला बुलंदियों पर था।

डॉ. जाकिर हुसैन का जन्म 8 फरवरी 1897 को हैदराबाद में हुआ। उनके पूर्वज अफगानिस्तान से संबंद्ध थे। उनके जन्म के लगभग सौ वर्ष पूर्व उनके पूर्वज भारत में आकर फर्रुखबाद में बस गए थे। यहां वे लोग कायमगंज कस्बे में रहते थे।

बचपन में ही बालक जाकिर के पिता की मृत्यु हो गई। कुछ ही समय बाद उनकी माता का भी निधन हो गया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा इस्लामिया हाई स्कूल, फर्रुखाबाद में हुई। बालक जाकिर कितने साहसी और परिश्रमी थे यह एक घटना से स्पष्ट हो जाता है। इस घटना के बारे में उन्होंने स्वंय लिखा है-

‘हाई सकूल परीक्षा पास करने के बाद मैं छात्रवृति-परीक्षा देने के लिए आगरा गया था। परीक्ष्ज्ञा के बाद मंै कायमगंज लौटा। घर से इस बार मेरे लिए छकड़ा भी नहीं आया था। स्टेशन से घर काफी दूर था। पैदल चलकर घर पहुंचा। घर जाकर देखा तो सभी दरवाजे बंद थे। पास-पड़ौस के लोगों से मालूम हुआ कि मेरे सिर से मां का साया उठ चुका है। मैं अनाथ हो चुका था। मैं असहाय होकर सोचने लगा तो मां का कहना याद आया अपने आप काम करो। कभी घबराओ नहीं, पुरखों का नाम रोशन करो। इसी के बल पर हम सभी भाई अपने पैरों पर खड़े हुए। मैं इस जीवन-संदेश को कभी नहीं भूला।’

लाचार की हालत तो थी ही, किसी तरह उन्होंने पढ़ाई पूरी की। उच्च शिक्षा के लिए अलिगढ़ विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। स्नातकोत्तर परीक्षा के दौरान कुछ परेशानियां अवश्य आईं। उन दिनों उनकी पढ़ाई सुचारू रूप से नहीं हो पाई थी। कुछ लोगों ने उन्हें परीक्षा न देने की राय दी। जाकिर सबकी सुनते रहे। वे जानते थे कि इस तरह उनका एक वर्ष बरबाद हो जाएगा। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बड़ी लगन से परीक्षा की तैयारी कर डाली। उनका श्रम सार्थक हुआ। परीक्षा में उन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। अच्छे अंक पाने के कारण उन्हें छात्रवृति मिलने लगी। उसी छात्रवृति के बल पर वह आगे की शिक्षा ग्रहण करने के लिए यूरोप चले गए। उन्होंने जर्मन विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वहां से उन्होंने साहित्य और दर्शनशास्त्र में डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की।

पढ़ाई पूरी कर वह स्वदेश लौटे। उन दिनों महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन जोरों पर था। गांधीजी के आह्वान पर जाकिर हुसैन भी उस आंदोलन में शामिल हो गए थे।

दिल्ली स्थित सुप्रसिद्ध संस्था जामिया मिल्लिया इसलामिया उन्हीं की देन है। स्वदेशी शिक्षा के लिए उन्होंने भरपूर दबाव डाला था। गांधीजी द्वारा संचालित हिंदुस्तानी तालीमी संघ के वे कर्मठ कार्यकर्ता थे।

उनकी कथनी-करनी में कोई अंतर नहीं था। वह एक कुशल अध्यापक थे। डॉ. जाकिर हुसैन राज्यसथा के सदस्य भी मनोनित किए गए। वे बिहार के राज्यपाल भी रहे। सन 1952 में वे देश के उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुए।

ङ्क3 मई 1967 को वह भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। राष्ट्रपति बनने के दो वर्ष के बाद 1 मई 1969 को हदय गति रुक जाने के कारण भारत माता के इस सपूत का निधन हो गया था।

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