Swadesh Prem “स्वदेश प्रेम” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
स्वदेश प्रेम
Swadesh Prem
भूमिका, स्वेदश प्रेम, स्वदेश का आकर्षण, स्वदेश की उन्नति, देश भक्त, राष्ट्रीयता, उपसंहार
भूमिका-स्वदेश प्रेम कितना अनुपम है ! किसी कवि ने उचित ही कहा है-
“जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रस-धार नहीं ।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।।
जिस व्यक्ति का हृदय स्वदेश-प्रेम के भावों से लबालब भरा हुआ नहीं है तथा जिसके हृदय में स्वदेश-प्रेम की रस-धार नहीं बहती, उस व्यक्ति का हृदय हृदय नहीं, पत्थर है। ऐसे व्यक्ति का इस संसार में होना न होना एक समान है। स्वदेश-प्रेम मनुष्य की स्वाभाविक ममता का प्रतीक है। संस्कृत के एक कवि ने तो जन्म भूमि को स्वर्ग से भी बढ़कर बताया है-
“जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”
मनुष्य में ही नहीं, वरन् सभी प्राणियों में अपने स्थान के प्रति प्रेम होता है। पक्षी दिन भर इधर-उधर उड़ते रहते हैं, परंतु सायंकाल को वे अपने घोंसलों में वापस आ जाते हैं। पशु दिन भर घूम-फिर कर अंत में अपने खूंटे पर पहुँचकर ही आनंद प्राप्त करते हैं ।
मनुष्य में भी मातृ-भूमि के प्रति स्वाभाविक आकर्षण होता है। जिस स्थान में मनुष्य जन्म लेता है और बड़ा होता है, वह उसी स्थान पर रहना पसंद करता है। झोंपड़ी में रहने वालों को राजप्रासाद तक सुखकर नहीं लगते। परदेश में कितनी भी सुविधाएं प्रदान की जाएँ फिर भी मनुष्य अपने घर में ही सच्चे सुख का अनुभव करता है।
स्वदेश-प्रेम से ही देश की उन्नति हो सकती है। सच्चा देश-भक्त वही है जो तन, मन, धन से देश की सेवा करता है और हँसते-हँसते अपने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर देता है। देश पर जब संकट के काले बादल मंडराते हैं, देश-भक्त सिर पर कफ़न बांधकर उसकी रक्षा के लिए आगे आकर उत्सर्ग का द्वार खोलते हैं। उसका जीवन देश का जीवन है । हमारे देश का इतिहास अनेक देश-भक्तों के नाम से भरा पड़ा है। प्राचीन समय में राजपूत वीर केसरिया बाना पहन कर मातृ-भूमि की रक्षा के लिए निकल पड़ते थे और अंतिम समय तकं लड़ते थे। महाराणा प्रताप ने देश के लिए अनेक कष्ट सहे । शिवाजी की देश-भक्ति कौन नहीं जानता है ? झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम देश पर मिटने वालों में सदा अमर रहेगा। देश की आज़ादी के लिए सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि हँसते-हँसते फाँसी के तख्ते पर झूल गए ।
हममें देश-भक्ति की कमी है। हमने अपने देश को नहीं पहचाना। स्वदेश-प्रेम के लिए हमें राष्ट्रीयता की भावना को अपनाना चाहिए। सभी व्यक्तियों को अपना भाई समझना चाहिए। कितनी लज्जा आती है यह देखकर कि दूसरे देश तो उन्नति कर रहे हैं और हम अपने स्वार्थों में फंसे हुए देश को पतन की ओर ले जा रहे हैं। हमें ऊँच-नीच का भेद-भाव छोड़ना चाहिए। एक ही स्थान में पैदा हुए, एक ही स्थान में पले, फिर भेद-भाव कैसा ? जातीयता के विषय को दूर करना चाहिए। जिसको अपने देश का गौरव नहीं है, वह मृतक के समान है ।
हमें देश-प्रेम को सर्वोच्च स्थान देना है । अनेक शहीदों के बलिदान से हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई है, हमें प्राण देकर भी उसकी रक्षा करनी है। जिस स्वातंत्र्य-पाद को हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया है, उसकी रक्षा करना हमारा परम कर्त्तव्य है । हम अपने अतीत गौरव को समझें और उसकी पुनः स्थापना करने के लिए प्रयत्नशील हों ।






















