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Hindi Essay on “Satsangati” , ”सत्संगति” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

सत्संगति

Satsangati

                सत्संगति का अर्थ है- श्रेष्ठ पुरूषों की संगति। मनुष्य जब अपनों से अधिक बुद्मिान, विद्वान, गुणवान, एवं योग्य व्यक्ति के संपर्क में आता है, तब उसमें स्वयं ही अच्छे गुणों का उदय होता है और उसके दुर्गुण नष्ट हो जाते है। सत्संगति से मनुष्य की कलुपित वासनायें, बुद्वि की मूर्खता और पापाचरण दूर हो जो हैं। जीवन में उसे सुख और शांति प्राप्त होती है। कबीरदास जी ने लिखा है-

                                ’’कबिरा संगति साधु की हरै और कि व्याधि।

                                ओछी संगति नीच की आठों पहर उपाधी।’

                सत्संगति कल्पलता के समान है। इसमें मनुष्यों को सदैव सधुर फल ही प्राप्त होते है। संस्कृत में कहा गया है कि ’’सत्संगतिः कथय कि न करोति पुंसाम्।’’ सत्संगति मनुष्य के लिए क्या नहीं करती अर्थात सब कुछ करती है। साधारण कीड़ा भी पुष्प् की संगति से बडे-बडे देवताओं और महापुरूषों के मस्तक पर चढ़ जाता है।

                सत्संगति भी दो प्रकार से की जाती है -प्रथम-श्रेष्ठ, सज्जन एवं गुणवान् व्यक्तियों की अनुभूत शिक्षाएँ ग्रहण करना, उनके साथ अपना संपर्क रखना आदि। दूसरे प्रकार का सत्संग हमें श्रेष्ठ पुस्तकों के अध्ययन से प्राप्त होता है। परन्तु मनुष्यों में सजीवता रहने के कारण मानवीय सत्संगति का प्रभाव तुरन्त और चिरस्थायी होता है, जबकि पुस्तकों का विलम्ब से और क्षणभंगुर।

                सत्संगति से मनुष्य की ज्ञानवृद्धि होती है। गोस्वामी जी ने लिखा है कि ’’बिन्दु सत्संग विवेक न होई’’ अर्थात बिना सत्संगति के मनुष्य को ज्ञान प्राप्त नहीं होता, इससे मनुष्यों को ऐहिक और पारलौकिक दोनों प्रकार की समृद्धि प्राप्त होती है। ऐहिक समृद्धि से तात्पर्य है कि सत्संगति से मनुष्यों को जीवन में सुख, समृद्धि और परम शांति की प्राप्ति होती है, वह समाज में उच्च स्थान प्राप्त करता है, उसकी कीर्ति संसार में फैलती है। पारलौकिक ज्ञान से हम ब्रह्म साक्षात्कार के लिए प्रयत्नशील होते है। संसार के आवागमन से मुक्त होने के लिए पूर्ण ज्ञान ही एक मात्र उपाय है। यदि हम पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, तो वेदव्यास की भागव्त, श्रीकृष्ण की गीता, तुलसी की रामायण आदि गं्रन्थों को पढ़कर ज्ञान के भण्डार को भर सकते हैं। पुस्तकों का सत्संग स्थान या समय की बाधा प्रस्तुत नहीं करता। आज से हजारों वर्ष पूर्व के विद्धानों के साथ उसी प्रकार का विचार-विमर्श कर सकते हैं, जिस प्रकार आधुनिक विद्धानों के साथ। उनके ग्रंथ रत्नों से हम उनकी संगति का अमूल्य लाभ उठा सकते हैं।

सत्संगति से मनुष्य का समाज में सम्मान होता है। सज्जनों के साथ रहकर दुराचारी मनुष्य भी अपने बुरे कर्म छोड देता है। समाज में उसकी प्रतिष्ठा होने लगती है। गुलाब के पौधे के आस-पास की मिट्टी भी कुछ समय में सुवासित होकर उपने सम्पर्क में आने वाले को सुगन्धित कर देती है। सहस्त्रों निरपराध पशुओं को मौत के घाट उतार देने वाला बधिक का छुरा कुशल शल्य चिकित्सक के हाथों में जाकर अनेक प्राणियों की जीवन रक्षा करने में समर्थ होता है। इसी प्रकार दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति भी सज्जनों के सम्पर्क में आने से दयावान, विनम्र, परोपकारी और ज्ञानवान हो जाता है।

                सत्संगति से धैर्य, साहस और सहानुभूति का संचार होता है। कहावत है- ’’ज्ञान काटे ज्ञान से, मुर्ख काटे रोय।’’ सत्संगति मनुष्य को इतना विवेकपूर्ण बना देती है कि भयानक विपत्ति में भी वह साहस नहीं छोड़ता। सत्संगति उसे हि़म्मत देती है। निराशा में आशा का संचार करती है, घोर अंधकार में प्रकाश का संचार करती है। सत्संगति उसे सुख-दुख में, हर्ष ओर शोक में सदैव समान रखेगी।

                कुसंगति से अनेक हानियाँ होती हैं। क्योंकि दोष और गुण सभी संसर्ग से ही उत्पन्न होते हैं। मनुष्य में जितना दुराचार, पापाचार, दुश्चरित्रता और दुव्र्यसन होते है, सभी कुसंगति की कृपा फलस्वरूप प्राप्त होते हैं। श्रेष्ठ विद्यार्थी को, जो सदैव प्रथम श्रेणी में ही पास होते है, इन आँखों से बिगड़ते देखा है, बर्बात होते देखा है, केवल नीच साथियों के कारण बडे़-बडे़ घराने नष्ट-भ्रष्ट हो गए है। बुद्धिमान व्यक्ति पर भी कुसंगति का प्रभाव अवश्य पडता है, यह ऐसा जादू है, य

ह ऐसा जादू है कि अपना असर दिखाये बिना नहीं रहता। ठीक ही कहा है-             

                                ’’काजर की कोठरी में कैसो हू सयानो जाय,

                                .एक लीक काजर की लागि है पै लागि है।’’

                दुष्ट और दुराचारी व्यक्ति का साथ कभी नहीं करना चाहिए। नीच व्यक्ति की संगति से सदैव उपद्रव होने की आशंका बनी रहती है। नीच की संगति से अच्छे मनुष्य में भी दोष लग जाते है। शराब की दुकान पर खडे़ होकर दूध पीने वाले व्यक्ति को भी सब यही समझते हैं कि शराब पी रहा है। दुष्ट से दूर रहना ही श्रेष्ठकर है।

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