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Hindi Essay on “Mitrata ” , ”मित्रता” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

मित्रता 

अथवा

मित्रता बड़ा अनमोल रत्न

 

     जीवन की सरलता के लिए मित्र की आवश्यकता – ‘मित्रता’ का तात्पर्य है – किसी के दुःख-सुख का सच्चा साथी होना | सच्चे मित्रों में कोई दुराव-छिपाव नहीं होता | वे निश्छल भाव से अपना सुख-दुख दुसरे को कह सकते हैं | उनमें आपसी विश्वास होता है | विश्वास के कारण ही वे अपना ह्रदय दुसरे के सामने खोल पाते हैं |

     मित्रता शक्तिवर्धक औषधि के समान है | मित्रता में नीरस से कम भी आसानी से हो जाते हैं | दो मित्र मिलकर दो से ग्यारह हो जाते है |

     जीवन-संग्राम में मित्र महत्वपूर्ण – मनुष्य को अपनी ज़िंदगी के दुःख बाँटने के लिए कोई सहारा चाहिए | मित्रता ही ऐसा सहारा है | एडिसन महोदय लिखते हैं – ‘मित्रता ख़ुशी को दूना करके और दुःख को बाँटकर प्रसन्नता बढ़ाती है तथा मुसीबत कम करती है |’

     सच्चे मित्र की परख और चुनाव – विद्वानों का कहना है कि अचानक बनी मित्रता से सोच-समझकर की गई मित्रता अधिक ठीक है | मित्र को पहचानने में जल्दी नहीं करनी चाहिए | यह काम धीरे-धीरे धर्यपूर्वक कारण चाहिए | सुकरात का बचन है- ‘ मित्रता करके में शीघ्रता मत करो, परंतु करो तो अंत तक निभाओ |’

     मित्रता समान उम्र के, समान स्तर के, समान रूचि के लोगों में अधिक गहरी होती है | जहाँ स्तर में असमानता होगी, वहाँ छोटे-बड़े का भेद होना शुरू हो जाएगा |

     सच्ची मित्र वाही है जो हमें कुमार्ग की और जाने से रोके तथा सन्मार्ग की प्रेरणा दे | सच्चा मित्र चापलूसी नहीं करता | मित्र के अवगुणों प्र पर्दा भी नहीं डालता | वह कुशलता-पूर्वक मित्र को उसके अवगुणों से सावधान करता है | उसे सन्मार्ग पर चलने में सहयोग देता है |

     सच्चा मित्र मिलना सौभाग्य की बात – यह सत्य है कि सच्चा मित्र हर किसी को नहीं मिलता | विश्वासपात्र मित्र एक खजाना हैजो किसी-किसी को ही मिलता है | अधिकतर लोग तो परिचितों की भीड़ में अकेले रहते हैं | दख-सुख में उनका कोई साठी नहीं होता | जिस किसी को अपना एक सह्रदय मित्र मिल जाए, वह स्वयंक को सौभाग्यशाली समझे |

निबंध नंबर – 02

मित्रता : निस्वार्थ भाव

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज के बिना उसका जीवन नहीं चलता। समाज में रहते हुए उसे अपने सुख – दुःख को कहने – सुनने, भावनाओं का आदान – प्रदान  करने तथा अपने कार्यो को सम्पादित करते में दूसरों की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। उसे ऐसे व्यक्ति की भी आवश्यकता पड़ती है जो उसके सुख – दुःख में उसका हाथ बटा सके, जिसे वह अपने मन की बात बिना किसी संकोच से कह सके, जो कठिनाइयों और बाधाओं में उसका साथ दे, जो सही समय पर उसे सही दिशा की और प्रवृत्ति कर सके तथा जिस पर वह पूरा विश्वास कर सके। ऐसे व्यक्ति ही ‘मित्र’ कहलाता है।

भर्तहरि ने मित्र के गुणों का वर्णन करते हुए कहा है कि एक अच्छा मित्र पाप से बचाता है, अच्छे कामों में लगता है, मित्र के दोषों को छिपाता है और उसके गुणों को प्रकट करता है, विपत्ति के समय साथ देता है और समय पड़ने में उसे सहायता भी करता है। पर ऐसा मित्र मिलना आसान नहीं। जिस व्यक्ति को भी ऐसा मित्र मिल गया मानो उसके जीवन में एक बहुत बड़ी निधि पाली। तुलसीदास ने भी कहा है –

” धीरज धर्म मित्र अरु नारी
अपाद काल परखिए चारी “

सच्चे मित्र की पहचान तो विपत्ति पड़ने पर ही होती है। सच्चा मित्र तो जीवन का सबसे बड़ा सहारा है। मित्र के चुनाव में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। इसलिए सुकरात ने मनुष्य को सलाह दी है – “मित्रता करने में शीघ्रता मत करो, पर करो तो अंत तक निभाओ।” केवल बहरी चमक – दमक, वाक पटुता, आर्थिक सम्पनता आदि देखकर ही किसी को मित्र बनाना उचित नहीं। सच्ची मित्रता का आधार मित्र का चरित्र तथा आचरण होता है जिसकी परख एकदम नहीं की जा सकती
इसलिए किसी को मित्र बनाए से पूर्व धैर्यपूर्वक निर्णय लेना चाहिए।

जीवन रुपी संग्राम में मित्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वेसे तो कृष्ण और सुदामा की, कर्ण और दुर्योधन की मित्रता के उदाहरण भी दिए जाते हैं। कृष्ण राजा थे तो सुदामा दीं ब्राह्मण। कर्ण महादानी तथा उत्तम चरित्रवान व्यक्ति थे तो दुर्योधन महाअहंकारी, ईर्ष्यालु, क्रोधी तथा जिद्दी। फिर भी मित्रता की कसौटी पर मित्रता के ये दोनों उदाहरण खरे उतरे। महाभारत के युद्ध से पूर्व श्री कृष्ण ने कर्ण से प्रस्ताव किया कि यदि वह दुर्योधन को त्याग पांडवों के पक्ष में आ जाए, तो उसे राज गद्दी पर बिठा दिया जायेगा तथा पांडव उसकी आज्ञा का पालन करेंगे। इस प्रस्ताव को सुनकर कर्ण ने जो उत्तर दिया, वह उसकी सच्ची मित्रता का परिचयक था उसने कहा –

‘मित्रता बड़ा अनमोल रत्न,
कब इसे तोल सकता है धन।
सुरपुर की तो है क्या बिसात,
मिल जाये अगर बैकुंठ हाथ।
कुरुपित के चरणों में धर दूँ,

जब मनुष्य पर मुसीबत के बदल जाते हैं, चारों ओर से निराश का अहंकार दृष्टिगोचर होता है तो केवल सच्चा मित्र ही सुके लिए आशा की किरण बनकर सामने आता है।

आजकल की मित्रता प्रायः स्वार्थवश होती है। जबकि व्यक्ति के पास – दौलत और एश्वर्य के साधन होते हैं तो उनके लोग उससे मित्रता करने की लालायित रहते है, परन्तु विपत्ति पड़ने पर कोई विरला ही साथ देता है और वही सच्चा मित्र कहलाता है। रहीम कवि ने कहा है –

कहि रहीम संपति सगे, बनन बहुत बहुरीत
विपत्ति कसोटी जे करे, ते ही साचे मीत ।

निष्कर्ष: सच्चा मित्र वह कवच है जो विपत्ति में हमारी रक्षा करता है, वह  संजीवनी है जो देन्ये और निराशा की स्थिति में उत्साह का संचार करती है, एक सघन शीतल छायादार वृक्ष है जो विषय परिस्थितीयों में भी शीतलता प्रदान करता है, विश्वास की आधारशिला है तथा उन्नति का सोपान है। जो मित्र विपत्ति में साथ न दे, उसे तो देखना भी पाप है। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है –

‘जे न मित्र दुःख होहि दुखरी । तिन्हहि विलोकत मारी ।

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commentscomments

  1. Sasmita says:

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  2. hyhkj says:

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  3. Pratham says:

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  6. areeba says:

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