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Hindi Essay/Paragraph/Speech on “Mother Teresa – Samaj Sevika”, “मदर टेरेसा-समाज-सेविका” Complete Essay, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

मदर टेरेसा-समाज-सेविका

Mother Teresa – Samaj Sevika

मदर टेरेसा का जन्म 27-8-1910 को यूगोस्लाविया के स्कोपजे नामक  नगर में हुआ था। उनके बचपन का नाम एग्नेस बोहाझिड था। उनके पिता का नाम अल्बेनियन था। जो कि एक उदार और धार्मिक प्रवृत्ति के थे। जिनका प्रभाव उनकी पुत्री पर पड़ा। अपनी 12 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने परोपकार को ही अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य मान लिया। परोपकारिता की ओर कदम बढ़ाती हुई मदर टेरेसा ने 18 वर्ष की आयु में ही नन बनने का दृढ़ मन बना लिया। इसके लिए वे आयरलैण्ड गयीं। वहाँ के ननों के केन्द्र में शामिल भी हो गईं। वहाँ कुछ समय रहकर सेवा-भावना से सबको प्रभावित कर रहीं था। जिसके कारण उन्हें मानवसेवा के लिए भारत भेजा गया।

मदर टेरेसा भारत आकर मानव-सेवा को अपना सर्वश्रेष्ठ धर्म मान कर सन्। 1929 में अपने कलकत्ता के एग्नेस लोरेटो एटेली स्कूल में अध्यापन-वृत्ति आरंभ किया। इसके साथ ही वे अपने मानव-सेवा धर्म का कार्य बढ़ाए रखा। वे निरंतर दीन-दुःखी और असहाय प्राणियों की पुकार को ही सुन मदद को तत्पर रहतीं।

10.12.1946 को जबये रेलगाड़ी से दार्जिलिंग जा रही थी, तब इनके मन में मानव-सेवा करने की तीव्र भाव भर आया। उस समय इन्हें ऐसा लगा मानो असंख्य पीड़ित, दीन-दुःखी और असहाय प्राणी उन्हें अपनी सहायता के लिए पुकार रहे हैं। जिसकी वजह से वे अध्यापनवृत्ति का त्याग कर सेवा में लग गईं।

सन् 1948 ई. में कलकत्ता के झुग्गी-झोंपड़ियों के बच्चों के लिए शिक्षा की * आवश्यकता पर बल देने के लिए स्कूल खोला। इसके बाद कलकत्ता के ही काली मंदिर के पास निर्मल हृदय नामक धर्मशाला को खोला। वहाँ पर असहाय लोगों के लिए आश्रय हेतु प्रबंध किया।

मदर टेरेसा की विचारधारा से कई लोग प्रभावित होकर अपनी-अपनी यथाशक्ति योगदान देने लगे। चैरिटी की स्थापना हो गई। सन् 1950 ई. में उन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की। जिसमें मानवता की सेवा के प्रति अभिरुचि रखने वाली सेविकाओं को अपने साथ ले लिया। इस प्रकार उन्होंने मानव-सेवा के अपने दृढ़-संकल्प में पूरी तरह समर्पित हो गईं। इस अभियान में पतली नीली किनारी वाली सफेद साड़ियों वाली महिलाएँ गाँव-गाँव और शहर-शहर मानवसेवा के लिए निकल पड़ी।

मदर टेरेसा ने 50 वर्षों तक अपने जीवन को मानव-सेवा के लिए समर्पित कर रखा था। अपने प्रयासों से उन्होंने कई केन्द्र स्थापित कर डाले। जो कि 169 शिक्षण संस्थाओं, 1369 उपचार केन्द्र, 755 आश्रमगृह आदि।

मदर टेरेसा संत-स्वाभाव की थी। संत भावना के फलस्वरूप ही उनका नाम 16 वीं शताब्दी में संत टरेसा के नाम से प्रसिद्ध हुई एक नन के नाम पर टेरेसा पड़ गया। वे सिर्फ अनाथ ही नहीं अपितु विकलांगों, बच्चों के जीवन को सुखमय बनाने के लिए अपने जीवन के अंत समय तक भी प्रयासरत् रहीं। इस संसार से उन्होंने सन् 1997 में विदा हो गयीं।

योतों उनका अंत हो गया पर वे अपने किए हुए कार्य के बल पर सदा-सदा के लिए अमर हो गई। उनके दिखाए मार्ग हमारे सामने हैं। अगर हम उन्हें समझ कर उन पर अमल करते हैं तो यह उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। किसी ने सच ही कहा

अल्बानिया में जन्मी पर भारत की बेटी कहलाई सेवा कर दीन-दुखियों, जरूरमंदों को किसने यह राह दिखायी? मदर टेरेसा है वो, जिसने मानव-सेवा के सपने को सच कर दिखाया।

मदर टेरेसा के नश्वर शरीर के आज हमारे बीच न होने पर भी उनके आदर्श एवं शिक्षा हमारे पास हैं जो समय-समय पर सभी का मार्गदर्शन करते रहेंगे। मदर टेरेसा का एक सपना था कि वे भारत को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को दु:ख मुक्त देखना चाहती थी। वे कहती हैं कि- आज दुनियां स्वार्थी हो गई है।

मदर टेरेसा की सेवाओं तथा बेसहारा बेबस लोगों के आश्रय जैसे कार्यों के लिए सन् 1962 में राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मश्री से विभूषित कियाष। अंतराष्ट्रीय सद्भाव के लिए उन्हें रैमन मैगसे से सन् 1963 में नराजा गया। सन् 1980 में भारत रत्न जैसे अनेक अवार्ड तथा पुरस्कार प्राप्त किए।

आज सारा संसार उनके द्वारा दिखाए गए मार्गों के समक्ष नतमस्तक है।

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