Bhidbhad wale Bus Stand ka Drishya “भीड़भाड़ वाले बस स्टैंड का दृश्य” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
भीड़भाड़ वाले बस स्टैंड का दृश्य
Bhidbhad wale Bus Stand ka Drishya
भूमिका, बस अड्डे की भीड़, टिकट लेने वालों की लाइन, बस अड्डे पर भिखारी तथा हॉकरों की रेल-पेल, चारों ओर बसें और लोग, बस का चलना, उपसंहार
विज्ञान ने यातायात व्यवस्था को बहुत ही सुचारु बना दिया है। बस यातायात अत्यधिक लोकप्रिय होने से बस अड्डों पर भारी भीड़ जमा हो जाती है। बड़े शहरों के बस अड्डों पर मेला ही लगा रहता है। ऐसे ही भीड़-भाड़ वाले बस अड्डे का मैं यहां उल्लेख कर रहा हूँ।
पिछले रविवार मैं अपने मित्र को विदा करने के लिए जालंधर बस स्टैंड पर पहुँचा। दिन के दो बजे थे। गर्मी का बहुत जोर था। रिक्शा से उतर कर मैं पहले लोकल बस स्टैंड से होता हुआ मुख्य बस अड्डे पर पहुँचा। यात्री विभिन्न बसों में जाने के लिये पंक्तियों में टिकट लेने के लिये खड़े थे। मेरा मित्र भी लुधियाना की टिकट लेने के लिए एक लाइन में लग गया।
मेरे वहाँ खड़े होते ही कुछ भिखारियों और भिखारिनों ने मुझे घेर लिया। मैंने उन्हें दस-दस पैसे देकर छुटकारा पाया। इसी समय अखबार वालों, बूट पालिश करने वालों, आइस-क्रीम वालों और मनियारी का सामान बेचने वालों की आवाजें आने लगीं। पुलिस कर्मचारी भी इधर-उधर घूम रहे थे। पास ही ठंडे पानी की व्यवस्था थी। मैंने वहाँ कूलर का ठंडा पानी पीया। अचानक दृष्टि एक बुक स्टॉल पर गई। मैं झट वहाँ पहुँच गया। मैंने कुछ पत्रिकाएँ खरीदीं। इतने में मेरा मित्र बस की टिकट ले आया। उसने भी एक पत्रिका खरीदी।
मेरे मित्र ने मुझे बस का नंबर बताया। बस स्टैंड पर आ चुकी थी। मैंने सामान बस में रखने में मित्र की सहायता की। कुली बस पर लोगों का सामान चढ़ा रहे थे। हॉकर सामान बेचने के लिये आवाजें लगा रहे थे। बहुत-से लोग मेरी तरह अपने मित्रों या संबंधियों को विदा करने आये हुए थे। मेरा मित्र अब खिड़की के पास की सीट संभाल चुका था। उसने खिड़की से मुँह निकाल कर मुझ से बातें करनी शुरू कर दीं। बस अड्डा लोगों से भरा हुआ था। चारों ओर अपरिचित लोग एक-दूसरे को देख रहे थे।
लुधियाना की बस यात्रियों से भर चुकी थी। कंडक्टर आ चुका था। उसने सीटी बजाई। ड्राइवर अगली खिड़की से बस में सवार हुआ। उसने इंजन स्टार्ट किया और बस धीमी गति से चल पड़ी। वहाँ खड़े लोग अपने मित्रों और संबंधियों को हाथ हिला-हिलाकर विदा कर रहे थे। कुछ ही देर में बस अड्डे से बाहर चली गई।
इस प्रकार बस के चले जाने पर भी बस अड्डे पर चहल-पहल पहले जैसी ही थी। इतने में एक अन्य बस उस स्टाप पर आ लगी। मैं इस वातावरण में खो सा गया। धीरे-धीरे मैं बस अड्डे से बाहर की ओर मुड़ा और बाहर पहुँच कर मैंने घर के लिये रिक्शा ली।






















