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Hindi Essay on “Swavalamban” , ”स्वावलम्बन ” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

स्वावलम्बन 

Swavalamban

स्वावलम्बन में दो शब्द हैं- स्व और लम्बन। एक का अर्थ है अपना और अवलम्बन का अर्थ है ‘सहारा’। इस प्रकार स्वावलम्बन का अर्थ हुआ ‘अपना सहारा स्वयं बनना’। दूसरे शब्दों में अपने आत्मबल को जागृत करना ही स्वावलम्बन है। राष्ट्र कवि दिनकर स्वावलम्बी व्यक्ति के लक्षण बताते हुए कहते हैं-

अपना बल तेज जगाता है। सम्मान जगत् से पाता है।

                स्वावलम्बन के दो पहलू हैं- आत्मनिश्चय और आत्मनिर्भरता। स्वावलम्बी व्यक्ति को असम्भव कार्य भी सम्भव दिखने लगता है। इसे इस दृष्टान्त से अच्छी तरह समझा जा सकता है। एक बार विधाता अपनी सृष्टि को देखने निकले। धरती पर पहुंचकर उन्होंने देखा कि एक किसान फावड़ा लेकर विशाल पर्वत की जड़ को खोद रहा है। उन्होंने किसान से इसका कारण पूछा किसान ने बताया, ‘‘बादल आते हैं और इस पर्वत से टकराकर इसकी दूसरी ओर वर्षा कर देते हैं मेरे खेत सूखे ही रह जाते हैं। अतएव मैं इसे हटाकर ही दम लूंगा।’’ विधाता किसान के स्वावलम्बन से प्रभावित होकर आगे बढ़े। तभी पर्वत गिड़गिड़ाने लगा- ‘‘भगवन्! इस किसान से मेरी रक्षा कीजिए।’’ विधाता ने पूछा- ‘‘तुम एक छोटे से किसान से इतने भयभीत हो।’’ पर्वत बोला-‘‘किसान छोटा है तो क्या वह स्वावलम्बी है। उसका आत्मविश्वास अडिग है। इस दोनों के सहारे वह मुझे हटाकर ही दम लेगा।’’

                इसके ठीक विपरीत छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी दूसरे पर आश्रित रहना परावलम्बन कहलाता है। परावलम्बी व्यक्ति हाथ रहते लूला और पैर रहते लंगड़ा बना रहता है। जिसे अपने पैरों पर खड़े रहने की शक्ति नहीं है, वह दूसरांे का कन्धा पकड़कर कब तक चलता रहेगा। एक झटका खाते ही ऐसा व्यक्ति धराशायी हो जाता है। इसे इस दृष्टान्त से समझा जा सकता है। मेज के सहारे एक शीशा खड़ा था। चंचल बालक ने मेज को अलग हटा दिया, शीशा गिरकर चूर हो गया। अतः जीवन में जो व्यक्ति दूसरे के सहारे खड़ा होना चाहता है, उसका अन्त भी ऐसा ही करूणामय होता है। कहा भी गया है- ‘‘ईश्वर भी उसकी सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करता है।’’

राम सहायक उनके होते, जो होते हैं आप सहायक

                विश्व-इतिहास ऐसे महापुरूषों के उदाहरणों से भरा है, जिन्हांेने स्वावलम्बन का सहारा लिया। महाकवि तुलसीदास बचपन से ही अनाथ थे। वे दाने-दाने के मुहताज रहते थे। फिर भी अपनी आत्मनिर्भता के सहारे ही स्वतन्त्र लेखन का कार्य कर भारत के लोक कवि कहलाते थे। वहीं विलासी राजाओं का सहारा लेकर केशवचन्द्र ने अपनी ख्याति सीमित कर ली। एक बार अकबर ने भी सूरदास को वैभव का सहारा देना चाहा, तो सूरदास ने इनकार करते हुए कहा था-

मोको कहां सीकारी सों काम।

                ईश्वरचन्द्र विद्यासागर एक अति दीन परिवार की सन्तान थे। लैम्प पोस्ट की रोशनी में पढ़ते थे, किन्तु उन्होंने जो यश अर्जित किया, उसका आधार स्वावलम्बन ही था। अब्राहम लिंकन जूते की सिलाई करते थे लेकिन अपनी आत्मनिर्भरता और अपने आत्मनिश्चय को जगाकर एक दिन वे अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति पद पर जा बैठे। इसी तरह शिवाजी, न्यूटन, अकबर, नेपोलियन, शेरशाह, बंेजामिन, महात्मा गांधी इत्यादि अनगिनत नाम गिनाए जा सकते हैं, जिन्होंने स्वावलम्बन के बल पर व्यापक ख्याति अर्जित की।

                इस प्रकार, स्वावलम्बन ही जीवन है और परावलम्बन मृत्यु। स्वावलम्बन पुण्य है और परावलम्बन पाप। अतः हर माता-पिता को चाहिए कि वे बचपन से ही अपने बच्चों में स्वावलम्बन की भावना भरें। छात्रों को अपने छोटे-छोटे कार्य, जैसे कमरे की सफाई, वस्त्र की धुलाई आदि स्वयं करने की आदत डालनी चाहिए। ऐसे छात्र ही आगे चलकर स्वावलम्बी नागरिक बनते हैं। और इनके सहयोग से एक स्वावलम्बी राष्ट्र का निर्माण होता है।

                राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की तरह हमें भी ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।

यह पापपूर्ण परावलम्बन चूर्ण होकर दूर हो।

फिर स्वावलम्बन का हमें प्रिय पुण्य पाठ पढ़ाइए।

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