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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Nari aur Fashion”, ”नारी और फैशन” Complete Hindi Anuched for Class 8, 9, 10, Class 12 and Graduation Classes

नारी और फैशन

Nari aur Fashion

नारी जीवन और समाज का परम विशिष्ट आधा अंग है। सच तो यह है कि नारा-विहीन जीवन और समाज की कतई कल्पना ही नहीं की जा सकती। वह जननी है, माँ है, सभी पुरुष, घर परिवार और संसार के अस्तित्व का कारण है। संसार में जो ना हुआ या हो रहा है. उस की पष्ठभमि में प्रेरणा के रूप में नारी जीवन विद्यमान है। प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे कोई-न-कोई नारी रहती है, जैसी बातें और कहावतें पहभारतीय जीवन और परम्परा में तो नारी को आधी शक्ति और देवी तक खा गया है। उस जैसी विशाल हृदयता और दयालुता के कारण ही धरती को भी का स्थान एवं महत्त्व प्रदान किया गया है। नारी प्रकृति है और प्रकृति माँ है। माँ प्रकृति अपने जन्मजात स्वभाव से ही कोमलकान्त एवं स्निग्ध, आकर्षक है। उन्ही से कोमलकान्त स्निग्ध एवं आकर्षक तत्त्वों से नारी का भी निर्माण हुआ माना जाता है। इसी कारण वह कोमल और सुन्दर होती है। यह भी माना जाता है कि मनुष्य स्वभाव से ही सुंदरता का प्रेमी है, यह कारण वह अपने आस-पास के प्रत्येक तत्त्व एवं पदार्थ को सुन्दर देखना चाहता है। सजा संवार कर रखना चाहता है। नारी क्योंकि स्वभाव से ही प्रकृति के समान सुन्दर सलोनी हुआ करती है, सो बन-संवर कर रहना उसका प्राकृतिक अधिकार है, जिसे फैशन कहा गया है। वास्तव में उसका अर्थ देश, काल और वातावरण के अनुसार अपना साज-शृंगार करना ही है ताकि व्यक्तित्व में सब प्रकार से निखार एवं आकर्षण आ जाए।

इस विवेचन से स्पष्ट है कि फैशन का अर्थ व्यक्तित्व निखारने के लिए अपने तन-मन को सजाना-संवारना या शृंगार करना ही है। जैसे संसार के छोटे-बड़े प्रत्येक प्राणी को जन्मजात रूप से कुछ अधिकार प्राप्त हैं, उसी प्रकार हर जाति और वर्ग की नारी को यह जन्मजात अधिकार प्राप्त है कि वह समय और स्थिति के अनुसार अपने को सजा-संवार कर रखे। दूसरे शब्दों में देश-काल के प्रचलित फैशन के अनुरूप अपना शृंगार करे। वह इसलिए कि ऐसा करने से उस के व्यक्तित्व एवं सौन्दर्य में और भी निखार आ जाए। एक सहज-स्वाभाविक, तन-मन को, आँखों को अच्छा लगनेवाला, तृप्ति, सन्तुष्टि और शान्ति प्रदान कर सकने में समर्थ उभार आ जाए। बस, किसी भी युग के फैशन का अर्थ अंग-प्रदर्शन करना या नग्न हो जाना समझ या मान लिया जाता है, भारतीय सिनेमा के माध्यम से फैशन के नाम पर आज जिस नग्नता का प्रचार प्रसार हो रहा है, उसी सब को देख सुनकर ‘नारी और फैशन’ जैसे प्रश्न विचारणीय बन कर सामने आया करते हैं। .

फैशन के नाम पर आजकल सामने आ रही अश्लील नग्नता का विरोध करने पर कुछ लोग अजन्ता-ऐलोरा और प्राचीन मन्दिरों में बने भित्ति चित्रों की बातें कहने-करने लगते हैं। दलील देते हैं जब वह सब नग्न और अश्लील नहीं है, तो फिर यदि आज की नारी कुछ वैसा ही फैशन करके निकलती है, तो नंगी और अश्लील कैसे हो गई? उत्तर में पहली बात तो यह कही जा सकती है कि चित्र और वास्तविकता में बहुत अन्तर हुआ करता है। दूसरे, जिस युग में ये भित्ति चित्र बनाए गए थे, उस युग में स्त्री-पुरुषों की वेश-भूषा स्वभावतः वैसी ही थी, उन्होंने इस प्रकार का फैशन करके वे भित्ति चित्र नहीं बनवाए थे। तीसरे, तब के स्त्री पुरुषों के विचार

भाव और आपसी सम्बन्ध व्यवहार आज की तरह भड़क उठने वाले नहीं थे। उन्हें हर प्रकार के संयम की उचित शिक्षा दी जाती और संयमित व्यवहार सिखाए जाते थे। वे चित्र आदि उन के नमूने और धरोहर हैं, जीवन व्यवहारों की शिक्षा देने वाले हैं न कि कुविचारों और वासनाओं को भड़काने वाले। तब के मानव समाज को अनपढ़, अशिक्षित और जंगली; बदले में अपने समय को सुसभ्य, सुसंस्कृत, सुशिक्षित और उन्नत कह मान कर भी यदि हम उन्हीं को अपना आदर्श मान कर चलना चाहते हैं, तो मुझे कहना पड़ेगा कि वास्तव में हम आगे नहीं बढ़ रहे, बल्कि दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक पिछड़ते जा रहे हैं।

फैशन करना कभी ना कभी कतई बुरा नहीं है। फैशन करना नारी जाति का जन्मजात अधिकार भी है। लेकिन सोचने की मुख्य बात यह है कि जो फैशन स्वयं नारी को ही उसे मात्र एक उपभोक्ता वस्तु अर्थात् तेल, साबुन-सा बनाकर रख दे. दूसरों को उसके शील पर नाहक चोट पहुंचाने का आमंत्रण देता फिरे, उसे निर्लज्ज और जलील होने से बचा न सके; ऐसा फैशन आखिर किस काम का? सच्चा श्रृंगार मन और आत्मा का हुआ करता है, आँखों का हुआ करता है। यदि किसी के श्रृंगार से इन तीनों को ही कष्ट पहुँचे, अपने इन तीनों के लिए भी कष्ट का कारण बन जाए, तो ऐसा श्रृंगार किस काम का? हमारे विचार में तो उसे हम तन, मन, आत्मा, अपने व्यक्तित्व और समाज के लिए एक प्रकार का कष्टदायी बोझ ही कह सकते हैं।

ऋतु के अनुसार साज-शृंगार करने, वस्त्र पहनने की प्रथा इस देश के लिए कोई बात नहीं है। अत्यन्त प्राचीन काल में भी भारतवासी इन सब का ध्यान रखा करते थे। आपत्तिजनक है, वह सब कि जो आयातित है, जो फैशन हमारी अपनी रीति-नीतियों एवं उच्च परम्पराओं के विपरीत है। जो नग्नता, अश्लीलता और उच्छृखलता को भड़का कर अराजकता फैलाने वाला है-बस। नहीं तो कौन ऐसा हृदयहीन और निर्दय प्राणी है कि जो नारी से फैशन करने का उसका अधिकार छीनना चाहेगा? कोई भी तो नहीं।

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