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Hindi Essay on “Sanyukt Rashtra Sangh” , ”संयुक्त राष्ट्रसंघ” Complete Hindi Essay for Class 9, Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

संयुक्त राष्ट्रसंघ

Sanyukt Rashtra Sangh

निबंध नंबर : 01

विश्व के विभिन्न राष्ट्रों का संगठन संयुक्त राष्ट्रसंघ के नाम से पुकारा जाता है। यह वह संस्था है, जिसके मंच पर विश्व के प्राय: सभी राष्ट्रों के प्रतिनिधि युद्ध एंव शांतिकाल की विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर खुलकर विचार-विमर्श करके उसके समाधान खोजने का प्रत्यत्न करते हैं। इस प्रकार के संगठन की  पहली बार कल्पना प्रथम विश्वयुद्ध (सन-1914-20) के दुष्परिणामों को देखकर जागी थी। मुख्य रूप से तब भी इसका यही उद्देश्य था और आज भी यही है कि जब भी विश्व के राष्ट्रों के सामने कोई ऐसी विषम समस्या उपस्थित हो कि युद्ध की नौबत आ जाए, तब संबंद्ध एंव अन्य राष्ट्र मिलकर समस्या का समाधान खोजने का सामूहिक प्रयत्न करें, जिससे उपस्थित संबद्ध राष्ट्रों और विश्व युद्ध का खतरा टल सके। उद्देश्य निश्चय ही महान था और है भी पर जर्मन के हिटलर ने सन 1938-39 मेें द्वितीय विश्व युद्ध की घोषणा करके उस पहले राष्ट्रसंघ की धज्जियां उड़ा दीं। तब एक ओर थे जर्मन-जापान, इटली के तानाशाह तथा दूसरी ओर थे इंज्लैंड, अमेरिका, रूस आदि  मित्र राष्ट्र। इस दूसरे विश्व युद्ध में विपक्ष (जर्मन आदि) को बुरी तरह पराजित होना पड़ा। मित्र राष्ट्रों की जीत हुई। जर्मनी का रूस-अमेरिका में बंटवारा हो गया, यद्यपि आज फिर दोनों जर्मनियों का एकीकरण हो चुका है। इसके बाद युद्ध की विभीषिका से बचने के लिए वर्तमान संयुक्त राष्ट्रसंघ को स्वरूप और आकार दिया गया। वह आज प्रमुख रूप से अमेरिका जैसी शक्ति की शीत युद्ध का अखाड़ा बनकर ही यद्यपि रह गया है, तो भी कई बार वह विश्व युद्ध के खतरे को टालने में समर्थ हो सकता है, इसे एक शुभ लक्षण और बात कहा जा सकता है।

प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर संयुक्त राष्ट्रसंघ सभी प्रकार की समस्याओं के समाधान में सफल क्यों नहीं हो पाता? इसका मुख्य कारण पहले रूस-अमेरिका की शक्ति-सीमा-विस्तार-संबंधी खींचातानी तो रहा ही, चार देशों के पास विशेषाधिकार कर रहना भी है। आज रूस का शक्ति-शिखर बिखर चुका है। इस कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ पर अमेरिका प्रभावी हो रहा है। सामूहिक स्तर पर किसी समस्या का समाधान कभी-कभी नजर भी आने लगता है, तो विशेषाधिकार-संपन्न रूस, अमेरिका, फ्रांस और चीन में से कोई एक अपने निहित स्वार्थों के कारण विशेषाधिकार का प्रयोग कर उसे निरस्त कर देता है। यही कारण है कि आज तक संयुक्त राष्ट्रसंघ के सामने अंतर्राष्ट्रीय स्तर के जितने भी मामले आए हैं, प्राय: सभी वर्षों से लटक रहे हैं और वहां उनका कोई अंतिम समाधान मिल जाएगा, ऐसी कोई आशा या संभावना नहीं है। फिर भी तनाव कम करने में यह संस्था एक सीमा तक सहायक बनती आ रही है, इसको भी एक महत्वपूर्ण कार्य एंव उपलब्धि कहा जा सकता है। कोरिया का मामला, डच, इंडोनेशिया, अरबों-यहूदियों के संघर्ष, भारत-पाक युद्धों आदि के मामलों में युद्ध रुकवाने, कुछ राजनीतिक मामलों के हल में संयुक्त राष्ट्रसंघ के योगदान की उपेक्षा नहीं की जा सकती और प्रभावी बनाने के उपाय करने की निश्चय ही आवश्यकता है।

जहां तक उद्देश्यों और नीतियों का प्रश्न है, संयुक्त राष्ट्रसंघ की बुनियादी घोषित नीतियां निश्चित ही महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार जाति-वर्ण संबंधी भेदभाव दूरकर प्रत्येक मानव की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा की जाएगी। आर्थिक-सामाजिक विकास में सहायक बनकर विश्व के सभी मानवों का जीवन स्तर उन्नत बनाया जाएगा। विश्व के सभी राष्ट्रों में पारस्परिक मैत्री और सदभावना को बढ़ावा दिया जाएगा। सभी प्रकार के झगड़े बातचीत से हल किए जाएंगे। पिछड़े राष्ट्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक रक्षा के उपाय किए जाएंगे, ताकि सभी की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा हो सके। निश्चय ही ये उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं। यदि इन पर दृढ़ता से चला जा सके, तो मानवता का अपार हित होगा। दृढ़ता से चलना तभी संभव हो सकता है, जब समानता का सिद्धांत अपना लिया जाए।

उपरिकथित घोषित नीतियों, उद्देश्यों को पूरा करने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ के कई उपविभाग भी बनाए गए हैं। उनके नाम हैं साधारण सभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक-सामाजिक-परिषद, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, संरक्षण परिषद और यूनेस्को अर्थात संयुक्त राष्ट्र शिक्षा, विज्ञान एंव संस्कृति परिषद। प्राय:सभी राष्ट्रों को इन संस्थाओं का अध्यक्ष बनने, इनमें विश्व-हित के कार्य करने का समान अवसर प्रदान किया जाता है। यदि समय-समय पर बड़े राष्ट्रों, विशेषकर अमेरिका के निहित स्वार्थ आड़े न आंए, एंज्लो-अमेरिका गुट अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर सहज मानवीय भावना में कार्य करें, तो कोई कारण नहीं कि यह संस्था मानवहित-साधन में सफल न हो। इसी प्रकार विशेषाधिकार भी समाप्त होने चाहिए। उसके बिना बहुमत से जो निर्णय हों, उन्हीं को मान्यता मिले। उन्हें लागू करने-करवाने की कुछ सामथ्र्य भी यदि संयुक्त राष्ट्रसंघ के हाथ में आ जाए, तब तो सोने पर सुहागा ही हो जाए।

इस प्रकार विश्व की इस महान और सर्वोच्च संस्था से मानव कई प्रकार की आशांए कर सकता है। यदि अपने निर्धारित उद्देश्यों के निर्वाह में लीग आफ नेशंस की तरह संयुक्त राष्ट्रसंघ भी सफल न हो सका, तो पता नहीं युद्ध के सौदागर मानवता के भविष्य को विनाश के किस अंधे कुंए में फेंक देंगे। सभी जानते हैं कि यह संस्था सभी सदस्यों के सामथ्र्य के अनुसार अंश-दान से चलती है। अब कइयों ने तो वह देना बंद कर दिया है और कइयों ने बहुत कम। ऐसे देशों में सर्वाधिक देने वाले अमेरिका का नाम भी है। सो अर्थाभाव के कारण-सैक्रेटरी जनरल बुतरस गाली की अपील पर भी घनाभाव के कारण यह विश्व संस्था समाप्त होती लगने लगी है। इसे बचाना और इसके द्वारा ईमानदारी से निष्पक्ष रहकर कार्य करना परमावश्यक है ताकि संयुक्त राष्ट्रसंघ बना रहकर अपना घोषित लक्ष्य पा सकने में सफल हो सके।

 

निबंध नंबर : 02

संयुक्त राष्ट्र संघ

Sanyukt Rashtra Sangh

 

प्रस्तावना- विश्व के प्रायः सभी राष्ट्रों के सम्मिलित संघ को संयुक्त राष्ट्र संघ कहा जाता है। इसका प्रमुख उद्देश्य विश्व में होने वाली आंतकित घटनाओं एवं समस्याओं पर विचार कर उनकी समाप्ति का समाधान ढंूढ़ना है।

                                यू0एन0ओ0 की आवश्यकता- प्रथम विश्वयुद्व के उपरान्त अत्यन्त आतंकित भयभीत मानव ने इस प्रकार के युद्वों को हमेशा के लिए समाप्त करने हेतु ‘लीग आॅफ नेशन्स‘ एक संस्था की स्थापना की, किन्तु यह द्वितीय विश्वयुद्व के लिए उतरदायी परिस्थितियों को नियन्त्रित कर सका। अतः द्वितीय विश्वयुद्व के बाद तीसरा युद्व न हो तथा सभी राष्ट्रों के बीच मधुर एवं शान्तिपूर्ण सम्बन्ध रहें, इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतू 24 अक्टूबर, 1995 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गयी।

                                  यू0एन0ओ0 सदस्यों की संख्या- संयुक्त राष्ट्र संघ के पारम्भिक सदस्यों की संख्या 51 थी। जो अब बढ़कर 191 से भी अधिक पंहुच गई है। भारत को भी संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता प्राप्त है, और वह दूसरे कार्यो मंे सक्रिय रूप से भाग लेता है।

                                संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य कार्यालय संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयार्क नगर में स्थित है। इसके छह प्रमुख अंग हैं- महासभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक एवं सामाजिक परिषद्, न्याय परिषद्, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय तथा सचिवालय।

                                यू0एन0ओ0 के कार्य- संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रमुख कार्य शान्ति एवं सुरक्षा बनाये रखना है। संक्षेप में इसके उद्देश्य इस प्रकार हैं-

                                (1) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा व्यवस्था करना।

                                (2) मानव जाति के आधारों का सम्मान करना।

                                (3) पारस्परिक मतभेदों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाना।

                                (4) प्रत्येक राष्ट्र को समान समझना और समान अधिकार देना।

                घोषणा पत्र के अनुच्छेद-2 में संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों का वर्णन है। इसके प्रमुख सिद्धान्त इस प्रकार हैं- (1) किसी देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।

                               (2) पारस्परिक झगड़ों को शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा सुलझाना।

                               (3) आवश्यकता पड़ने पर हर सम्भव सहायता देना।

                               (4) घोषणा पत्र में लिखित उतरदायित्वों का पालन करना।

उपसंहार- संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना जिन पावन उद्देश्यों को लेकर की गई थी, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह उन उद्देश्य में सफल नहीं हो रहा है। इसका मूल कारण यह है कि अब वहां एकमात्र अमेकिा ही सर्वेसर्वा हो गया है, जो अपनी मनमानी कर रहा है। यह तथ्य संघ के भविष्य के लिए उचित नहीं है।     

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