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Hindi Essay on “Pradushan Ki Samasya , प्रदूषण की समस्या “Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

निबंध नंबर : 01 

प्रदूषण की समस्या 

Pradushan Ki Samasya

मनुष्य के उत्तम स्वास्थ्य के लिए वातावरण का शुद्ध होना परम आवश्यक होता है। जब से व्यक्ति ने प्रकृति पर विजय पाने का अभियान शुरु किया है , तभी से मानव प्रकृति के प्राकृतिक सुखों से हाथ धो रहा है। मानव ने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है , जिससे अस्वास्थ्यकारी परिस्थितियाँ जन्म ले रही हैं। पर्यावरण में निहित एक या अधिक तत्वों की मात्रा अपने निश्चित अनुपात से बढ़ने लगती हैं , तो परिवर्तन होना आरंभ हो जाता है। पर्यावरण में होने वाले इस घातक परिवर्तन को ही प्रदूषण की संज्ञा दी जाती है। यद्यपि प्रदूषण के विभिन्न रुप हो सकते हैं , तथापि इनमें वायु – प्रदूषण , जल – प्रदूषण , भूमि प्रदूषण तथा ध्वनि – प्रदूषण मुख्य हैं।

‘ वायु – प्रदूषण ‘ का सबसे बड़ा कारण वाहनों की बढ़ती हुई संख्या है। वाहनों से उत्सर्जित हानिकारक गैसें वायु में कार्बन मोनोऑक्साइड , कार्बन डाईऑक्साइड , नाइट्रोजन डाईऑक्साइड और मीथेन आदि की मात्रा ब<+k रही हैं। लकड़ी , कोयला , खनिज तेल , कार्बनिक पदार्थों के ज्वलन के कारण भी वायुमंडल दूषित होता है। औद्योगिक संस्थानों से उत्सर्जित सल्फर डाई – ऑक्साइड और हाईड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें प्राणियों तथा अन्य पदार्थों को काफी हानि पहुँचाती हैं। इन गैसों से प्रदूषित वायु में साँस लेने से व्यक्ति का स्वास्थ्य खराब होता ही है , साथ ही लोगों का जीवन – स्तर भी प्रभावित होता है।

‘ जल प्रदूषण ‘ का सबसे बड़ा कारण साफ जल में कारखानों तथा अन्य तरीकों से अपशिष्ट पदार्थों को मिलाने से होता है। जब औद्योगिक अनुपयोगी वस्तुएँ जल में मिला दी जाती हैं , तो वह जल पीने योग्य नहीं रहता है। मानव द्वारा उपयोग में लाया गया जल अपशिष्ट पदार्थों ; जैसे – मल – मूत्र , साबुन आदि गंदगी से युक्त होता है। इस दूषित जल को नालों के द्वारा नदियों में बहा दिया जाता है। ऐसे अनेकों नाले नदियों में भारी मात्रा में प्रदूषण का स्तर बढ़ा रहे हैं। ऐसा जल पीने योग्य नहीं रहता और इसे यदि पी लिया जाए , तो स्वास्थ्य में विपरीत असर पड़ता है।

मनुष्य के विकास के साथ ही उसकी आबादी भी निरंतर बढ़ती जा रही है। बढ़ती आबादी की खाद्य संबंधी आपूर्ति के लिए फसल की पैदावार बढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। उसके लिए मिट्टी की उर्वकता शक्ति बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। परिणामस्वरूप मिट्टी में रासायनिक खाद डाली जाती है , इसे ही ‘ भूमि प्रदूषण ‘ कहते हैं। इस खाद ने भूमि की उर्वरकता को तो बढ़ाया परन्तु इससे भूमि में विषैले पदार्थों का समावेश होने लगा है। ये विषैले पदार्थ फल और सब्जियों के माध्यम से मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर उसके स्वास्थ्य पर विपरीत असर डाल रहे हैं। मनुष्य ने जबसे वनों को काटना प्रारंभ किया है , तब से मृदा का कटाव भी हो रहा है।

‘ ध्वनि प्रदूषण ‘ बड़े – बड़े नगरों में गंभीर समस्या बनकर सामने आ रहा है। अनेक प्रकार के वाहन , लाउडस्पीकर और औद्योगिक संस्थानों की मशीनों के शोर ने ध्वनि प्रदूषण को जन्म दिया है। इससे लोगों में बधिरता , सरदर्द आदि बीमारियाँ पाई जाती हैं। प्रदूषण को रोकने के लिए वायुमंडल को साफ – सुथरा रखना परमावश्यक है। इस ओर जनता को जागरुक किया जाना चाहिए। बस्ती व नगर के समस्त वर्जित पदार्थों के निष्कासन के लिए सुदूर स्थान पर समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए। जो औद्योगिक प्रतिष्ठान शहरों तथा घनी आबादी के बीच में हैं , उन्हें नगरों से दूर स्थानांतरित करने का पूरा प्रबन्ध करना चाहिए। घरों से निकलने वाले दूषित जल को साफ करने के लिए बड़े – बड़े प्लाट लगाने चाहिए। सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना चाहिए। वन संरक्षण तथा वृक्षारोपण को सर्वाधिक प्राथमिकता देना चाहिए। इस प्रकार प्रदूषण युक्त वातावरण का निर्माण किया जा सकेगा।

 

निबंध नंबर : 02 

 

प्रदूषण की समस्या 

Pradushan Ki Samasya

समस्या दर समस्या! समस्याओं के जाल से मानव का बचाव किसी तरह संभव नहीं। प्रदूषण एक नई और नितांत आधुनिक यानी प्रगतिशीलता और यांत्रिक औद्योगिक संस्कृति की दी हुई समस्या, जिसका अर्थ है कि उस वातावरण और वायुमंडल का दूषित या जहरीला हो जाना, जिसमें हम रहते और सांस लेते हैं। आज न केवल भारत बल्कि सारे सभ्य संसार को दिन-प्रतिदिन विकट होती जा रही इस समस्या से पीडि़त हो जूझना पड़ रहा है। वैज्ञानिकों का कथन है कि यदि तत्काल फैल रहे इस प्रदूषण के अजगर पर काबू न पाया गया, तो अगले कुछ दशकों में यह धरती मनुष्यों के तो क्या किसी भी प्राणी के रहने, यहां तक की वनस्पतियां तक उगाने के योज्य नहीं रह जाएगी। वनस्पतियां भी दूषित-विकृत होकर अस्तित्व खो बैठेंगी। हमारे जल के स्त्रोतों में विष घुल जाएगा। जड़ किंतु सुंदर-सुंदर प्राचीन एंव नवीन भवन काले पडक़र धीरे-धीरे अपनी ही कब्रगाह बन जाएंगे। मतलब यह कि आज संसार में जो कुछ भी सुंदर, स्वस्थ और आकर्षक है वह सब कुछ दूषित हो जाएगा। जब प्राणवायु में ही विष के सांस लेने पड़ेंगे, तो फिर कोई प्राणी या अन्य वस्तु बची ही कैसे रह सकती है?

आखिर आज हमारा पार्यवरण इतना दूषित, विकृत और प्राण-लेवा क्यों हो जा रहा है? विचार करने पर कई कारण सामने आते हैं। उन कारणों को एक-दो शब्दों में औद्योगिकरण की निरंतर बढ़ती प्रवृति और विभिन्न प्रकार के आणविक परीक्षणों का दुखद परिणाम कहा जा सकता है। बड़े-बड़े, कल-कारखाने, फैक्टरियां, उनकी धुआं उगलती हुई बड़ी-बड़ी चिमनियां वायुमंडल में से प्राण-पोषक तत्वों को नष्ट कर विनाशक और जहरीले तत्व भरती जा रही है। कल-कारखानों में प्रयुक्त होने वाला पानी अनेक प्रकार के जहरीले रसायनों से भरा रहकर, बचा-खुचा नदियों में मिलकर प्राकृतिक जल तत्वों और पोषक खनिजों को दूषित कर रहा है। इनके अतिरिक्त चारों ओर दौड़ती बसें, मोटरें, कारें, ट्रक तथा पेट्रोलियम पदार्थों से चलने वाले वायुयान आदि अन्य वाहन जो धुआं और जहरीली गैसें उगलते हैं, उनसे आज की सभ्यता का बच पाना अत्यंत कठिन कार्य है। इनके अभाव में आज के जीवन के चलने या जीवित रह पाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी प्रकार आज जो तरह-तरह के ईंधन काम में लाए जा रहे हैं, आणविक शस्त्रास्त्रों के भूमिगत, समुद्रगत या थलगत परीक्षणों का लंबा दौर चल रहा है, मारक गैसें बनाई या परीक्षित की जा रही हैं-इन सभी का परिणाम है भयानक प्रदूषण, जिसने सारी सभ्यता को आतंकित कर रखा है। आज जो अनेक प्रकार के नए-नए अभूतपूर्व रोग सामने आ रहे हैं, वे प्रदूषण का ही परिणाम हैं, चिकित्सा-वैज्ञानिकों की यह स्पष्ट धारणा है।

प्रदूषण के अन्य कई कारण भी गिनाए जाते हैं। जनसंख्या की अबाध वृद्धि, उसके द्वारा धरती का चप्पा-चप्पा घेरा जाना, खेतों, वनों, पेड़ों का निरंतर कटाव, हरित-पट्टियों का बढ़ रहा अभाव भी प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण है। पर आज लालचवश उन्हें काट-बेचकर प्रकृति का वह संतुलन भी बिगाड़ा जा रहा है कि जो मानव-जीवन का आधारभूत अनिवार्य तत्व है। इसी प्रकार कई प्रकार के शोर-शराबे भी मिलकर पर्यावरण को दूषित कर दिया करते हैं। आज का बहरापन इस शोर की ही देन है और भी कई प्रकार के तत्व हैं, जिनके कारण प्रदूषण की समस्या भयानक से भयानकतर होती जा रही है। सारा सभ्य संसार चिंतित हो रहा है, फिर भी मुक्ति का उपाय कर पाने में समर्थ नहीं हो पा रहा।

अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर इस मारक रोग से बचा कैसे जाए? उत्तर है कि इस समरूा से चिंतित वैज्ञानिक कुछ इस प्रकार के उपकरण बनाने में सफल हो गए हैं कि कल-कारखानों, फैक्टिरयों आदि में उनका प्रयोग करने से प्रदूषण का खतरा एक सीमा तक दूर हो सकता है। दूसरे इस प्रकार की योजनांए भी चल रही हैं कि कल-कारखानों से निकलने वाले दूषित जल-प्रवार को नदियों में न मिला भूगर्भ में डाला जाए। इसी प्रकार कल-कारखानों से निकलने वाले मलबे को भी जलाने या अन्य उपयों से नष्ट कर डालने की योजना चल रही है। यह भी विचार है कि धुआं उगलने वाले कल-कारखाने बस्तियों से दूर बंजरों में लगाए जांए। उनकी चिमनियां इतनी ऊंची हों कि धुआं नीचे आने ही न पाए। प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए वन-वृक्षों का कटान निषिद्ध कर नए वन-वृक्ष और हरित पट्टियां उगाई जांए। इसी प्रकार कुछ रासायनिक उपयों पर भी शोध चल रहा है। सभी का एक साल प्रयोग ही कुछ बचाव कर सकता है।

जो और जैसे भी संभव हो सके, प्रदूषण की विकट समस्या पर शीघ्र ही काबू पाना परम आवश्यक है। अब भी अगर देर की गई, तो हम अपनी विकसित और विकासशील सभ्यता-संस्कृति को समूचा नहीं तो आंशिक विनाश से नहीं बचा पाएंगे। उसे अस्वस्थ भी कर बैठेंगे। अस्वस्थ का धीरे-धीरे नाश हो ही जाया करता है। अत: सावधानी और तत्काल उपाय करना प्राथमिक कर्तव्य है। जनता और सरकार प्रत्येक स्तर पर इस ओर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए।

 

निबंध नंबर : 03

प्रदूषण

Pradushan

समय और स्थान के साथ मनुष्य के रहन-सहन व विचारधारा में निरंतर परिवर्तन होते रहे हैं। आज का मनुष्य अत्यंत प्रगतिवादी विचारधारा का है। यह कम समय में अधिक से अधिक प्राप्त करना चाहता है। अपनी कल्पनाओं की ऊँची उड़ान को वह सार्थक रूप देना चाहता है। विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र मंे असीम सफलताओं ने तो उसकी इस उड़ान में और भी अधिक तेजी ला दी है। इंग्लैड से आरंभ हुइ्र औद्योगिक क्रांति धीरे-धीरे पूरे विश्व में फैल गई और विभिन्न देश स्वंय को विकसित कहलाने की होड़ में अपने यहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण की अनदेखी कर बैठे।

मानव एक और जहाँ सफलता के नए-नए आयाम विकसित कर रहा है वहीं दूसरी ओर उसकी यह सफलता उसके लिए नई-नई मुसीबतें भी खड़ी कर रही हैं। हरित क्रांति, औद्योगिक विकास, यातायात के संसाधनों का विकास तथा शहरों की बढ़ती हुई जनसंख्या सभ्ज्ञी मिलकर वातावरण को प्रतिपल प्रदुषित कर रहे हैं। धरती का प्रत्येक कोना इस प्रदूषण से प्रभावित हो रहा है।

बड़ी-बड़ी मिलों व कारखानों से निकले दूषित पदार्थ जल के साथ मिलकर नदियों को प्रदुषित कर रहे हैं। ये पीने के पानी को प्रदुषित करते हैं। कहीं-कहीं पर यह प्रदूषण इतना अधिक हो गया है कि वहाँ का जनजीवन ही खतरे में पड़ चुका है। इन कारखानों से निकलने वाला धुआँ अनेक जहरीली गैसों व पदार्थों से युक्त होता है जिससे वायुमंडल की वायु निरंतर प्रदूषित हो रही है।

शहरों तथा महानगरों मे यातायात के साधनों में भी निरंतर वृद्धि हो रही है। इससे निकलने वाला धुआँ वायुमंडल की वायु से मिलकर प्रदुषण फैलाता है जिससे साँस लेना मुश्किल होता जा रहा है। तनाव, बैचेनी, ह्दय तथा फेफड़ों की बढ़ती हुई बीमारियाँ यह सब इसी बढ़ते हुए प्रदुषण का परिणाम हैं। महानगरों तथा शहरों में प्रदुषण का एक अन्य रूप ध्वनि-प्रदुषण भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। यह प्रदुषण भी हमारे लिए अत्यंत खतरनाक है।

म्हानगरों व अन्य शहरों का निरंतर विस्तार व तेजी से बढ़ती जनसंख्या के चलते बड़ी तेजी से वृक्षों का कटाव होता जा रहा है जिससे वातावरण का सतुंलन खतरे में पड़ गया है। ऋतुचक्र निरंतर प्रभावित हो रहा है। बाढ़ और सूखे की स्थिति भी वृक्षों के कटाव से प्रत्यक्ष रूप मंे प्रभावित होती है। पेड़ काटने के कारण वातावरण मंे आक्सीजन की मात्रा निरंतर कम हो रही है। इसके अतिरिक्त अधिक से अधिक अन्न उत्पादन हेतू रासायनिक खादों का बढ़ता प्रयोग पृथ्वी की उर्वरा शक्ति को प्रभावित कर रहा है। रासायनिक खादों तथा कीटनाशक दवाओं के अत्यधिक प्रयोग के कारण पृथ्वी अपनी प्राकृतिक शक्ति निरंतर खोती जा रही है।

अतः तेजी से फैलते प्रदुषण को रोकने के लिए उचित उपाय करना अति आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं जब हमें साँस लेने के लिए भी सोचना पड़ेगा। प्रदुषण को रोकने के उपायों के साथ ही यह भी आवश्यक है कि हरे पेड़ों को नष्ट न किया जाए तथा अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाए जिससे कि आने वाली पीढ़ी को साँस लेने के लिए शुद्ध वायु मिल सके तथा हमारा जीवन भी भली-भाँति व्यतीत हो जाए। इसके अतिरिक्त जल और ध्वनि प्रदुषण से निबटने के भी त्वरित और सार्थक प्रयास करने होंगे।

निबंध नंबर : 04

प्रदूषण की समस्याः कारण और निदान

Pradushan ki Samasya : Karan aur Nidan

अथवा

नगरों में बढ़ता प्रदूषण

 

                जीवन और पर्यावरण का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। समस्त जीवनधारियों का जीवन उनके पर्यावरण की ही उपज होता है। अतः हमारे तन-मन की रचना, शक्ति, सामथ्र्य और विशेषताएँ उस संपूर्ण पर्यावरण से ही नियंत्रित होती हैं, उसी में वे पनपती हैं और विकास पाती हैं। वस्तुतः जीवन और पर्यावरण एक-दूसरे से इतने सम्बद्ध हैं कि दोनों का सहअस्तित्व बहुत आवश्यक है।

                पर्यावरण हमारा रक्षा कवच है जो प्रकृति से हमें विरासत में मिला हैं। यह हम सबका पालनहार जीवनधार है। पर्यावरण मूलतः प्रकृति की देन है। यह भूमि, वन-पर्वतों, नदी-निर्झरों, मरूस्थली मैदानों, घास के जंगलों, रंग-बिरंगे पशु-पक्षियों, स्वच्छ जल से भरी लीलहाती झीलों और सरोवरों से भरी है। इस पर बहती शीतल मंद वायु तथा उमड़ते और अमृतधार बरसते बादल-ये सभी धरती पर बसने वाले मनुष्यों के विकास और सुख-समृद्धि के लिए संतुलित पर्यावरण का निर्माण करते हैं किन्तु पर्यावरण का यह प्राकृतिक संतुलन बडी़ त्ेजी से बिगड़ता जा रहा है। आश्चर्य होता है कि मनुष्य धरती के इन स्रोतों का कितना अंधाधुंध दोहन करता जा रहा है, वह इसके वरदानों का इस प्रकार अविवेकपूर्ण दुरूपयोग कर रहा है कि सारा प्रकृति-तंत्र गड़बड़ा गया है। अब वह दिन दूर नहीं लगता जब धरती पर हजारों शताब्दियों पुराना हिमयुग लौट आए अथवा धु्रवों पर जीम बर्फ की मोटी पर्त पिघल जाने से समुद्र की प्रलयकारी लहरें नगरों, वन-पर्वतों और जीव-जन्तुओं को निगल जाएँ।

                निश्चय ही पर्यावरण को विकृत और दूषित करने वाली समस्त विपदाएँ हमारी अपनी ही लाई हैं। हम स्वयं ही प्रकृति का संतुलन बिगाड़ रहे हैं। इसी असंतुलन से भूमि, वायु, जल और ध्वनि के प्रदूषण उत्पन्न होते हैं। पर्यावरण प्रदूषण से फेफडों के रोग ह्रदय और पेट की बीमारियाँ, देखने और सुनने की क्षमता में कमी तथा मानसिक तनाव आदि बीमारियाँ हो रही हैं।

                आज विश्व की जनसंख्या 5 अरब के आस-पास है। 1947 में जब हम स्वाधीन हुए थे तो हमारी आबादी 33 करोड़ थी। अब यह बढ़कर लगभग एक अरब को पार कर गई है। इस आबादी की अपनी भोजन, वस्त्र और आवास की समस्याएँ हैं जिनकी पूर्ति के लिए धरती के संचित संसाधनों को अंधाधुंध बेरहमी से निचोड़ा जा रहा है। बडे़ पैमाने पर वन-जंगल काटे जा रहे हैं। खेती करने, घर बनाने, कल-कारखाने लगाने, सड़कें और रेल की पटरियँ बिछाने के लिए भूमि चाहिए। सिंचाई और बिजली की आपूर्ति करने के लिए नदियों और झरनों के स्वाभाविक प्रवाहों को मोड़कर/बदलकर और रोककर बडे़-बडे़ बाँध बनाए जाते हैं जिससे जंगल जल मग्न होते हैं। इमारती लकडी़ और कच्चे माल के लिए गत पचास वर्षो में वनों की कटाई इतनी तेजी से हुई कि जंगलों और पशु-पक्षियों का सफाया सा हो गया। दूसरी ओर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशंक दवाइयों के छिड़काव से भूमि को दूषित और विषैली बना दिया गया जिसके परिणामस्वरूप स्वस्छ, शुद्ध अनाज और फल-सब्जियाँ दुर्लभ हो गई।

                वैज्ञानिक आविष्कारों और बढ़ते हुए औद्योगीकरण के फलस्वरूप प्राणवायु सर्वाधिक दूषित और विषैली हो चली है। बेशुमार धुँआ उगलते कल-कारखाने, सड़कों पर पैट्रोल और डीजल का विशाल धुँआ सारे पर्यावरण को रूग्ण , विषैला और निर्जीव बना रहा है। कल -कारखानों से निकलने वाले कचरे के ढेर नदी-नालों और जलाशयों के निर्मल जल को प्रदूषित और जहरीला बना रहे हैं। कचरे के बचे-खुचे ढेर से खुली भूमि पर सड़ते हुए जहरीले रसायनों और उनसे निकलने वाली विषैली गैसों हवा, पानी और मिट्ट प्रदूषित हो रही है। अनवरत दौड़ती हुई बसों, रेलगाड़ियों, माटरकारों और स्कूटरों का निरंतर बढ़ता उमड़ता हुआ भारी शोर कल-कारखानों के शोर को दुगुना करता हुआ हमें धीरे-धीरे बधिर बनाने पर तुला हुआ है। यदि इसी गति से हमारे पर्यावरण की स्थितिबंद से बदतर होती गई तो मानव जीवन की समस्त आशाप्रद संभावनाएँ विनष्ट हो जाएँगी। अतएव आवश्यक है कि कल-कारखानों की चिमनियों को न केवल ऊँचा उठाया जाए, बल्कि उसकी गंदगी को रोकने का प्रयास किया जाए। यतायात के साधनों से भी धुआँ कम-से-कम निकले, विषैले पदार्थ और कूडा़-कचरा नदियों तथा जलाशयों में प्रवाहित न किया जाए। अधिकाधिक वृक्ष लगाए जाएँ। हमारा पर्यावरण और उसके संरक्षण का प्रश्न ही हमारे लिए महत्वपूण है।

निष्कर्ष रूप् में निम्नलिखित उपायों से प्रदूषण को समाप्त किया जा सकता हैं:

  1. अपने आस-पास अधिक से अधिक वृक्ष लगाएँ और उनका संरक्षण करें। 2. वृक्षों का काटना तुरंत रोका जाए। 3. आस-पास के वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया जाए। गंदगी दूर करने के सभी उपाय बरते जाएँ। 4. नदियों-नालों के जल में गंदगी न मिलाने दी जाए। 5. वाहनों को प्रदूषण मुक्त रखा जाए। धुआँरहित ईंधनों का ही प्रयोग किया जाए। 6. कल-कारखानों को आबादी से दूर स्थापित किया जाए। धुएँ पर रोक लगाई जाए। 7. ध्वनि-प्रदूषण पर नियत्रण के सभी आवश्यक उपाय किए जाएँ।

 

निबंध नंबर : 05

पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या

Paryavaran – Pradushan ki Samasya

                पर्यावरण दो शब्दों के मेल से बना है- परि और आवरण। ’परि’ एक उपसर्ग है जिसका अर्थ है चारों ओर, और आवरण का अर्थ है ढक्कन या आच्छादन। इस प्रकार पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है चारो ओर का ढक्कन आच्छादन। हमारे चारो ओर वायु, जल और मिट्टी का आच्छादन या आवरण है। ये ही सजीवों के आधार-तत्त्व हैं। जब मिट्टी, जल और वायु हमारे लिए हितकर के बदले अहितकर हो जाएं तो इसे ही पर्यावरण-प्रदुषण कहा जाता है। दूसरे शब्दों में – प्राकृतिक संसाधनों का अनुपयुक्त को जाना ही प्रदुषण कहलाता है

                पर्यावरण के प्रदूषण में आज के विज्ञान की निरी भौतिकवादी भूमिका मुख्य रूप से जिम्मेवार है। मनुष्य अपने ऐशो-आराम के लिए विज्ञान के माध्यम से प्रकृति का दोहन कर रहा है। मनुष्य को अब प्रकृति कह गोद में बसे गांव की अपेक्षा कृत्रिमता में डूबे शहर अच्छे लग रहे हैं। अब शरीर पर हैंडलूम के वस्त्र की अपेक्षा बड़े-बड़े मिलों के सिंथेटिक कपड़े अच्छे लग रहे हैं। खेतों में प्राकृतिक खादों के बदले आधुनिक रासायनिक खादों का प्रयोग हो रहा है। परमाणु हथियारों से युक्त राष्ट्र दुनिया के सिर चढ़कर बोल रहे हैं। ये सभी उपलब्धियां जहां एक ओर हमारे वैज्ञानिक उन्नति के मापदण्ड माने जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ये पर्यावरण को प्रदूषित कर सम्पूर्ण मानव जाति के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिहृ लगाते जा रहे हैं। ओजोन-परत का छिद्रयुक्त हो जाना इसका ज्वलन्त उदाहरण है। इस भयावह स्थिति के लिए मनुष्य स्वयं ही उत्तरदायी है।

                प्रदूषण मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं- 1 भूमि-प्रदूषण, 2 जल-प्रदूषण, 3 वायु-प्रदूषण, 4 ध्वनि-प्रदूषण। उपज बढ़ाने के लिए फसलों पर कीटनाशक दवाइयों के अत्यधिक छिड़काव से मिट्टी की स्वाभाविक उर्वरा शक्ति क्षीण होती जा रही है। इसे ही भूमि-प्रदूषण कहा जाता है। इसके बचाव के लिए प्राकृतिक एवं रासायनिक खादों के प्रयोग में संतुलन स्थापित करना होगा।

                कहा गया है कि जल ही जीवन है। लेकिन आज बड़े-बड़े शहरों के नालों का पानी एवं कल-कारखानों से निकले कचरे और विषैले रासायनिक द्रवों को सीधे नदियों एवं झीलों में प्रवाहित कर देने से इनका जल प्रदूषित हो गया है। गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियां भी आज इस प्रदूषण से बच नहीं पाई हैं। प्रदूषित जल के सेवन से जल-जनित रोग जैसे-पीलिया, मलेरिया, टायफाॅइड, हैजा आदि फैलते हैं।

                वायु के बिना एक क्षण भी जीवित रहना प्राणियों के लिए नामुमकिन है। आज यह प्राणतत्त्व भी दूषित हो चला है। कारखानों की बड़ी-बड़ी चिमनियों, मोटर-गाड़ियों, वायुयानों एवं रेल के इंजनों से निःसृत धूल-धुआं इस प्रदूषण के कारण हैं। बड़े-बड़े महानगर इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जहां की सड़कों पर चलने से पहले आॅक्सीजन का मास्क लेना पड़ता है। प्रदूषित वायु में सांस लेने से फेफड़े एवं गले से सम्बन्धित कई प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं।

                ध्वनि-प्रदूषण भी एक प्रकार का वायु-प्रदूषण ही है, जो रेडियो, टेलिविजन, मोटरों के हाॅर्न एवं हवाई जहाजों के शोर से उत्पन्न होता है। इससे पागलपन, बधिरता, चिड़चिड़ापन आदि रोग उत्पन्न होते हैं।

                पर्यावरण-प्रदूषण पर काबू पाने के लिए विकसित एवं विकासशील राष्ट्रों को आणविक विस्फोटों एवं रासायनिक अस्त्रों के खतरनाक प्रयोगों पर प्रतिबन्ध लगाने होंगे। कल-कारखानों एवं शहरों के गन्दे जल को परिशोधन-यंत्र से शुद्ध कर नदियों में गिराना होगा। हरे वनों की कटाई पर अविलम्ब कानूनी रोक लगानी होगी। क्योंकि पृथ्वी पर सिर्फ हरियाली बढ़ाकर पर्यावरण के दो तिहाई प्रदूषण पर काबू पाया जा सकता है। मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है-

                                यावद्र भूमण्डलं अत्ते सशैलवनकाननम।

                                तवद तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्र-पौत्रिकी।।

                ’’अर्थात जब तक पृथ्वी हरे-भरे वनो एवं पहाड़ों से युक्त रहेगी, मानव-सन्तान का पालन-पोषण होता रहेगा।’’

                सारांशतः प्रकृति की ओर मुड़कर और मनुष्यता की ओर बढ़कर वर्तमान प्रदूषण पर काबु पाया जा सकता है। अतः आज सबसे बड़ी आवश्यकता है कि पर्यावरण-प्रदूषण के कुप्रभावों से जन-जन को अवगत कराया जाए और साथ ही बचाव के उपाय भी बताए जाएं।

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