Jeevan Mein Parishram Ka Mahatva “जीवन में परिश्रम का महत्त्व” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
जीवन में परिश्रम का महत्त्व
Jeevan Mein Parishram Ka Mahatva
भूमिका, परिश्रम का महत्त्व, आलस्य से हानियां, परिश्रम और भाग्य, उपसंहार
इस संसार में जितने भी चेतन प्राणी हैं, उनमें से कोई भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। यहां तक कि प्रकृति के सभी पदार्थ भी नियमपूर्वक अपना कार्य करते हैं। सूर्य प्रतिदिन समय पर निकलकर संसार का उपकार करता है। वह कभी अपने नियम का उल्लंघन नहीं करता। नदियां भी दिन-रात यात्रा करती रहती हैं। वनस्पतियां भी समय और वातावरण के अनुसार परिवर्द्धित होती रहती हैं। कीड़े तथा पक्षी तक अपने दैनिक जीवन में व्यस्त रहते हैं। जब संसार के अन्य प्राणी व्यस्त हैं अथवा परिश्रम करते रहते हैं तब मनुष्य जो संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, काम किये बिना कैसे रह सकता है। वास्तव में कर्म अथवा श्रम के बिना मानव जीवन की गाड़ी चल भी नहीं सकती। श्रम ही उन्नति, प्रगति, विकास और निर्माण कर सकता है। परिश्रम और प्रयास की बड़ी महिमा है। यदि मनुष्य परिश्रम न करता तो संसार में कुछ भी न होता। आज संसार में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह परिश्रम का ही परिणाम है।
परिश्रम का अत्यधिक महत्त्व है। परिश्रम के अभाव में जीवन की गाड़ी नहीं चल सकती। यहां तक कि स्वयं का उठना-बैठना, खाना-पीना भी संभव नहीं हो सकता। फिर उन्नति और विकास की तो कल्पना भी नहीं को जा सकती। आज संसार में जो राष्ट्र सर्वाधिक उन्नत हैं, वे परिश्रम के बल पर ही इस उन्नत दशा को प्राप्त हुए हैं।
परिश्रम का अभिप्राय ऐसे परिश्रम से है जिससे निर्माण हो, रचना हो । जिस परिश्रम से निर्माण नहीं होता, उसका कुछ अर्थ नहीं। जो व्यक्ति आलस का जीवन बिताते हैं, वे कभी उन्नति नहीं कर सकते ।
आलस्य जीवन को अभिशापमय बना देता है। आलसी व्यक्ति परावलंबी होता है। वह कभी पराधीनता से मुक्त नहीं हो सकता। हमारा देश सदियों तक पराधीन रहा। इसका आधारभूत कारण भारतीय जीवन में व्याप्त आलस्य एवं हीन भावना थी। जैसे ही हमने परिश्रम के महत्त्व को समझा वैसे ही हमारी हीनता दूर होती गई और हम में आत्मविश्वास बढ़ता गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि हमने एक दिन पराधीनता की केंचुली उतार का फेंक दी। परिश्रम ही छोटे से बड़े बनने का साधन है। यदि छात्र परिश्रम न करे तो परीक्षा में कैसे, सफल हो । मज़दूर भी मेहनत का पसीना बहाकर, सड़कों, भवनों, डैमों, मशीनों तथा संसार के लिये उपयोगी वस्तुओं का निर्माण करते हैं । मूर्तिकार, चित्रकार, कवि, लेखक सब परिश्रम द्वारा ही अपनी रचनाओं से संसार को लाभ पहुंचाते हैं। कालिदास, तुलसीदास, शेक्सपीयर, टैगोर आदि परिश्रम के बल पर ही अमर हो गए हैं। परिश्रम के बल पर ही वे अपनी रचनाओं के रूप में अजर-अमर हैं।
कुछ लोग परिश्रम की अपेक्षा भाग्य को महत्त्व देते हैं। उनका तर्क है कि जो भाग्य में है वह अवश्य मिलेगा, अतः दौड़-धूप करना व्यर्थ है। यह तर्क निराधार है। यह ठीक है कि भाग्य का भी हमारे जीवन में महत्त्व है लेकिन आलसी बनकर बैठे रहना और असफलता के लिए भाग्य को कोसना किसी प्रकार भी उचित नहीं । परिश्रम के बल पर मनुष्य भाग्य की रेखाओं को भी बदल सकता है। आलसी एवं कामचोर व्यक्ति ही ईश्वर के लिखे लेख को पढ़ते हैं ।
आज हमारे देश में अनेक समस्याएं हैं। उन सबके समाधान का साधन परिश्रम है। परिश्रम के द्वारा ही बेकारी की, खाद्य की और अर्थ की समस्या का अंत किया सकता है। परिश्रम के बल पर निर्धन धनवान् बन सकता है, मूर्ख विद्वान् बन सकता है। परिश्रम के द्वारा मनुष्य प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति कर सकता है। संसार का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जितने भी महान् व्यक्ति हुए हैं, वे सब परिश्रम के बल पर ही ऊपर उठे हैं। सामान्य से असामान्य स्थिति प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ साधन परिश्रम है, परिश्रमी व्यक्ति स्वावलंबी, ईमानदार, सत्यवादी, चरित्रवान् और सेवा-भाव से युक्त होता है। परिश्रम करने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। परिश्रम के द्वारा ही मनुष्य अपनी, परिवार की, जाति की तथा राष्ट्र की उन्नति में सहयोग दे सकता है। अतः मनुष्य को परिश्रम करने की प्रवृत्ति बचपन अथवा विद्यार्थी जीवन से ग्रहण करनी चाहिए। परिश्रम से ही मिट्टी सोना उगलती है। यह व्यक्ति एवं देश की उन्नति एवं सफलता का रहस्य है।






















