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Hindi Essay on “Prayatan ka Mahatav ” , ” पर्यटन का महत्व” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

पर्यटन का महत्व

Paryatan ka Mahatva

निबंध नंबर : 01

 

 पर्यटन का आनंद –

सैर कर दुनिया की गाफ़िल, ज़िंदगानी फिर कहाँ ?

जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहाँ ?

     जीवन का असली आनंद घुमक्कड़ी में है ; मस्ती और मौज में है | प्रकृति के सौंदर्य का रसपान अपनी आँखों से उसके सामने उसकी गोद में बैठकर ही किया जा सकता है | उसके लिए आवश्यक है – पर्यटन |

     पर्यटन के लाभ – पर्यटन का अर्थ है – घूमना | बस घुमने के लिए घूमना | आनंद-प्राप्ति और जिज्ञासा-पूर्ति के लिए घूमना | ऐसे पर्यटन में सुख ही सुख है | ऐसा पर्यटन दैनंदिन जीवन की भारी-भरकम चिंताओं से दूर होता है | जो व्यक्ति इस दशा में जितनी देर रहता है, उतनी देर तक वह आनंदमय जीवा जीता है |

     पर्यटन का दूसरा लाभ है – देश विदेश की जानकारी | इससे हमारा ज्ञान समृद्ध होता है | पुस्तकीय ज्ञान उतना प्रभावी नहीं होता जितना कि प्रत्यक्ष ज्ञान | पर्यटन से हमें देश-विदेश के खान-पान, रहान-सहन तथा सभ्यता-संस्कृति की जानकारी मिलती है | इससे हमारे मन में बैठ हुए कुछ अंधविश्वाश टूटते हैं | हमें यह विश्वास होता है – विश्व – भर का मानव मूल रूप से एक है | हमारी आपसी दूरियाँ कम होती हैं | मन उदार बनता है | पूरा देश और विश्व अपना-सा प्रतीत होता है | राष्ट्रिय एकता बढ़ाने में पर्यटन का बहुत बड़ा योगदान है |

     पर्यटन : एक उद्दोग – वर्तमान समय में पर्यटन एक उद्दोग का रूप धारण कर चूका है  | हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर आदि पर्वतीय स्थलों की अर्थ-व्यवस्था पर्यटन पर आधारित है | वहाँ वर्षभर विश्व-भर से पर्यटक आते हैं और अपनी कमाई खर्च करते हैं | इससे ये पर्यटक-स्थल फलते-फूलते हैं | वहाँ के लोगों को आजीविका का साधन मिलता है |

     पर्यटन के प्रकार – पर्यटन-स्थल अनेक प्रकार के हैं | कुछ प्रकृतिक सौंदर्य के लिए विख्यात हैं | जैसे-प्रसिद्ध पर्वत-चोटियाँ, समुद्र-तल, वन-उपवन | कुछ पर्यटन-स्थल धर्मित महत्व के हैं | जैसे हरिद्वार, वैष्णो देवी, काबा, कर्बला आदि | कुछ पर्यटन-स्थल एतेहासिक महत्व के हैं | जैसे लाल किला, ताजमहल आदि | कुछ पर्यटन-स्थल वज्ञानिक, सांस्कृतिक या अन्य महत्व रखते हैं | इनमें से प्राकृतिक सौंदर्य तथा धार्मिक महत्व के पर्यटन-स्थलों पर सर्वाधिक भीड़ रहती है |

 

निबंध नंबर : 02

देशाटन या पर्यटन

Deshatan ya Paryatan

                देशाटन मानव की स्वाभाविक प्रवृति है। देश-विदेश भ्रमण की प्रवृति मानव जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। आधुनिक युग में देशाटन की उपयोगिता अन्य कई दृष्टियों से भी स्थापित हो चुकी है। देशाटन का उद्देश्य मात्र मन की शांति ही नहीं है बल्कि आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षिणक लाभ के उद्देश्य से भी लोग देश-देशान्तरों की यात्रा करते हैं। यही कारण है कि आधुनिक युग में व्यक्तिगत रूप के अतिरिक्त राजकीय अथवा राष्ट्रीय प्रतिनिधि के रूप में भी यात्रा के अवसर प्राप्त होते हैं। व्यावसायिक-वाणिज्यिक सम्पर्क स्थापना के लिए भी यात्राएं की जाती हैं। राजनीतिक लाभ हेतु विभिन्न राजनीतिज्ञ अथवा राष्ट्रीय प्रतिनिधि के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय यात्राएं की जाती हैं। विभिन्न राष्ट्रों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के उद्देश्य से भी यात्राएं आयोजित की जाती हैं। तात्पर्य यह है कि आधुनिग युग में देशाटन बहुउद्देशीय बन गया है। इसके अनेक प्रकार के नाम भी हैं।

                विज्ञान ने देशाटन के कार्य को और भी अधिक सुगम और आनन्दमयी बना दिया है। देशाटन के पूर्व यात्री को अनेक उपादानों, उपकरणों एवं साधनों की व्यवस्था करनी पड़ती है। जिस स्थान की यात्रा करनी होती है उसकी भौगोलिक स्थिति एवं प्रकृति की जानकारी के लिए सम्बन्धित मानचित्र, विवरण-पुस्तिका आदि लेनी पडती है। पर्यटक के लिए यह भी आवश्यक है कि वह अपने दैनिक अनुभव एंव जानकारियों को लिपिबद्ध करता रहे। अतः पर्यटक को एक डायरी भी रखनी पड़ती है। पर्यटन हमारे मनोरंजन का एक महत्वपूर्ण साधन है। मनुष्य एक स्थान पर रहते-रहते थकान का अनुभव करने लगता है। नए क्षेत्रों के भ्रमण से उसकी यह थकान और सुस्ती दूर हो सकती है। देशाटन से हम दुनिया के देशों की वास्तविक स्थिति का पता लगा पाते हैं। यह ज्ञान वृद्धि का एक सशक्त और जीवंत साधन है। स्वास्थय की दृष्टि से भी देशाटन का महत्व कम नहीं है। हजारों व्यक्ति भारत मंे ही प्रतिदिन नैनीताल, अल्मोड़ा, मसूरी, दार्जिलिंग, पचमढ़ी इत्यादि पर्वतीय क्षेत्रों में जाते-आते हैं। ऐसा करने से उन्हें स्वास्थय-लाभ भी होता है। देशाटन शांत एवं क्लांत शरीर तथा मन को पुनः ताजगी प्रदान करता है। व्यक्तित्व के विकास एवं चरित्र-निर्माण में भी देशाटन पर्याप्त सहायक सिद्ध हुआ है। राष्ट्रीय ऐक्य की दृढ़ता के लिए देशाटन या पर्यटन या भ्रमण एक अनिवार्य शर्त है। एक-से-एक विद्वान, गुणवान तथा अनुभवी व्यक्तियों के दर्शन और संपर्क से मनुष्य मिथ्या दम्भ जैसी दुर्भावनाओं से मुक्ति पाता है तथा उसके चरित्र में विनयशीलता का प्रवेश होता है। उसमें महत्वाकांक्षाएं जागती हैं और वह अधिकाधिक प्रगति की ओर प्ररित होता है। प्रकृति दर्शन से उसमें आध्यात्मिक भावनाएं विकसित होती हैं। ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा से उसके राष्ट्रीय गौरव की भावना बलवती होती है। सर्वांगीण व्यक्तित्व के विकास में देशाटन या पर्यटन की विशेष भूमिका है। कला-कौशल, ज्ञान-विज्ञान, उद्योग-व्यवसाय की पूर्णता अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों अर्थात देशाटन पर ही निर्भर करती है।

                भारत में देशाटन की परम्परा अति प्राचीन है। वैदिक ऋषि यद्यपि एकान्त चिंतन, एकान्तवास तथा जीवन को प्रमुखता देते थे तथापि देश भ्रमण की प्रथा उनमें व्याप्त थी। रामायण-महाभारत कालीन ऋषि देशाटन करते थे। नारद, अगस्त्य, विश्वामित्र, दुर्वासा, कण्व आदि के तीर्थाटन एवं देशाटन की चर्चा अनेक पुस्तकों में आई है। महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर, शंकराचार्य, कालिदास, भवभूति, बाणभट्ट, तुलसी, सूर आदि के तीर्थाटन-देशाटन की कथाएं ंसर्वविदित हैं। साधनों के अभाव में सामान्य गृहस्थ ने इस दिशा में कभी रूचि नहीं ली। आज भी जब सारे साधन उपलब्ध हैं भारत के करोड़ों नागरिक अर्थाभाववश देश भ्रमण का विचार भी नहीं करते। अशिक्षा, निर्धनता, रूढ़िवादिता ने देशवासियों को सदैव देशाटन से विमुख बनाए रखा। स्वतंत्र भारत में इस प्रवृति को प्रोत्साहन देने के लिए पर्यटन मंत्रालय को अस्तित्व में लाया गया। इतना ही नहीं सरकार ने पर्यटन को उद्योग का दर्जा दे दिया है।

                राष्ट्रीयता की भावना को सुदृढ़ बनाने के लिए, अपने राष्ट्र के स्वरूप को पहचानने के लिए हमें आवश्यक कदम उठाने ही पड़ेगे। सरकार की ओर से इस कार्य में सूविधाएं दी जा रही हैं। लेकिन निर्धन नागरिकों को ये सुविधाएं प्रोत्साहित कर पाने मे ंआज भी सक्षम नहीं हो  पाई हैं।

                पर्यटन से राष्ट्रीयता की भावना मजबूत होती है। यात्रा में विभिन्न प्रकार की विपरीत परिस्थितियां आती हैं, जिन्हें अपने विवके से सुलझाना पड़ता है। इससे आत्मविश्वास जागता है। पर्यटन से जीवन में उदारता आती है। संकीर्ण मनोवृति को दूर करने में पर्यटन से बढ़कर दूसरा साधन हो ही नहीं सकता। साधु-संत जो सामान्य मानव से ऊपर होते हैं, उसका मुख्य कारण उनकी घुमक्कड़ी ही है। पर्यटन के इसी विशिष्ट गुण को देखते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है-

                                                मुद मंगल मय संत समाजू।

                                                जिमि जग जंगप तीरथ राजू।।

                मनोरंजन और ज्ञानवर्द्धन की दृष्टि से देशाटन या पर्यटन हमारी एक मनोवैज्ञानिक मांग भी है।    

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commentscomments

  1. gaurav says:

    Paryatan ka Mahatav with 10 Paragraph

  2. Mahi says:

    not bad.But it should be more lenthi.

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