Daivi Prakop – Badh “दैवी प्रकोप – बाढ़” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
दैवी प्रकोप – बाढ़
Daivi Prakop – Badh
भूमिका, बाढ़ प्रकृति का प्रकोप, बाढ़ से हानियां, हमारा कर्त्तव्य, उपसंहार
मनुष्य आदिकाल से ही प्रकृति की शक्तियों से संघर्ष करता चला आ रहा है। उसने अपनी बुद्धि के बल पर प्रकृति के अनेक रहस्यों का उद्घाटन करने में सफलता प्राप्त की है। लेकिन प्रकृति पर पूर्ण विजय प्राप्त करना उसके लिये कदापि संभव नहीं हो सकता। प्रकृति अजेय है। यह परिवर्तनशील है। यह अनेक रूपों में हमारे सामने आती है। यह कभी कोमल रूप में दृष्टिगोचर होती है तो कभी कठोर रूप धारण कर मनुष्य को विवश एवं असहाय बना देती है। प्रकृति की लीला अद्भुत है। जब यह प्रसन्न होकर घूमती है तो नंदन वन की शोभा छा जाती है। कभी उसकी हरीतिमा पर मन मुग्ध हो जाता है तो कभी मंद, शीतल और सुगंधित वायु तन के ताप को दूर कर देती है। लगता है कि प्रकृति आनंद का स्रोत है लेकिन जब यह ममतालु और दयालु प्रकृति कुपित होती है तो मनुष्य त्राहि-त्राहि कर उठता है । उसके अहं और शक्ति का पर्वत चूर-चूर हो जाता है। आंधी, तूफान, भूकंप, अकाल, अनावृष्टि, अतिवृष्टि प्रकृति के क्रोध के परिचायक हैं। अतृिष्टि का परिणाम है- ‘बाढ़’ ।
बाढ़ प्रकृति का एक बहुत भीषण स्वरूप है। भारत एक विशाल देश है। यहां प्रकृति विभिन्न क्षेत्रों में अपना विभिन्न प्रभाव दिखाती है। प्रत्येक वर्ष भारत ने किसी-न-किसी भाग में अतिवृष्टि के परिणामस्वरूप बाढ़ अपना प्रकोप दिखाती है। अधिक वर्षा के कारण धरती जलमय हो जाती है। नदियों के बांध टूट जाते हैं। बाढ़ का जल प्रचंड वेग से आगे बढ़ने लगता है। उसकी भूख इतनी भयंकर हो उठती है कि वह सब कुछ निगल जाना चाहता है। उसकी क्रूर लपेट में जो कुछ भी आता है मिट जाता है, चूर-चूर हो जाता है. अस्तित्वहीन हो जाता है। जल के तीव्र वेग से बड़े-बड़े वृक्ष उखड़ जाते हैं। मनुष्य, पशु-पक्षी बाढ़ के भीषण प्रवाह में बह जाते हैं। घास-फूस की झोपड़ियां तथा कच्चे मकान की नहीं, ईंट और पत्थर के बने बड़े-बड़े भवन तक धराशायी हो जाते हैं। धन-दौलत तथा अमूल्य सामग्री जल देवता की भेंट चढ़ जाती है।
बाढ़ का कुप्रभाव सारे जीवन के रंग को बेरंग बना देता है। बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र जन-शून्य हो जाता है। बाढ़ चली जाती है पर अपने नाश और क्रोध की गहरी छाप छोड़ जाती है। लोग बेघर हो जाते हैं। फसलें बरबाद हो जाती हैं। उद्योग- धंधे अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। लोगों को रहने के लिये कैंपों का सहारा लेना पड़ता है। पहनने के लिये कपड़ों का अभाव, अन्न-जल की समस्या आदि बाढ़-ग्रस्त लोगों का जीना दूभर कर देती है। बाढ़ धनवानों को निर्धनों की कोटि में तथा निर्धनों को अकिंचनों में ला खड़ा करती है। सर्वत्र दुःख अभाव और निराशा का वातावरण छा जाता है।
बाढ़ जैसे भयंकर प्रकोप के समय ही मनुष्य की मनुष्यता की परख होती है। साहसी मनुष्य अपनी जान पर खेल कर बाढ़ में घिरे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाते हैं। सरकार सैनिकों को सक्रिय कर देती है । समाज-सेवी संस्थाएं तथा स्वयं सेवक आगे बढ़कर बाढ़ पीड़ितों की सहायता में जुट जाते हैं। नावों एवं हैलीकाप्टरों की सहायता से बाढ़ से घिरे लोगों को बाहर निकाला जाता है। ऐसी विपत्ति के अवसर पर सब का कर्त्तव्य बन जाता है कि वे आपसी वैमनस्य का परित्याग कर परोपकार का मार्ग अपनाएं। जनता की उदारता तथा सहायता के बिना सरकार भी कुछ नहीं कर सकती।
भारत को प्रतिवर्ष किसी-न-किसी भाग में बाढ़ के प्रकोप का कुपरिणाम भुगतान पड़ता है। कभी मां की संज्ञा पाने वाली गंगा अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर अपनी संतान को पीड़ित करती है तो कभी यमुना का प्रकोप दिल्ली तथा उसके आस-पास के क्षेत्र को भयभीत करता है। कभी गोमती का पागलपन बढ़ जाता है तो कभी दक्षिण भारत की नदियां अंधी दौड़ लगाना शुरू कर देती हैं। कभी ब्रह्मपुत्र तांडव रूप धारण कर आसाम को पीस डालता है तो कभी पंजाब की नदियां भृकुटि तान कर उसे भयभीत कर देती हैं। गतवर्ष भारत के कई क्षेत्रों में बाढ़ का प्रभाव रहा। इससे धन, माल तथा जान की पर्याप्त हानि हुई।
बाढ़ एक प्राकृतिक प्रकोप है। इसको रोका नहीं जा सकता। इससे बचने के उपाय किए जा सकते हैं। भारत सरकार इस दिशा में सक्रिय है। उसने अनेक डैमों का निर्माण कर जल पर नियंत्रण ही नहीं किया बल्कि उससे बिजली उत्पन्न कर अनेक उद्योग-धंधों के विकास में भी अपना योगदान दिया है।
देश पर जब कभी भी बाद के रूप में आपत्ति आये, हमारा कर्त्तव्य है कि हम तन, मन और धन से बाढ़-पीड़ितों से सहायता करें। मनुष्य परोपकार द्वारा ही अपनी मनुष्यता को सार्थक बना सकता है।






















