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Hindi Essay on “Baba Sahab Dr. Bhim Rao Ambedkar” , ”बाबासाहब डॉ. भीवराव अम्बेडकर” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

बाबासाहब डॉ. भीवराव अम्बेडकर

Baba Sahab Dr. Bhim Rao Ambedkar

 भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू नामक शहर में हुआ था, जहां उनके पिता श्रीराम जी सेना में सूबेदार मेजर थे। भीमराव अपने पिता की 14 वीं संतान थे। सेना से अवकाश ग्रहण कर श्रीराम जी मुम्बई आ गए और भीमराव का दाखिला मुम्बई के ही एलफिन्सटन हाई स्कूल में करा दिया। इसी बीच भीमराव के पिता का देहान्त हो गया किन्तु बड़ौदा सरकार की सहायता से उन्होंने बी.ए. तक की पढ़ाई पूरी की। बड़ौदा सरकार की सहायता से ही वे अध्ययन हेतु अमेरिका गए। 1915 में उन्होंने अर्थशास्त्र में एम.ए. की डिग्री हासिल की। 1916 में उन्हें एक विशेष निबन्ध पर कोलम्बिया विश्वविद्यालय द्वारा पी.एचडी. की उपाधि दी गई। उसके बाद डॉ. अम्बेडकर लंदन गए, जहां उन्होंने अर्थशास्त्र और कानून की पढ़ाई साथ-साथ प्रारम्भ की।

लंदन में पढ़ाई के बीच अम्बेडकर को बड़ौदा महाराज का सन्देश पाकर भारत लौटना पड़ा। महाराज ने उन्हें मिलिटरी सेक्रेटरी (सैनिक सचिव) के पद पर नियुक्त कर लिया। लेकिन अछूत होने के कारण उन्हें बड़ौदा में रहने के लिए कोई मकान नहीं मिला। किसी तरह एक होटल में कमरा लेकर रहने लगे किन्तु वहां भी उन्हें निकाल दिया गया। आॅफिस चपरासी उनकी ओर दूर से ही फाइल फेंक देते थे और कोई उन्हें पानी पिलाने को तैयार नहीं होता था। अन्त में वे मुम्बई आ गए और सिडेनहम काॅलेज में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक नियुक्त हुए। वहां भी अछूत होने के कारण उन्हें अपमानित होना पड़ा। कुछ समय बाद अम्बेडकर पुनः लन्दन गए और छूटा हुआ अध्ययन पूरा किया। लन्दन विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘ डॉ.  ऑफ़  साइंस‘ की उपाधि दी। अध्ययन पूरा कर वे 1923 में भारत आए। भारत आकर वे मुम्बई में वकालत करने लगे। अछूत होने के कारण कचहरी में उन्हें कुर्सी भी नहीं दी जाती थी। उन्हें कोई मुवक्किल भी नहीं मिलता था। संयोगवश एक खून का मुकदमा मिला जिसे किसी बैरिस्टर ने स्वीकार नहीं किया था। उन्होंने इतनी कुशलता से पैरवी की कि जज का निर्णय उनके मुवक्किल के पक्ष में हुआ। इससे अम्बेडकर की धाक जम गई।

1920 में डॉ. अम्बेडकर ने अछूतों के एक सम्मेलन में भाग लिया था जिसमें कोल्हापुर के महाराज शाहजी ने भविष्यवाणी की थी- ‘‘ अछूतों को अब एक उद्धारक मिल गया है।‘‘ 1924 में डॉ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में ‘ बहिष्कृत हितकारिणी‘ सभा गठित की गई और ‘बहिष्कृत भारत‘ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन किया गया। उन्होंने अछूतों के उत्थान पर विशेष ध्यान दिया। सभाएं आयोजित की और उन्हें जगाने का प्रयत्न किया। डॉ. अम्बेडकर सच्चे मायने में अछूतों के प्रवक्ता थे। उन दिनों मालाबार में अछूत घी-दूध नहीं खा सकते थे, सड़क पर चल नहीं सकते थे। उन्हें दूसरों की जूठन खानी पड़ती थी तथा उनकी स्त्रियों को ऊपर का आधा शरीर और जांघो को खुला रखना पड़ता था। डॉ. अम्बेडकर पांच महीनों तक मालाबार क्षेत्र का भ्रमण करते रहे और अछूतों में स्वाभिमान तथा नई चेतना जगाते रहे। फलस्वरूप स्त्रियां कपड़े पहनने लगीं और बच्चे स्कूल जाने लगे।

27 दिसम्बर 1927 को अम्बेडकर ने एक सभा में न्यायालयों, पुलिस, सेवा और व्यापार के दरवाजों को अछूतों के लिए खोलने की मांग की। इसी तरह 1930 में उन्होंने 30 हजार अछूतों को साथ लेकर नासकि के कालाराम मंदिर में प्रवेश के लिए सत्याग्रह किया। इस अवसर पर उच्च वर्णों की लाठियों की मार से अनेक अछूत घायल हुए। उस घटना के बाद से अछूत उन्हें आदर से ‘ बाबा साहब‘ कहने लगे।

अंग्रेजों द्वारा बुलई गई गोलमेज कांफ्रेस में अछूतों के प्रतिनिधित्व को लेकर अम्बेडकर का गांधीजी से मतभेद हो गया। 1932 में अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की घोषणा करते हुए अछूतों को अपना प्रतिनिधित्व अलग से निर्वाचित करने का अधिकार दिया। गांधीजी उन दिनों जेल में थे। उन्होंने आमरण अनशन की घोषणा कर दी। चंूकि वे अछूतों को हिन्दुओं से अलग नहीं होने देना चाहते थे। सब ओर से पड़ने वाले दबाव के कारण अम्बेडकर और गांधीजी के बीच पूना समझौता हुआ। पूना-पैक्ट के बाद ही अम्बेडकर ने घोषित किया -‘‘ मैं दुर्भाग्य से हिन्दू अछूत होकर जन्मा हूं किन्तु मैं हिन्दू होकर नहीं मरूंगा।‘‘ 1935 में अम्बेडकर ने ‘ लेबर पार्टी‘ का गठन किया, जिसने उस समय के चुनाव में विजय हासिह की। 1942 में वे वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य नियुक्त किए गए। मुस्लिम लीग की सहायता से डॉ. अम्बेडकर बंगाल से संविधान निर्माता सभा के सदस्य चुने गए। देश की भलाई के लिए उन्होंने कांग्रेस से सहयोग किया और नेहरू जी की सरकार में कानून मंत्री का पद स्वीकार किया। संविधान निर्माण के लिए उन्हें संविधान निर्मात्री समिति का अध्यक्ष चुना गया जो महान गौरव की बात थी। यह उन्हीं के प्रयासों का फल था कि संविधान में धारा 340 जोड़ी  गई जिसके फलस्वरूप काका कालेकर और बी.पी. मंडल कमीशन नियुक्त किए गए। कानून मंत्री की हैसियत से अम्बेडकर ने 1948 ई. में ‘ हिन्दू कोड बिल‘ पेश किया। कट्टर हिन्दू पंथिपयों के कारण बिल पास न हो सका और उन्होंने मंत्रिमंउल से इस्तीफा दे दिया। 1952 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए। उन्होंने संसद में सदैव शोषितों और दलितों का पक्ष लिया।

डॉ. अम्बेडकर ने अनेक पुस्तकें तथा निबन्ध लिखे जिन्हें अन्तर्राष्ट्रीय ख्यााति प्राप्त हुई। उनके रचित ग्रंथों में कुछ उल्लेखनीय हैं-

1.अनटचेबल्स हू आर दे? 

2. हू वर दी शद्राज?

3.बुद्धा एण्ड हिज धम्मा

4.पाकिस्तान एण्ड पार्टीशन ऑफ़ इण्डिया 

5. स्टेट्स एण्ड माइनाॅरिटीज माइनॉरिटीज़

6. थाॅट्स ऑफ़ लिंग्युस्टिक स्टेट्स

7.द प्राॅब्लम ऑफ़  द रूपी द   फायनांस इन ब्रिटिश इंडिया     

8.वोल्यूशन ऑफ़  प्रोविंशियल

9. द राइज एण्ड फॉल ऑफ़ हिन्दू वूमेन

10.इमैनसिपेशन ऑफ़  द अनटचेबल्स                      

इन पुस्तकों के अतिरिक्त अनेक लेख और व्याख्यान भी प्रकाशित हुए। इन सबसे ऊपर सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति है ‘ भारत का संविधान‘ जिसकी रचना डॉ. अम्बेडकर ने की और जो विश्व का सर्वश्रेश्ठ लिखित संविधान माना जाता है।

अधिक परिश्रम के कारण बाबासाहब का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था। उन दिनों उनका रूझान बौद्ध धर्म के प्रति था। 14 अक्टूबर 1956 को बाबासाहब ने दशहरे के दिन नागपुर में एक विशाल समारोह में लगभग दो लाख लोगों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया। 4 दिसम्बर को वे राज्यसभा की बैठक में शामिल हुए और 6 दिसम्बर 1956 को उनका निधन हो गय

डॉ. अम्बेडकर एक विख्यात विद्वान, विशिष्ट शिक्षाविद्, पारंगत राजनेता, प्रभावशील वक्ता, प्रामाणिक संविधानवेत्ता, कुशल प्रशासक, दार्शनिक तथा विचारक थे। संघर्षों से जूझने की उनमें अद्भुत प्रतिभा थी। अन्याय, असमानता, छुआछूत, शोषण तथा ऊंच-नीच की भावनाओं के वे घोर विरोधी थे। उनका व्यक्तित्व क्रांतिकारी था। वे निर्भीक बुद्धिवादी होने के साथ-साथ महान राजनीतिज्ञ थे। भारतीय इतिहास में बाबासाहब का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया है।

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