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Hindi Essay on “Vidyarthi Aur Anusashan” , ” विद्यार्थी और अनुशासन ” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

विद्यार्थी और अनुशासन

नियमित अर्थात समाज, संस्था द्वारा निर्धारित या स्वंय उसके नियमों का पालन करते हुए जीवन जीने का प्रयत्न ही अनुशासन है। अनुशासन किसी वर्ग या आयु-विशेष के लोगों के ही नहीं, बल्कि सभी के लिए परम आवश्यक हुआ करता है। जिस जाति, देश और राष्ट्र-जनों में अनुशासन का अभाव रहता है, वे अधिक समय तक अपना अस्तित्व नहीं बनाए रख सकते। यदि किसी अन्य कारण से अस्तित्व बना भी रह जाए, पर अनुशासन के अभाव में स्वतंत्र सत्ता का बना रहना तो कदापि संभव नहीं हुआ करता है। इसलिए विद्यार्थी जीवन क्योंकि भविष्य के लिए तैयारी का समय माना जाता है। इस कारा अनुशासन का पालन उसके लिए और भी आवश्यक बल्कि परम आवश्यक हो जाया करता है। आज वह अपने जीवन को जिस प्रकार का बना लेगा, जिस सांचे में ढालने का प्रत्यन कर लेगा, कल वही सब उसकी सफलता-असफलता का मानदंड बन जाएगा। इसी कारण विद्यार्थी या युवा वर्ग के लिए अनुशासित रहने की बात विशेष रूप से कही जाती है। आज का विद्यार्थी ही कल का नेता तथा अन्य सब कुछहै। कल उन्हीं में से आगे बढक़र कुछ लोगां ने देश-समाज की शासन-व्यवस्था को संभालना होता है। अत: क्यों न वह अभी से शासन एंव व्यवस्था का आदी बन जाए, जबकि अनुशासन का अर्थ ही है-सुशासन और सुव्यवस्था।

‘अनुशासन’ शब्द ‘अनु’ उपसर्ग और ‘शासन’ शब्द के मेल से बना है। ‘अनु’ उपसर्ग का अर्थ होता है-पश्चात या साथ और ‘शासन’ का अर्थ है नियम या व्यवस्था। इस प्रकार जीवन और समाज में अपने घर-द्वार से लेकर विभिन्न और विविध क्षेत्रों के सुसंचालन के लिए जो नियम बनाए गए या बन गए हैं, जो व्यवसथांए निर्धारित की गई या सभ्य सामाजिकों के आपसी व्यवहारों से आप ही हो गई हैं, उनका पालन करना या उनके अनुसार चलना ही वास्तव में ‘अनुशसन’ हुआ करता है। विशेषकर विद्यार्थी जीवन क्योंकि पढऩे-सीखने और भविष्य के लिए उचित समझ बनाने का जीवन हुआ करता है, अत: सभी प्रकार की निर्धारित और मान्य व्यवस्थाओं का पालन उसके लिए आवश्यक हो जाया करता है। बड़े खेद के साथ कहना और मानना पड़ता है कि न केवल भारत बल्कि विश्व का विद्यार्थी वर्ग आज अधिकाधिक अनुशासनहीन होता जा रहा है। विद्यार्थी वर्ग का अनुशासनहीन होने का अर्थ है देश के वर्तमान और भविष्य दोनों का अपने लक्ष्यों से भटक जाना। इसे शुभ लक्षण नहीं कहा जा सकता। भारत जैसे विकासोन्मुख देश के लिए तो कदापि ही नहीं कहा जा सकता। इससे बचने की आवश्यकता है।

आज का विद्यार्थी या युवा वर्ग इतना अनुशासनहीन क्यों होता जा रहा है? प्रश्न करने पर उत्तर मिलता है कि वह जिस जीवन और समाज का अंग है, उसके अगुवा ही जब अनुशासन की धज्जियां उड़ा रहे हों, तब इस वर्ग से अनुशासन की आशा करना या मांग करना कोई अर्थ नहीं रखता। ऊपरी तौर पर निश्चय ही यह बात ठीक लगती है पर प्रश्न यह है कि तब अनुशासन की शुरुआत कहां से होगी? निश्चय ही जो आयु और व्यवहार के स्तर पर ढल चुके हैं, उनके द्वारा अब कुछ होने-हवाने वाला नहीं है। इसकी शुरुआत स्वैच्छा से विद्यार्थी और नवयुवा वर्ग को ही करनी होगी। ऐसा करने के लिए घर-परिवार और पूरे समाज से यदि उन्हें विद्रोह भी करना पड़, तो करना होगा। आज जो काम वे शुरू करेंगे, कल वे स्वंय ही उसका सुफल भोगेंगे। इसी कारण जब भी अनुशासन की चर्चा चलती है, विद्यार्थी और युवा वर्ग का नाम अपने आप ही उछलकर सामने आ जाता है। इन्हीं को अनुशासित करने पर बल दिया जाता है।

जीवन के सामान्य व्यवहारों के स्तर पर हम पाते हैं कि आज का विद्यार्थी दूसरों की इच्छी बातों की नकल कर पाने में समर्थ नहीं रह गया। बुराईयों की नकल वह झटपट कर लेता है। उसके भटकाव और अनुशासनहीनता का मुख्य कारण यह फिसलन भरी मानसिकता ही है। होना यह चाहिए कि वह नीर-क्षीर विवेकी बनकर अच्छी बातों को सीखे, व्यर्थ की बातों की नितांत उपेक्षा करता जाए। क्योंकि अनुशासन कोई बाहर से थोपी जा सकने वाली वस्तु नहीं, अत: मात्र यह प्रक्रिया अपना लेना से ही वह स्वंय तो अनुशासित होगा ही, आने वाली पीढ़ी का भी आदर्शन बन सकेगा। जैसा कि हम पहले भी कह आए हैं, जीवन-समाज के व्यापक स्तर पर मान्य नियमों के अनुसार चलना ही अनुशासन है। पर आज का विद्यार्थी विद्या-उपार्जन तक अपने मुख्य कार्य में भी उस सबकी अवहेलना करने लगा है-दुखद स्थिति मुख्यत: यही कही जा सकती है। इसी से छुटकाना पाना बहुत ही आवश्यक है।

यह भी एक सत्य है कि आज का विद्यार्थी पहले से कहीं अधिक सजग, बुद्धिमान और भविष्य के प्रति जागरुक है। इसके साथ व्यवहार के स्तर पर यदि वह अपने-आपको स्वेच्छा से अनुशासित भी कर ले तो सोने पर सुहागे वाली बात हो जाएगी। विद्यार्थी के लिए सबसे बड़ा अनुशासन यही हो सकता है कि वह सभी प्रकार की व्यर्थ की बातों से दूर रहकर अपनी शिक्षा और शिक्षा-जगत के प्रति आस्थावान हो जाए। यह आस्था वस्तुत: उसके अपने व्यक्त्वि और उसके माध्यम से समूचे राष्ट्र बल्कि समूची मानवता के प्रति जागरुक होने की प्रतीक है। उसकी यह आस्था कोई कारण नहीं कि अन्यों को भी आस्था एंव अनुशासनवान न बना दे। आवश्यकता इन तथ्यों को समझकर जीवन में आज से आरंभ कर देने की है।

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