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Hindi Essay on “Bhramcharya” , ”ब्रह्मचर्य” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

ब्रह्मचर्य

ब्रह्मचर्य, एक विशेष प्रकार के रहन-सहन, संयम-अनुशासनपूर्ण जीवन जीने की एक प्रकिया का नाम है | इस दृष्टि से तो कोई भी व्यक्ति आजीवन ब्रह्मचर्य –व्रत का पालन करते हुए, ब्रह्मचारी बन कर रह सकता है | पहले के समय में तो लोग प्राय ; ऐसा जीवन बिताया करते थे | आज भी साधु-महात्माओं के रूप में अनेक लोग ऐसा ब्रह्मचर्य जीवन जीने वाले है |

भारतीय परम्परा में मनुष्य की आयु को 100 वर्ष मानकर उसे 25-25 वर्ष के चार भागो में विभाजित किया गया है जिन्हें आश्रम नाम भी दिया गया है | पहले भाग का नाम है ब्रह्मचर्य आश्रम, इसके बाद दुसरे पच्चीस वर्ष अर्थात 25 से 50 वर्ष तक की आयु को गृहस्थ आश्रम, अगले पच्चीस वर्ष अर्थात 50 से 75 वर्ष तक का समय वानप्रस्थ आश्रम और अन्तिम पच्चीस वर्ष अर्थात 75 वर्ष से 100 वर्ष तक की आयु को सन्यास आश्रम कहा गया है | आयु के इस विभाजन में किस भाग का क्या कर्त्तव्य है , यह हमारे पूर्व पुरुषो ने इन सबका विधिवत निर्धारण कर दिया था |

पहले भाग अथवा ब्रह्मचर्य आश्रम का अपना विशेष महत्त्व है | सारे जीवन के सभी कार्यकलाप इसी अवस्था पर निर्भर रहते है | इस अवस्था में रहते हुए सभी मनुष्य ‘सादा जीवन उच्च विचार के आदर्श वाले हुआ करते थे | इस आश्रम में व्यक्ति होश सम्भालने के बाद गुरु की सेवा में संयम व अनुशासन पूर्वक रहते हुए उचित एव योग्य हर प्रकार की विद्दाओ का अध्ययन करके अपने भावी जीवन में प्रवेश की उचित तैयारी करता था | सब प्रकार की सांसारिक बातो , करता था | इस प्रकार सभी सांसारिक प्रभावों से मुक्त और निर्लिप्त रहना ही ब्रह्मचर्य है | जीवन का यह भाग सीखने और भविष्य की तैयारी का आधार माना जाता है इसमें इन्द्रीय –संयम , मन पर काबू रखना , व्यर्थ के माया – मोह, विषय-वासना और भोग-विलास से दूर रहने की शिक्षा पर अधिक बल दिया जाता था इस अवस्था में दी गई शिक्षा के आधार पर शेष जीवन स्वत: ही अनुशासित रहता था | जीवन में नग्नता व अश्लीलता नही आ पाती थी | उस काल में आज की तरह हिसा, बलात्कार आदि घटनाएँ नही घटती थी |

आज की ज्वलंत समस्या जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि होने का समाधान भी ब्रह्मचर्य रूपी एक उपाय से संभव हो सकता है | ब्रह्मचर्य हमे जीवन में सादगी एव उच्च विचार अपनाने की शिक्षा एव प्रेरणा भी दिया करता है | वह सहयोग , सहचर्य एव पवित्र ढंग से जीवन – निर्वाह का मार्ग प्रशस्त करता है | यही जीवन का वह भाग है जो यदि अच्छे गुणों से भरपूर हो तो मनुष्य का शेष जीवन भली भांति गुजरता है इसलिए ब्रह्मचर्य को ही सच्चे अर्थो में जीवन कहा जा सकता है | इन तथ्यों के आलोक में कहा जा सकता है कि आज ब्रह्मचर्य व्रत के पालन द्वारा प्राप्त होने वाले अनुशासन की अत्यन्त आवश्यकता है |

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