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Hindi Essay on “Dal-Badal ki Rajniti” , ”दल-बदल की राजनीति” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

दल-बदल की राजनीति

Dal-Badal ki Rajniti

                दल-बदल का सामान्य अर्थ अपने दायित्व को त्यागना या उससे मुकरना है। लेकिन राजनीति में विशेष स्थितियों में इसके विभिन्न स्वरूप होते हैं। जैसे-दल का बदलना, जिस दल के अधीन चुनाव लड़े उस दल का त्याग, कोई दल छोड़ना या फिर उसमें शामिल होना आदि। अभी तक दल-बदल की कोई सार्वभौमिक एवं सर्व स्वीकृत परिभाषा नहीं बन पाई है। इस दिशा में डाॅ. सुभाष कश्यप की परिभाषा बहुत हद तक दल-बदल की अवधारणा को स्पष्ट करती है। उनके अनुसार दल-बदल का मतलब राजनीतिक प्रतीक का बदलना है, जिसमें निम्नलिखित मामले शामिल हो सकते हैं-

एक दल के टिकट पर विधायक चुना जाना और फिर उस विशेष दल को छोड़कर अन्य दल में चला जाना।

दल से त्यागपत्र देकर अपने को निर्दलीय घोषित कर देना।

निर्दलीय के रूप में चुनाव जीतकर किसी विशेष दल में शामिल हो जाना।

                यदि कोई विधायक या सांसद किसी मामले में दल से त्यागपत्र दिए बिना अपने दल के विपरीत मत देता है तो उसे किसी भी रूप में दल-बदल से कम नहीं माना जाना चाहिए। वस्तुतः दल-बदल की प्रक्रिया उसी समय शुरू हो जाती है जब व्यक्ति चाहे किसी भी उद्देश्य से अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलता है। मूलतः राजनीतिक दल-बदल की क्रिया का प्रेरक किसी लाभ की संभावना होती है। सामान्यतः दल-बदलू वे लोग है जो राजनीतिक लाभ के लिए अपनी अवस्था बदल लेते हैं। यद्यपि कुछ राजनेताओं ने सैद्धांतिक आधार एवं नीतिगत मतभेदों के आधार पर कोई दल छोड़ा है तथापि अधिकतर मामलों में राजनीतिक दल-बदल का कारण घोर अवसरवादिता तथा पद-लाभ की आकांक्षा रही है। यदि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो लोकतांत्रिक स्वरूप के शासन मंे दल-बदल विभिन्न स्वरूपों एवं मात्राओं में पाया जाता है। विश्व का कोई लोकतांत्रिक देश इसका अपवाद नहीं है। ब्रिटेन में ग्लेडस्टन, चर्चिल जैसे महान नेताओं ने सदन में अपना पाला बदला। यदि हम स्वतंत्रता पूर्व इतिहास को देखें तो श्यामलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल, हाफिज मुहम्मद इब्राहिम जैसे कई नाम हैं, जिन्होंने कई पद लाभों के लिए अपनी दलीय प्रतिबद्धताएं बदलीं। 1967 के पूर्व आचार्य नरेंद्रदेव, जे.बी. कृपालानी, अशोक मेहता इत्यादि नेताओं ने अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं बदलीं, किन्तु इन घटनाओं ने दलीय राजनीति को अधिक दूषित नहीं किया।

                जो भी हो, भारत में चतुर्थ आम चुनाव (1967) के बाद राजनीतिक दल-बदल की समस्या ने गंभीर रूप धारण कर लिया। इस दल-बदल की प्रवृति में और वृद्धि होती गई तथा जून 1975 में आपातकाल लागू होने के बाद भारत की राजनीति में तो जैसे दल-बदल की बाढ़-सी आ गई। इतना तो तय है कि भारत में राजनीतिक दल-बदल की प्रक्रिया का उद्भव कांग्रेस के पतन से ही त्रीव हुआ।

  1. राजनीतिक दल-बदल के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं-
  2. अधिकतर दल-बदल राजनीतिक लाभ के लिए होता है।
  3. दलों मे अन्तर्कलह और उनमें गुटबन्दी के कारण हो सकता ळें
  4. राजनीतिक दलों में सैद्धांतिक ध्रुवीकरण का अभाव हो सकता है।
  5. साधारण विधायक और दल के नेता के बीच व्यक्तित्व का टकराव हो सकता है।
  6. पद, धन, स्तर आदि का लालच या उसका अभाव हो सकता है।
  7. राजनीतिक दलों में शक्तिशाली दबाव समूहों की भूमिका हो सकती है।
  8. सभी दलों में वृद्ध लोगों का नेतृत्व हो सकता है।
  9. दलों की सदस्यता, उनके लक्ष्यव गतिविधियों में जन भागीदारी का अभाव तथा चुने हुए प्रतिनिधियों की दल-बदल सम्बन्धी गतिविधियों के प्रति जन उपेक्षा हो सकती है।
  10. राज्य विधानसभाओं में अल्पमत वाली सरकारें तथा निर्दलीय सदस्यों की भूमिका हो सकती है।

                उपरोक्त कारणों से  स्पष्ट होता है कि राजनीतिक दल-बदल मंे व्यक्तिगत लाभ की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

                दल-बदल रोकने के लिए समय-समय पर सरकार ने प्रयास किए। 8 दिसम्बर 1967 को लोकसभा ने एक उच्च स्तरीय समिति बनाने का प्रस्ताव पारित किया, जिसमे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि एवं संवैधानिक विशेषज्ञ रखें गए। इसके बाद पुनः 16 मई 1973 को लोकसभा मे राजनीतिक दल-बदल विरोधी विधेयक पेश किया। पुनः इसके बाद जनता सरकार ने अप्रैल 1978 में एक विधेयक रखा जिसमे संविधान के अनुच्छेद 102 और 109 को परिवर्तित कर संसद एवं राज्य व्यवस्थापिकाओं के सदस्यों की योग्यताओं को पुननिर्धारित किया गया और अनेक प्रावधान किए गए। लेकिन पूर्व के सभी प्रयास असफल ही सिद्ध हुए। दल-बदल के विरोध में पहला ठोस कदम राजीव गांधी के द्वारा उठाया गया। राजीव गांधी सरकार ने 8वीं लोकसभा के पहले ही सत्र में विपक्षी दलों के सहयोग से दल-बदल पर अकुंश लगाने पर सहारनीय कार्य किया। जनवरी 1985 में दोनों सदनों से पारित होकर यह चर्चित विधेयक 52वें संविधान विधेयक के रूप में सामने आया। इसने भारतीय संविधान मंे दसवीं अनुसची को बढ़ाया जिसमें निम्नलिखित प्रावधान हैं, जिससे दल-बदल को रोकने का प्रयास किया गया-

                निम्न परिस्थितियों में संसद या राज्य विधानमण्डल के सदस्य की सदस्यता समाप्त हो जाएगी-

                यदि वह स्वेच्छा से अपने दल से त्यागपत्र दे दे।

                यदि वह अपने दल या उसके अधिकृत व्यक्ति की अनुमति के बिना सदन में उसके किसी निर्देश के प्रतिकूल मतदान करे या मतदान के समय अनुपस्थित रहे। परन्तु यदि 15 दिन के अन्दर उसका दल उसे उल्लंघन के लिए क्षमा कर दे तो उसकी सदस्यता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य एक निश्चित समयावधि में किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाए, तो उसे दल-बदल का दोषी नहीं माना जाएगा।

                किसी राजनीतिक दल के विघटन पर विधायक की सदस्यता समाप्त नहीं होगी यदि मूल दल के एक तिहाई सांसद, विधायक वह दल छोड़ दें।

                इसी प्रकार विलय की स्थिति मंे दल-बदल नहीं माना जाएगा। यदि किसी दल के दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में मिल जाएं।

                दल-बदल के किसी प्रश्न पर अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष का होगा और किसी न्यायालय को उसकी वैधता जांचने का अधिकार नहीं होगा।

                इस विधेयक को कार्यान्वित करने के लिए सदन के अध्यक्ष को नियम व निर्देश बनाने का अधिकार होगा।

                यह सही है कि दल-बदल विरोधी अधिनियम हमारे राजनीतिक जीवन को स्वच्छ रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन वह ज्यादा अच्छा होता कि दल-बदल के प्रमुख कारणों जैस भौतिक लाभ की सम्भावनाओं पर प्रतिबन्ध लगाया जाता तथा दल-बदलू को स्वीकारने वाले दल को कुछ समय के लिए अमान्य घोषित कर दिया जाता। इसके अतिरिक्त एक व्यावहारिक सुझाव यह भी हो सकता है कि राजनीतिक लाभ रोकने के लिए किन्हीं संवैधानिक प्रावधानों की व्यवस्था के साथ-साथ स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओं का विकास होता। मंत्रिपरिषद के आकार पर प्रतिबन्ध, मंत्री की अवधि का निर्धारण तथा राजनीतिक दल बदलुओं की सदन की सदस्यता समाप्ति आदि ऐसे उपाय हैं जिनसे दल-बदल को कुछ हद तक रोका जा सकता है तथा जनता को भी इस दिशा में जागृत करना चाहिए जिससे ऐसे अपराधियों को स्वस्थ जनमत सजा दे तथा ऐसी संभवनाओं को निरूत्साहित करे। अतः जनता को स्वंय अपने सांसदों एवं विधायकों पर कड़ी निगाह रखनी होगी क्यांेकि विधायी एवं नैतिक विकल्पांे का संयोजन ही इसका एकमात्र प्रभावी उपचार हो सकता है।

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