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Articles posted by evirtualguru_ajaygour (Page 480)
सब दिन जात न एक समाना Sab Din Jaat na Ek Saman समय परिवर्तनशील है, यह कठोर सत्य है। समय हमेशा एकसा नहीं रहता। इसके सहस्रों उदाहरण वर्तमान हैं। समय-समय पर समाज में अनेक प्रकार के परिवर्तन हए। ये परिवर्तन ही इस उक्ति के द्योतक हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि ‘मन दिन जात न एक समाना’ । उदाहरणताः भारत का वैभव सूर्य कभी विश्व-गगन में पूर्ण तेज...
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November 11, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
सूर-सूर तुलसी शशि Sur-Sur Tulsi Shashi भक्त कवि सूर और तुलसी हिन्दी साहित्याकाश के सूर्य और चन्द्र हैं। सूरदास सागर’ और तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ ऐसे दो काव्य ग्रन्थ हैं, जिनके अभाव हन्दी साहित्य प्रकाशहीन होकर नाममात्र को ही स्थिर रह जायेगा। इन्होंने जीवन के क्षत्र को पहचानकर अपनी पीयूषधारा से प्लावित किया है। यदि काव्य में हृदय लापक्ष का दृष्टि से इन महाकवियों की तलना की जाए तो अन्त में यह...
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November 7, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
शठ सुधरहिं सत्संगति पाई Shath Sudhrahi Satsangati Pai मानव एक सामाजिक प्राणी है। वह संगति की अपेक्षा करता है। मानव को संगति चयन में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये। बडा सोच-विचार कर साथियों का चयन, बच्चे को बचपन ही से कराना चाहिए। एक बार जो संस्कार पड़ जाते हैं वे फिर आसानी से समाप्त नहीं होते हैं। “सत्संग ‘ शब्द सत+संग से बना है। सत् का अर्थ सज्जन एवं संग का...
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November 7, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
अविवेक Avivek विवेक एक ऐसा महान् दोष है जो हमारे सम्पूर्ण सदगुणों पर छा कर उन्हें ढक नगद धन के समान है जो अंदर-अंदर ही मानव के सदकर्म तथा उसकी सदवत्तियों मलनी बना देता है। यह ज्ञान व विद्वता की आँखों में छाया हुआ ऐसा मेघ है जो किसी भी वस्त को स्पष्ट नहीं देखने देता। अविवेक शब्द अ+विवेक दो शब्दों से मिलकर ना है ‘अ’ का अर्थ नहीं ‘विवेक’...
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November 7, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
स्वावलम्बन Swalamban मानव बुद्धिशील प्राणी है। जिस विषय पर दूसरे प्राणी विचार नहीं कर तकते हैं, वह चिन्तन करता है। इसी कारण वह संसार के समस्त जीवधारियों में श्रेष्ठ माना जाता है। जहाँ एक ओर उसमें विद्या, बुद्धि, प्रेम आदि श्रेष्ठ गुण विद्यमान हैं, वहीं दूसरी तरफ वह राग, द्वेष, हिंसा आदि बुरी प्रवृत्तियों से भी ओत-प्रोत है। श्रेष्ठ तत्त्वों का अपने अन्दर विकास करने के लिए मानव को स्वावलम्बी...
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November 7, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
परहित सरिस धर्म नहिं भाई Parhit Saris Dharam Nahi Bhai पशुता के बाद जब हमने मनुष्यता के क्षेत्र में पदार्पण किया, तो सर्वप्रथम सभी जाति और देश के मनीषियों ने मनुष्यता की रक्षा के लिए और इसे अधिक से अधिक सुन्दर बनाने के लिए अनेक प्रकार के गुणों तथा अनेक प्रकार के सिद्धान्तों का निरूपण किया। इसके लिए अनेक प्रकार के विधि-विधान बनाए गए। सत्य-भाषण, सच्चरित्रता, परोपकार आदि को सर्व...
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November 7, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
पराधीन सपनेहु सुख नाहीं Paradhin Sapnehu Sukh Nahi वैसे तो सुख का सम्बन्ध व्यक्ति की भावना और मन के साथ माना जाता है, पर सत्य यह भी है कि एक स्वतंत्र-स्वाधीन भावना से भरा मन ही वास्तविक सुख का अनुभव कर सकता है, पराधीन और परतंत्र व्यक्ति कदापि नहीं। ऐसा क्यों होता है, इसके प्रत्यक्ष और परोक्ष कारण गिनाए जा सकते हैं? पराधीन आदमी पहले तो कुछ सोचने-करने का अवसर...
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November 7, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment
साँच बराबर तप नहीं Sanch Barabar Tap Nahi प्रस्तुत काव्योक्ति में सत्य का ही महत्त्व स्वीकार किया गया है जो स्वतः में एक सर्वश्रेष्ठ कठोरतम तप है। सत्य बहमखी प्रतिभा का प्रतीक है और तप कठिनतम साधना का। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पर्ण विकास करने के लिए शिवं एवं सुन्दरम् से संयुक्त तपमय सत्य का सम्बल होना चाहिए। सत्य’ शब्द संस्कत के ‘अस्ति’ क्रिया का अर्थ होता है ‘है’...
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November 7, 2019 evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo Comment