Rupye Ki Atmakatha “रुपए की आत्मकथा” Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 Examination.
रुपए की आत्मकथा
Rupye Ki Atmakatha
भूमिका, रुपए का जन्म, व्यापार में योगदान, उपयोग, उपसंहार
मैं बाजार से घर लौटा और अपने कपड़े बदलने लगा कि अचानक मेरी कमीज़ की जेब से रुपए का एक सिक्का फर्श पर लुढ़क गया। फर्श से टकराते ही उस की ‘ठन’ ‘ठन’ की आवाज़ कमरे मैं फैल गई। मैं उसे नीचे से उठाने के लिए झुका ही था कि वह खिलखिला कर हँस पड़ा और बोला, “देखा, मैंने तुझे अपने लिए घुटने के बल झुका दिया। अरे, तुम क्या मैंने तो बड़ों-बड़ों को अपने सामने झुका दिया। राजा महाराजा, भिखारी, व्यापारी, नौकरी पेशा सब मेरे सामने झुके रहते हैं। मैं हूँ ही इतना महान् ! मेरी कहानी सुनना चाहोगे?” मेरे हाँ में सिर हिलाने पर वह-गर्व भरे स्वर में बोला “मेरा जन्म बड़े महान् वंश में हुआ है। मेरे पूर्वज तो सोने-चांदी से बने थे पर मैं एल्यूमीयिम की मिश्र धातु से बना हुआ हूँ। समय की मार ने मुझे बहुत प्रभावित किया है।”
शताब्दियों पहले मेरा परिवार अस्तित्व में नहीं था। तब लोग वस्तुओं में लेने-देन से व्यापार चला लिया करते थे अनाज के बदले कपड़े, कपड़ों के बदले जूते, जूतों के बदले आभूषण आदि अलद-बदल से मानव व्यापार चल जाता था पर इसमें बड़ी गड़बड़ थी। लोगों की रोटी तो रोज़ खानी होती है लेकिन नये जूते तो महीनों वर्षों में एक बार खरीदने पड़ते हैं इसलिए इंसान को सिक्कों और रुपयों की ज़रूरत अनुभव हुई। साथ ही जगह-जगह अनाज तथा माल को लाद कर ले जाना कठिन था इसलिए भी उन्हें जल्दी से बदले में दिए जाने वाले रुपये की आवश्यकता थी। राजा महाराजाओं ने धातु के टुकड़ों पर अपने राज्य की मुहर अंकित कर के मेरा प्रचलन किया। सोना, चांदी, तांबा आदि धातुओं के द्वारा मेरा रूप निखरता रहा। एक बार ही मुझे चमड़े के टुकड़ों में भी आरंभ किया गया था और अब तो कागज़ के रूप में मेरा रूप अधिक प्रचलित है। वैसे मेरा जन्म देश की एक टकसाल में हुआ था। मुझे खनिज से निष्कर्षित किया गया। अब तो मैं तुम्हें बहुत चमकीला और सुंदर प्रतीत होता हूँ, पर पहले मैं पत्थरों के एक टुकड़े के समान था। मुझे बड़ी-बड़ी मशीनों में पीसा गया फिर न जाने किन-किन रासायनिक विधियों से मुझे अशुद्धियों से रहित किया गया। विद्युत् अपघटन से मुझे प्राप्त किया गया। बड़ी-बड़ी भट्टियों की तपन मैंने सही और जब मैं गर्मी प्राप्त कर उबल रहा था और कराह रहा था तब न जाने कौन-कौन सी अन्य धातुएं मुझ में मिला कर मिश्र धातु बना दी गई। इससे मेरा गुण बदल गया। मुझ में वातावरण को झेलने, तरह-तरह की रगड़ से बचने आदि के गुण प्राप्त हो गए। चांदी की तरह चमकती पिघली हुई धातु को सांचों में डाल दिया गया जिसके एक ओर अशोक स्तंभ पर बना तीन मुंह वाला शेर बना हुआ था दूसरी तरफ मेरी कीमत लिखी हुई थी। मैं अपने सुंदर, रुपहले जगमगाते रूप पर स्वयं ही मुग्ध हो उठा पर मैं ही अपने जैसा अकेला नहीं था बल्कि मेरे जैसे रूप वाले हज़ारों-लाखों करोड़ों और भी थे। हम सब यांत्रिक ढंग से बड़े-बड़े बोरों में बंद हुए और रेलगाड़ी तथा अन्य वाहनों से घूमते-फिरते एक बैंक में पहुंच गए। मेरे और मेरे साथियों के चारों ओर बंदूकधारी रक्षक थे। मैं तो बाहर की दुनिया देखने के लिए परेशान हो उठा था । एक दिन मुझे मेरे साथियों सहित बाहर निकाला गया और मुझे एक व्यक्ति के हाथ सौंप दिया गया और तब से मेरी जो यात्रा आरंभ हुई वह समाप्त होने को नहीं आ रहा है। मैं कभी किसी व्यापारी के हाथ जाता हूँ तो कभी किसी कर्मचारी के कभी किसी बच्चे की जेब में मुझे स्थान मिलता है तो कभी महिला के पर्स में। कभी मैं भिखारी के कटोरे में दिखायी देता हूँ तो कभी देवता की मूर्ति के सामने । शुक्र है कि मैं अभी तक किसी कंजूस की थैली में बंद नहीं हुआ-नहीं तो मुझे सांस तक लेनी कठिन हो जाती। आज मैं तुम्हारे पास हूँ और पता नहीं कल किस के पास होऊंगा। खैर, यही मेरा जीवन है। मुझे निरंतर चलते ही रहना है।”
यह कह कर रुपये का सिक्का मौन हो गया और मैने उसे उठा कर अपनी जेब के हवाले किया।






















