Chidiya Ghar Ki Sair “चिड़िया घर की सैर” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
चिड़िया घर की सैर
Chidiya Ghar Ki Sair
भूमिका, चिड़ियाघर जाना, विभिन्न पक्षियों और पशुओं को देखना, शेर को देखना, उपसंहार
परीक्षा समाप्त होने के बाद मोहन के व्यस्तता के दिन बीत गए। वह पुस्तकालय जाकर कुछ पुस्तकें लाने की बात सोच ही रहा था कि जयपुर से उसके चाचाजी आ गए। बातचीत में उन्होंने पूछा ‘तुमने चिड़िया घर देखा है ?’ मोहन ने उत्तर दिया “चाचाजी बहुत पहले लखनऊ का चिड़िया घर देखा था; दिल्ली का चिड़िया घर नहीं देख पाया।”
दूसरे दिन चाचा और भतीजा बस में बैठकर चिड़िया घर पहुँच गए। दोनों टिकट लेकर अंदर गए। आगे बढ़ने पर पक्षियों के बड़े पिंजड़ेनुमा वास-स्थान मिले। उनके भीतर भाँति-भाँति के पक्षी किल्लोल कर रहे थे। कई पक्षियों को मोहन पहचानता था, जैसे-तीतर, मैना, चैती, दुबकी, फुदकी आदि। जिनको वह नहीं पहचानता था, उनके नाम बाहर की नाम पट्टिका में पढ़ लेता था। नाम पट्टिका में पक्षी का जीव-विज्ञानी नाम हिंदी और अंग्रेजी में लिखा था। नाम के दो हिस्से थे- एक पक्षीकुल का नाम और दूसरा उस कुल की उपजाति का नाम। पक्षी का लोक प्रचलित नाम भी अंत में दिया हुआ था। पक्षी की आदतें भी दी हुई थीं। कहाँ पाया जाता है, यह जानकारी भी दी हुई थी। आगे हंस-कुल के पक्षियों के लिए खुला बाड़ा बना था। ये पक्षी जल में रहते हैं। इसलिए बाड़े में तालाब भी बना था। इनको आज़ादी से विचरने देने के लिए यह बाड़ा ऊपर से खुला हुआ था। बीच-बीच में पेड़ लगे थे। पानी में सफ़ेद रंग की बत्तखें तैर रही थीं। हंस भी तैर रहे थे। आगे चलने पर हिरनों के बाड़ थे । बगल के बाड़े में कंगारू दिखाई दिया। कंगारू ने अजीब तरह से उचक कर छलाँग लगाई। कंगारू के पेट में विचित्र सी थैली बनी थी जिसमें उसका बच्चा बैठा हुआ था। वह चकित दृष्टि से इस अनजाने संसार को देख रहा था। अगला बाड़ा बनैले सुअर का था। उसके लिए पानी का तालाब काफ़ी गहराई में बना था। वहाँ वह विचरता हुआ अपने थूथुन से जाने क्या ढूँढ़ रहा था । बनैला सूअर बहुत फुर्तीला होता है। बनैले सूअर के बाड़े से लगा हुआ वास- स्थान सफ़ेद भालू का था । उसके विचरने के लिए काफ़ी बड़ा भू-भाग छोड़ा गया था। यह भू-भाग इस प्रकार से बना था कि जंगल का भ्रम होता था ।
तभी बड़ी ज़ोर की दहाड़ सुनाई पड़ी। सभी दर्शकों के कान खड़े हो गए। सभी समझ गए कि कहीं पास में ही शेर दहाड़ रहा है। लोग पास वाले बाड़े की ओर लपके। वहाँ सींखचे दोहरे और ऊँचे थे। अंदर देखने पर दूर- दूर तक शेर के दर्शन नहीं हुए। तभी एक दहाड़ फिर सुनाई पड़ी। इस बार ध्वनि के स्रोत को ढूँढ़ने में कठिनाई नहीं हुई। पीछे बने कृत्रिम वन में भूखा शेर बेचैनी से टहल रहा था। उसके लिए नीचे कृत्रिम जलाशय बना था जिससे एक पगडंडी ऊपर को चढ़कर जंगल में मिल जाती थी।.
शेर के लिए बने सामने के पिंजरे के ऊपर चिड़ियाघर का एक कर्मचारी दिखाई पड़ा। वह शेर के लिए उसका भोजन लेकर आया था। शेर के भोजन में थे – माँस के बड़े-बड़े लोथड़े। कर्मचारी ने पिंजरे का एक फाटक खोलकर माँस के टुकड़े पिंजरे में रख दिए। फिर वह फाटक बंद कर बाहर आ गया। इसके बाद उसने पिंजरे पर चढ़कर अंदर वाला फाटक ऊपर से ही ऊपर की ओर खींच लिया जिससे बंद पिंजरा कृत्रिम वन से जुड़ गया। देखते ही देखते भूखा शेर माँस की गंध पाकर इधर दौड़ आया और माँस पर टूट पड़ा।
चाचा जी ने घड़ी देखी। दोपहर हो चली थी। उन लोगों ने तीन बजे तक घर लौटने का कार्यक्रम बनाया था। निर्धारित कार्यक्रम ठीक-ठाक चल सके, इसलिए वे लोग जल्दी-जल्दी बाकी पशुओं को देखने लगे। सिंह, चीता, तेंदुआ, हाथी, ज़ेबरा, जिराफ़ आदि देखते-देखते दो बज गए। चाचा जी ने कहा, “अब बस। बाहर जल्दी से निकलो, नहीं तो तीन बजे तक घर नहीं पहुँच पाएँगे।” तुरंत बाहर के लिए चल दिए।






















