Bharatiya Kisan “भारतीय किसान” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
भारतीय किसान
Bharatiya Kisan
भूमिका, अन्नदाता, सरलता, अशिक्षा, अभाव, परिश्रमी, सरकारी योजनाएँ, उपसंहार
भारतीय किसान परिश्रम, सेवा और त्याग की सजीव मूर्ति है। उसकी सादगी, सरलता तथा दुबलापन उसके सात्विक जीवन को प्रकट करते हैं। उसकी प्रशंसा में ठीक ही कहा गया है-
नगरों के ऐसे पाखंडों से दूर, साधना-निरत, सात्विक जीवन के महासत्य
तू वंदनीय जग का, चाहे रह छिपा नित्य इतिहास कहेगा तेरे श्रम में रहा सत्य
किसान संसार का अन्नदाता कहा जाता है। उसे अपने इस नाम को सार्थक बनाने के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता है। वह बहुत सवेरे ही अपने खेत में कार्य शुरू कर देता है। दोपहर तक लगातार परिश्रम करता है। वह खेतों के हवन में अपने पसीने की आहुति डालता है। इस आहुति के परिणामस्वरूप ही खेतों में हरियाली छा जाती है। दोपहर के भोजन के बाद वह फिर अपने काम में डट जाता है। सूर्यास्त तक लगातार काम करता है। ग्रीष्म ऋतु की कड़कती धूप हो या हाड़ कंपा देने वाला जाड़ा हो, दोनों स्थितियों में किसान अपने काम पर दिखाई देता है। इतना कठोर परिश्रम करने के बाद भी कई बार उसकी झोंपड़ी में अकाल का तांडव नृत्य दिखाई देता है। संकट में भी किसी से शिकायत नहीं करता। दुःख के घूंट पी कर रह जाता है।
भारतीय किसान के रहन-सहन में बड़ी सादगी और सरलता होती है। उसके जीवन पर बदलती हुई परिस्थितियों का कुछ असर नहीं पड़ता है। वह फैशन और आडंबर की दुनिया से हमेशा दूर रहता है। उसका जीवन अनेक प्रकार के अभावों से घिरा रहता है।
अशिक्षा के कारण भारतीय किसान अनेक बातों में पिछड़ गया है। उसका मानसिक विकास नहीं हो पाता। यही कारण है कि उसके जीवन में अंधविश्वास सरलता से अपना स्थान बना लेते हैं। इन अंधविश्वासों पर वह अपने खून- पसीने की कमाई का अपव्यय करता है। अपनी सरलता और सीधेपन के कारण वह सेठ साहूकारों तथा ज़मींदारों के चंगुल में फंस जाता है। वह इनके शोषण की चक्की में पिसता हुआ दम तोड़ देता है। मुंशी प्रेमचंद ने अपने उपन्यास गोदान में किसान जीवन की शोचनीय दशा का मार्मिक चित्रण किया है। किसानों में प्राय: ललित कथाओं एवं उद्योगों में भी रुचि नहीं होती। वह बहुत परिश्रमी है तो बहुत आलसी भी बन जाता है। साल के आठ महीने तो वह खूब काम करता है पर चार महीने वह हाथ पर हाथ-धर-कर बैठता है। नशा तो उसके जीवन का अंग बन जाता है। हिंसक घटनाएं, लड़ाई-झगड़ों के भयंकर परिणाम तो उसके जीवन को बर्बाद कर देते हैं।
किसान कुछ दोषों के होने पर भी दैवी गुणों से युक्त है। वह परिश्रम, बलिदान, त्याग और सेवा के आदर्श द्वारा संसार का उपकार करता है। ईश्वर के प्रति वह आस्थावान है। प्रकृति का वह पुजारी तथा धरती माँ का उपासक है। धन से गरीब होने पर भी मन का अमीर और उदार है। अतिथि का सत्कार करना वह अपना परम धर्म मानता है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय किसान के जीवन में बड़ा परिवर्तन आया है। सरकार ने उसे अनेक प्रकार की सुविधाएं प्रदान की हैं। अब उसका जीवन कुछ नगर जीवन के समान बनता जा रहा है। वह उत्तम बीजों के महत्त्व तथा आधुनिक मशीनों का प्रयोग सीख गया है। शिक्षा के प्रति भी उसकी रुचि बढ़ी है। अब उसकी संतान देश में ही नहीं विदेश में भी शिक्षा-लाभ करने का अवसर प्राप्त कर रही है। अब सेठ-साहूकार भी उसे शीघ्र अपना शिकार नहीं बना सकते। ग्राम पंचायतें भी उसे जागृति प्रदान कर रही हैं।
किसान अन्नदाता है। वह समाज का सच्चा हितैषी है। उसके सुख में ही देश का सुख है। उसकी समृद्धि में ही देश की समृद्धि है। आशा है कि भविष्य में किसान भरपूर उन्नति करेगा। शिक्षा उसके जीवन में नयी चमक लायेगी। देश को उस पर गर्व है।






















