Kisi Parvatiya Sthal Ki Yatra “किसी पर्वतीय स्थल की यात्रा” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
किसी पर्वतीय स्थल की यात्रा
Kisi Parvatiya Sthal Ki Yatra
भूमिका, योजना, प्रस्थान, छोटी गाड़ी का रोमांच, शिमला पहुँचना, शिमला के प्रदर्शनीय स्थल, उपसंहार
भारत विविधताओं का देश है। इस देश में रहने वाले लोगों का रहन-सहन, खान-पान, पहरावा, भाषा यहां तक कि रंग-रूप भी जैसा नहीं है। इस देश की धरती भी विविधताओं को लिए हुए है। कहीं पर हिमालय की हिम मंडित चोटियां हैं तो कहीं पर राजस्थान का तपता, प्यासा रेगिस्तान है। विविधताओं के भरे इस आश्चर्यजनक देश के विभिन्न भागों में भ्रमण आनंददायी भी है और ज्ञानवर्धक भी। गत वर्ष गर्मियों की छुट्टियों में हमारे स्कूल की ओर से विद्यार्थियोंका एक दल शिमला भ्रमण के लिए भेजने की योजना बनी थी। मैंने भी अपना नाम उसके लिए लिखवा दिया। मै पहले कभी कोई पर्वतीय स्थान नहीं देखा था इसलिए स्वाभाविक था कि मैं इस यात्रा के लिए बहुत उत्सुक था। 20 मई को तीस विद्यार्थियों का हमारा यह दल शिमला के लिए रवाना हुआ। श्री रामसिंह जी हमारे पी० टी० आई० थे और हमारे साथ संरक्षक के रूप में गए थे।
रात्रि के साढ़े दस बजे हम दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए। गाड़ी ग्यारह बजे चलनी थी। हमने द्वितीय श्रेणी के शयनयान में अपने पूर्व निर्धारित स्थान ले लिये। भयंकर गर्मी पड़ रही थी। शरीर पसीने से तर-बतर था। साधारण कमीज-पैंट भी पहनना मुश्किल हो रहा था। मेरे एक-दो साथियों ने तो कमीजे उतार कर कंधे पर डाल ली थीं। ग्यारह बजे गाड़ी चल दी। हम अपने-अपने स्थान पर सो गए।
प्राय: साढ़े छः बजे गाड़ी कालका स्टेशन पर रुकी। यहां से हमें गाड़ी बदलनी थी। शिमला के लिए गाड़ी प्लेटफार्म पर लगी हुई थी । छ: डिब्बों की गाड़ी खिलौने जैसी लग रही थी। खिलौना-गाड़ी के डिब्बे छोटे-छोटे थे और रेलवे लाइन ‘नैरो गॉज’ थी। हमें गाड़ी में मुश्किल से स्थान मिला। हज़ारों भ्रमणार्थी शिमला जा रहे थे। गाड़ी ठीक साढ़े सात बजे चल पड़ी। गाड़ी की गति पर्याप्त धीमी थी और वह पर्वत की पीठ पर माने रेंगते हुए चढ़ रही थी। खिड़की से बाहर का दृश्य आनंदमयी था । दूर तक घाटियों में फैली हरियाली दिखाई पड़ती थी। देवदार, चीड़ और कैल के वृक्ष प्रहरियों की तरह सिर ऊंचा किए पहाड़ियों पर स्थान-स्थान पर खड़े थे। गाड़ी कभी विशेष प्रकार से बने मेहरबदार पुले पर से गुज़रती तो कभी छोटी बड़ी सुरंगों में से गुज़रती । बड़ौग स्टेशन पर गाड़ी साढ़े दस बजे पहुंची। स्टेशन छोटा- सा था परंतु बहुत सुंदर फूलों से सजा था। यहां पर हमने जलपान किया। बड़ौग की सुरंग सबसे लंबी थी।
हमारी गाड़ी एक बजे दोपहर को शिमला पहुंच गई। प्लेटफार्म पर लाल रंग की पोशाक पहने कुली लंबी लाइन में बैठे थे। गाड़ी के पहुंचते ही उनमें हलचल प्रारंभ हो गई। देखते-ही-देखते वे गाड़ी पर टूट पड़े। यात्रियों के नीचे उतरने से पहले ही कुली गाड़ी में घूस गए और उन्होंने यात्रियों के सामान पर कब्ज़ा कर लिया। हमें देखकर आश्चर्य हुआ कि कुली सिर की अपेक्षा पीठ पर समान ढो रहे थे ।
हमारे ठहरने की व्यवस्था कॉली-बॉरी की धर्मशाला में थी। माँ दुर्गा के प्राचीन मंदिर के साथ यात्रियों के रुकने के लिए कमरे बने हैं। बड़ी संख्या में बंगाली यात्री वहां ठहरे थे। कुछ देर विश्राम करने के पश्चात् हमने भोजन किया। सायंकाल हम लोग तैयार हो कर मॉल रोड की सैर के लिए चले। मॉल रोड पर बहुत भीड़ थी। एक सिरे पर लाला लाजपत राय का बुत उंगली उठा कर मानो भ्रमणार्थियों को सचेत कर रहा था तो रिज के दूसरी ओर गांधी जी छड़ी थामे, मुस्कराते हुए खड़े थे। रिज पर हज़ारों लोग इकट्ठे थे। कुछ बच्चे घुड़सवारी कर रहे थे। छाया चित्र लेने वाले कैमरे के साथ व्यस्त थे । रिज पर मेले का सा दृश्य था। मॉल रोड पर हर आयु हर वेश-भूषा एवं हर प्रांत का व्यक्ति दिखाई पड़ा। ऐसा लगता था कि लघु भारत यहां आ बसा है।
दूसरे दिन हम हिमाचल पर्यटन विभाग की बसों में बैठ कर कुफरी, वाइल्ड फ्लावर हाल, क्रिंग नैनी और नालदेरा की यात्रा के लिए गए। नालदेरा का गोल्फ का मैदान बहुत सुंदर है। कुफरी में हमने यॉक पर बैठ कर फोटे खिंचवाए, और रेस्तरां में जलपान किया । वाइल्ड फ्लावर हाल में फूलों का मेला-सा लगा था। चारों ओर रंग-बिरंगे फूलों पर तितलियों के झुंड मंडरा रहे थे। तीसरे दिन हम जाखू पर्वत पर पिकनिक के लिए गए। शिमला शहर के मध्य में स्थित यह चोटी सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। रिज से लगभग पंद्रह सौ फुट की ऊंचाई पर स्थित इस चोटी पर हमुमान जी का भव्य मंदिर है। पूरे रास्ते में बंदरों के झुंड मिले। हमने उन्हें चने खिलाए। चौथे दिन प्रातः नौ बजे हम वापस चल पड़े। शिमला की यात्रा मुझे बहुत पसंद आई। सचमुच शिमला पहाड़ों की रानी है ।






















