Paryavaran Sanrakshan “पर्यावरण संरक्षण” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
पर्यावरण संरक्षण
Paryavaran Sanrakshan
भूमिका, प्रदूषण के प्रकार, प्रदूषण से हानियाँ, रोकने के उपाय, उपसंहार
मानव ने जब प्रकृति माता की गोद में आँखें खोलीं तो उसने अपने चारों ओर उज्ज्वल प्रकाश, निर्मल जल और स्वच्छ वायु का वरदान पाया। वन प्रदेशों की मनोहर हरियाली में उसने जीवन के मधुरतम सपने देखे । उसका पेड़- पौधों से, फल, फूलों से, चहकते पक्षियों से, प्रभात और संध्याबेला से नित्य का संबंध था। प्रकृति के आँगन में खेलते हुए उसने पाया पुष्ट, नीरोग शरीर और उत्साह-उल्लास से लबालब तनावहीन मानस । किंतु धीरे-धीरे उसके मन में प्रकृति पर शासन करने की लालसा जागी । उसने प्रकृति को माँ के स्थान से हटाकर दासी के स्थान पर धकेलना चाहा। इसको नाम दिया गया “वैज्ञानिक प्रगति। “
इसी वैज्ञानिक प्रगति के कारण आज सृष्टि का कोई पदार्थ, कोई कोना प्रदूषण के प्रहार से नहीं बच पाया है। प्रदूषण मानवता के अस्तित्व पर एक नंगी तलवार की भाँति लटक रहा है।
जल मानव-जीवन के लिए परम आवश्यक पदार्थ है। जल के परंपरागत स्रोत हैं- कुएँ, तालाब, नदी तथा वर्षा का जल। प्रदूषण ने इन सभी स्रोतों को दूषित कर दिया है। औद्योगिक प्रगति के साथ-साथ हानिकारक कचरा और रसायन बड़ी बेदर्दी से इन जल स्रोतों में मिल रहे हैं।
वायु भी जल जितना ही आवश्यक पदार्थ है । श्वास-प्रश्वास के साथ वायु निरंतर शरीर में जाती है। आज शुद्ध वायु का मिलना भी कठिन हो गया है। वाहनों, कारखानों और सड़ते हुए औद्योगिक कचरे ने वायु में भी ज़हर भर दिया है।
प्रदूषित जल और वायु के बीच पनपने वाली वनस्पति या उसका सेवन करने वाले पशु-पक्षी भी आज दूषित हो रहे हैं । चाहे शाकाहारी हो या माँसाहारी कोई भोजन के प्रदूषण से नहीं बच सकता।
आज मनुष्य को ध्वनि के प्रदूषण को भी भोगना पड़ रहा है । कर्णकटु और कर्कश ध्वनियाँ मनुष्य के मानसिक संतुलन को बिगाड़ती हैं और उसकी कार्यक्षमता को भी कुप्रभावित करती हैं। वैज्ञानिक और औद्योगिक प्रगति की कृपा के फलस्वरूप आज मनुष्य कर्कश, असहनीय और श्रवणशक्ति को क्षीण करने वाली ध्वनियों के समुद्र में रहने को मज़बूर है। आकाश में वायुयानों की कानफोड़ ध्वनियाँ, धरती पर वाहनों, यंत्रों और संगीत का मुफ्त दान करने वाले ध्वनि विस्तारकों का शोर आदि सब मिलकर मनुष्य को बहरा बना देने पर तुले हुए हैं ।
वाहनों का विसर्जन, चिमनियों का धुआँ, रसायनशालाओं की विषैली गैसें मनुष्यों की साँसों में गरल घोल रही हैं । प्रगति और समृद्धि के नाम पर ज़हरीला व्यापार दिन दुगुना बढ़ता जा रहा है। सभी प्रकार के प्रदूषण हमारी औद्योगिक, वैज्ञानिक और जीवन स्तर की प्रगति से जुड़ गये हैं । हमारी हालत साँप – छहुँदर जैसी हो रही है।
प्रदूषण ऐसा रोग नहीं है कि जिसका कोई उपचार ही न हो। इसका पूर्ण रूप से उन्मूलन न भी हो सके तो इसे हानिरहित सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिये कुछ कठोर, अप्रिय और असुविधाजनक उपाय भी अपनाने पड़ेंगे।
प्रदूषण फैलाने वाले सभी उद्योगों को बस्तियों से सुरक्षित दूरी पर ही स्थापित और स्थानांतरित किया जाना चाहिये। उद्योगों से निकलने वाले कचरे और दूषित जल को निष्क्रिय करने के उपरांत ही विसर्जित करने के कठोर आदेश होने चाहिये ।
ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति भी तभी मिलेगी जब कि वाहनों का अंधाधुंध प्रयोग रोका जाए। हवाई अड्डे बस्तियों से दूर बनें और वायु मार्ग भी बस्तियों के ठीक ऊपर से न गुज़रें । रेडियो, टेप तथा लाउडस्पीकरों को मंद ध्वनि से बजाया जाए।
प्रदूषण की समस्या मनुष्य का अदृश्य शत्रु है। धीरे-धीरे यह मानव-जीवन को निगलने के लिये बढ़ी आ रही है । यदि इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो आदमी शुद्ध जल, वायु, भोजन और शांत वातावरण के लिये तरस जायेगा। प्रशासन और जनता दोनों प्रयासों से ही प्रदूषण से मुक्ति मिल सकती है। गंगा सफाई अभियान प्रशासन का ऐसा ही प्रयास था, किंतु ये आयोजन सिर्फ एक प्रशासकीय फैशन या तमाशा बन कर नहीं रह जाएं। एक स्वच्छ और स्वास्थ्यकर विश्व में रहना है तो प्रदूषण से लड़ना ही होगा ।






















