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Hindi Essay on “Yadi mein Shiksha Mantri hota”, “यदि मैं शिक्षा मन्त्री होता” Complete Hindi Nibandh for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

यदि मैं शिक्षा मन्त्री होता

Yadi mein Shiksha Mantri hota

प्रस्तावना : शिक्षा ही राष्ट्र की बहुमुखी प्रगति का मूल स्रोत है। इसलिये हर राष्ट्र के कर्णधार शिक्षा को बहुत महत्त्व देते आए हैं। विदेशी शासकों ने हमारे राष्ट्र पर स्थायी रूप से शासन हेतु यहाँ की शिक्षा प्रणाली इस प्रकार की बनायी थी, जिससे हम परतन्त्रता की प्रवृत्ति को ही सदैव के लिए अंगीकार करें।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली के दोष : हमारा राष्ट्र स्वतन्त्र हुआ। उसके शासन की बागडोर हमारे कर्णधारों ने सम्भाली । अनेक प्रकार से सुधार किए; पर शिक्षा प्रणाली वैसी की वैसी ही रही। उनी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। अब इस स्वतन्त्र राष्ट्र को 54 व वर्ष चल रहा है  तंब भी शिक्षा में कोई विशेष परिवर्तन दृष्टिगत नहीं हो रहा है।

विद्यालय एवं महाविद्यालयों की संख्या अधिक अवश्य हुई; पर शिक्षा का स्तर ज्यों का त्यों ही रहा। देखा जाए तो माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा बिल्कुल ही अपूर्ण है। इस पर भी उसका व्यय दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। पाठ्य पुस्तकों का शीघ्रातिशीघ्र परिवर्तन और शुल्क की बढ़ोतरी शिक्षार्थियों की कमर तोड़ रही है। विद्यालयों में विषयों और पाठ्य पुस्तकों का इतना आधिक्य होता जा रहा है कि शिक्षार्थी रट-रटकर परेशान हो जाते हैं। इस प्रकार के अध्ययन से बुद्धि क्षीण व शिथिल रह जाती है। स्वतन्त्र भारत में शिक्षा की ऐसी स्थिति देखकर मेरा रोम-रोम क्षुब्ध हो उठता है। कभी-कभी सोच उठता हूँ कि इससे अच्छा प्रबन्ध, तो मैं ही शिक्षा मन्त्री होकर कर सकता। यदि मैं शिक्षा मन्त्री होता तो भारतीय शिक्षा के लिये निम्नलिखित उपाय करता।

प्राथमिक शिक्षा : हमारे देश में ऐसे बच्चों की संख्या विशेष है जो निर्धनता के कारण विद्यालय का मुख नहीं देख पाते हैं। मैं उनकी परिस्थितियों का अवलोकन कर उन्हें पढ़ने के लिये अवश्य बाधित ही नहीं करता; अपितु प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य कर देता। हमारे देश में हर बच्चे को शिक्षा पाने का अधिकार है, फिर वे ही निर्धनता के अभिशाप के कारण इससे वंचित क्यों रहें ? प्राथमिक विद्यालयों में शारीरिक दण्ड का निषेध करा देता और इस पर भी अध्यापक वर्ग दण्ड देता हुआ पाया जाता, तो उसे नौकरी से विमुक्त कर देता। प्राथमिक कथाओं में शिशुओं की अवस्था एवं बुद्धि का ध्यान रखकर वैसी ही सरल एवं शिक्षाप्रद पुस्तक रख पाता जिनसे कि बुद्धि का समुचित विकास होता । मान्टेसरी शिक्षा पद्धति पर विशेष बल देता और गाँधी जी द्वारा चालित बेसिक शिक्षा को ग्रामों में विशेष रूप से चलवाता। छोटे-छोटे विद्यालयों का वातावरण प्यार भरा होना चाहिए, जिनसे नन्हे-मुन्ने घर से अधिक इन्हें चाहने लगे।

माध्यमिक शिक्षा : हमारे देश की पुरातन सभ्यता एवं संस्कृति जगत प्रसिद्ध है। इसकी सुरक्षा के लिए माध्यमिक शिक्षा में लड़के और लड़कियों के लिए पृथक्-पृथक् विद्यालरा अनिवार्य हैं। यहाँ पर भी पुस्तकों की संख्या कम ही रखवाता। मेरी इच्छा है कि हमारे देश में ऐसी शिक्षा का प्रचलन रहे कि विद्यार्थी शारीरिक श्रम को उपेक्षा की दृष्टि से न देखें । उन्हें शिक्षा के साथ हस्तकला भी सिखाई जाए ताकि बुद्धि के विकास के साथ-साथ शरीर भी उन्नत हो सके। अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त करा देता और अंकगणित को भी ऐच्छिक विषय बनवा देता। संगीत, नृत्य, बुनाई, कताई, बढ़ईगीरी, पुस्तक बाँधना, छपाई, दर्जीगीरी, चित्रकला, रेडियो इन्जीनियरी, हस्तकला और अन्य शिल्पकला आदि अनेक प्रकार के विषयों पर बल देता। नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र, भूगोल, इतिहास तथा संस्कृत आदि विषय भी इनके साथ रहते। विद्यार्थी इच्छानुसार विषयों का चयन करते। बालिकाओं की शिक्षा में विशेष रूप से भिन्नता होती। उनके विषय में कला और दस्तकारी तथा गृह विज्ञान पर विशेष जोर दिया जाता और उनके अन्य विषय ऐच्छिक होते।

प्रौढ़ शिक्षा : प्रौढ़ शिक्षा भी हमारे देश में बहुत आवश्यक है। इसकी महत्ता को समझते हुए मैं उसके लिए संध्याकालीन विद्यालयों की स्थापना कराता। उनके पठन-पाठन के लिए विशेष प्रकार की पुस्तकों का आयोजन करता। उनके लिए ऐसे पुस्तकालय खुलवाता जहाँ पर बैठकर प्रौढ़ जनता अपनी सुविधा से समाचारपत्र तथा मनोरंजन की पुस्तकों का अवलोकन कर सकती। उनके अध्ययन के लिए विशेष प्रकार से प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति करवाता । इसके अतिरिक्त समस्त राज्यों की उच्च कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिये प्रौढ़ शिक्षा के शिक्षण का भी आयोजन करवाता ताकि उन्हें पता चल जाता कि प्रौढों को कैसे शिक्षा दी जाती है? अवकाश के समय में उन्हें सामूहिक रूप में देश के कोने-कोने के भिजवाने का आयोजन कराता ताकि वे प्रौढों को उनके समयानुकूल पढ़ाते।

उच्च शिक्षा : मेधावी शिक्षार्थियों के लिये उच्च शिक्षा अनिवार्य है। इसके साथ ही समूचे राष्ट्र में उद्योग धन्धे वाले उच्च महाविद्यालयों की प्रचुर संख्या में स्थापना करवाता ताकि शिक्षार्थियों को अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात् किसी की दासता न करनी पड़े। वे स्वतन्त्र रूप से अपनी आजीविका के साधन जुटा सकें। वे अपनी-अपनी कला की प्रगति के साथ-साथ राष्ट्र को भी प्रगतिशील बना सकें। महिलाएँ भी उच्च शिक्षा में पुरुषों का साथ देतीं।

उपसंहार : यदि आज मैं शिक्षा मंत्री होता, तो देश में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च सभी तरह की शिक्षा पद्धतियों में वस्तुतः आमूलचूल परिवर्तन करता। मैं समझता हूँ कि उत्तम ढंग की शिक्षण पद्धति से ही राष्ट्र प्रगति के शिखर पर पहुँच सकता है।

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