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Hindi Essay on “Man ke hare haar hai” , ”मन के हारे हार है” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

निबंध नंबर : 01 

मन के हारे हार है

Man ke Hare Haar Hai

मन क्योंकि सभी इच्छाओं का केंद्र है, सभी दृश्य-अदृश्य इंद्रियों का नियामक और स्वामी है। अत: व्यवहार के स्तर पर उसकी हार के वास्तविक हार और जीत को सच्ची जीत माना जाता है। इसलिए मन पर नियंत्रण और मन की दृढ़ता की बात भी बार-बार कही जाती है।

विद्वानों के अनुसार हर प्रकार की मानसिक दुर्बलता का उपचार यह है कि मनुष्य विपरीत दिशा में सोचना शुरू कर दे। जैसे ‘मेरा व्यक्तित्व पूर्ण है। उसमें त्रुटि या कमजोरी कोई है, तो मैं उसे दूर करके हूंगा। यदि मुझमें कोई दुर्बलता है, जो उसका ध्यान छोडक़र निर्मल शरीर औन निर्मल मन का ध्यान करूंगा। मुझे ईश्वर ने अपना ही रूप बनाया है। उसने मुझे पूर्ण मनुष्य बनाने की आज्ञा दी है। पूर्ण पुरुष परमात्मा की मैं रचना हूं, फिर मैं अपूर्ण कैसे हो सकता हूं। मेरे मन में जो अपूर्णता का विचार आता है, वह वास्तविक कैसे हो सकता है? मेरे जीवन की पूर्णता ही सत्य है। मैं अपने अंदर कोई कमी नहीं आने दूंगा। बनाने वाले ने मुझे दीन, हीन, दुर्बल बनने के लिए पैदा नहीं किया। उसके संगीत में स्वर-भंग कैसे हो सकता है? इस प्रकार निरंतर एंव बारंबार अपने मन में विचार दोहराते रहने से मनुष्य कर्म से अपने को सबल बनाता जाता है।’

लज्जाशीलता या झेंप कईं बार रोग की सीमा तक पहुंच जाती है। इसे एक प्रकार का मानसिक रोग कहा गया है। परंतु है यह रोग केवल कल्पनाा की उपज ही। इस पर आसानी से विजय पाई जा सकती है। इसका उपाय यही है कि इस विचार को धकेलकर मन में बाहर कर दिया जाए और इसके विपरीत विचार को मन में स्थान दिया जाए ‘मुझे झेंपने की तनिक भी आवश्यकता नहीं। हर समय मेरी ही चेष्टाओं को देखने की फुर्सत लोगों के पास नहीं है।’ इस प्रकार के विचार मन की सारी दुर्बलतांए निकाल कर आदमी को निश्चय ही नया बल और स्फूर्ति देते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति को सोचना चाहिए कि वह ईश्वर की मौलिक रचना है ओर उसमें कुछ दिव्यता है। उस दिव्यता को व्यक्त करने का उसे दृढ़ करने की एक सफल क्रिया कह सकते हैं।

हमें प्रत्येग संभव उपाय से बौद्धिक रूप में अपना सुधार करना आरंभ कर देना चाहिए। सर्वोत्तम लेखकों के ग्रंथों का अध्ययन करने से, विभिन्न विषयों की शिक्षा प्राप्त करने से हम अपनी कई प्रकार की त्रुटियां दूर कर सकते हैं। मन से हीनता की भावना निकल गई, तो समझो सार दुर्बलतांए समाप्त हो गई। अत: हमें हर संभव उपाय से मनोरंजक तथा आकर्षक व्यक्तित्व को प्राप्त करने की दिशा में अपने आपको अग्रसर करना चाहिए। तभी मन भी दृढ़ हो सकेगा।

अपनी वेशभूषा के प्रति, केश-श्रंगार के प्रति, बातचीत के प्रति, बर्ताव के प्रति उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि व्यक्तित्व के निर्माण तथा कार्यों में सहायक होती हैं। इनमें मन भी बढ़ता है।

कई बार हमारे सामने ऐसा कठिन काम आ जाता है कि हम मन हारने लगते हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि यह वस्तुत: हमारी परीक्षा का अवसर है। इंसानियत का इतिहास और प्रेरणा यही है कि वह हिम्मत न हारे। कहा भी है- ‘हिम्मते मर्दा मददे खुदा’। जो व्यक्ति हिम्मत नहीं हारता, ईश्वर भी उसकी ही सहायता करता है। यह सोचकर उस कार्य को करने में तन-मन से डटे रहना चाहिए। देर-सबेर सफलता अवश्य मिलेगी।

हम जो कुछ भी करते हैं, पहले मन में उसका ध्यान करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि कार्य का प्रारूप हमारे मन में तैयार होता है। यदि हमारा मन दृढ़ता से उस पर विचार करता है तो हमारा चिंतन लाभकारी होता है। व्यवहार में भी दृढ़ता आती है और सफलता भी मिलती है।

निराशा की भावना मनुष्य के मन और तन दोनों को दुर्बल बनाती है। इसे पास नहीं आने देना चाहिए। इतिहास तथा वर्तमान काल की घटनाओं से शिक्षा लेकर हमें अपने मनोबल का निर्माण करना चाहिए। हमें उनका अनुकरण करना चाहिए, जो बड़े से बड़े संकट में भी न घबरांए बल्कि डटकर कठिनाई का सामना करते हुए विजयी हुए। उनका अनुकरण मानसिक दृढ़ता और विजय की सीढ़ी बन सकता है।

अंग्रेजी की एक कहावत का अर्थ है कि इच्छाशक्ति ही सब कार्यों को सफल बनाती है। मन ही बंधन का कारण बनता है, मन ही मोक्ष का। मन को ऊंचा रखने वाला अवश् विजयी होता है। अत: हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ हमें हार की ओर नहीं, हमेशा जीत की ओर ही बढऩा है औन मन को दृढ़-निश्चयी बनाकर बढ़ते जाना है। सफल-सार्थक जीवन व्यतीत कररने का अन्य कोई उपाय नहीं है।

 

निबंध नंबर : 02 

 

मन के हारे हार है 

Man ke Hare Haar Hai

मन, मन ही तो है जो जहां आ गया बस, आ ही गया। मन शरीर का सबसे अधिक चंचल, जागरूक और चेतन अंग है। इस हाथ-पैर, कान-नाम आदि जड़ चेतन सभी निष्ठावन व्यक्ति ही संतुष्ट एंव संतोष-रूपी धन का स्वामी कहा-समझा जाता है। ऐसा ही बनने-करने का हर व्यक्ति को प्रयत्न करना चाहिए। प्रयत्न से कुछ भी कर पाना कठिन या असंभव नहीं हुआ करता।

अकारण असंतुष्ट और इच्छाओं का गुलाम व्यक्ति अपने, अपने घर-परिवार के साथ-साथ समाज, देश और जाति के लिए भी  अनेक प्रकार की अंत-बाह्य मुसीबतों का कारण बन जाया करता है। ऐसा व्यक्ति ही लोभ-लालच में भटककर देश-जाति के साथ गद्दारी तक कर बैठता है-वह भी चंद सिक्कों के लिए। इतिहास में इस प्रकार के कई उदाहरण मिलते हैं कि जब व्यक्ति ने असंतुष्ट हो देश-द्रोह और मानवता के साथ विश्वासघात किया। इस प्रकार के निहित स्वार्थी गद्दारों के उदाहरण आजकल प्रतिदिन मिलने लगे हैं। इसे अच्छी स्थिति नहीं कहा जा सकता। संतोष रूपी धन ही इस प्रकार के कुकृत्यों और भटकावों से बचा सकता है। इसीलिए संतोष को मानवता का श्रंगार भी कहा गया है। हर हाल में उसे अपनाने की प्रेरणा दी गई है।

संतोषी जीव दयालु, स्वावलंबी और परोपकारी हुआ करता है। वह समय पडऩे पर देश, जाति और मानवता के हित में सभी कुछ त्याग सकता है। इसी कारण उसे मानवता का श्रंगार कहा जाता है। अत: अपनी वर्तमान परिस्थितियों से निरंतर संघर्ष करते हुए भी व्यक्ति को संतोष का दामन नहीं छोडऩा चाहिए। सुखी जीवन का यही अहम रहस्य है। संतोष न केवल परम धन है, उसे परम धम्र भी उपर्युक्त अच्छाइयों के कारण ही स्वीकारा जाता है। इस धन और धर्म को पाने, इसे बनाए रखने का सतत प्रयास हमेशा करते रहना चाहिए।

 

निबंध नंबर : 03

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

Man Ke hare haar hai, Man ke jite jeet 

‘‘ जो भी परिस्थितियाँ मिलें, काँटे चुभैं कलियाँ खिलें,

हारे नहीं इसांन, है संदेश जीवन का यही।‘‘

मनुष्य का जीवन चक्र अनेक प्रकार की विविधताओं से भरा होता है जिसमें सुख-दुःख, आशा-निराशा  तथा जय-पराजय के अनेक रंग समाहित होेते हैं। वास्तविक रूप कें मनुष्य की हार और जीत उसके मनोयोग पर आधारित होती है। मन के योग से उसकी विजय अवश्यंभावी है परंतु मन के हारने पर निश्चय ही उसे पराजय का मुँह देखना पड़ता है।

मनुष्य की समस्त जीवन प्रक्रिया का संचालन उसके मस्तिष्क द्वारा होता है। मन का सीधा संबंध मस्तिष्क से हैं। मन में हम जिस प्रकार के विचार धारण करते  हैं, हमारा शरीर उन्हीं विचारों के अनुरूप ढल जाता हैं । हमारा मन-मस्तिष्क यदि निराशा व अवसादों से घिरा हुआ है तब हमारा शरीर भी उसी के अनुरूप शिथिल पड़ जाता है। हमारी समस्त चैतन्यता विलीन हो जाती है । परंतु दूसरी ओर यदि हम आशावादी  हैं और हमारे मन में कुछ पाने व जानने की तीव्र इच्छा हा तथा हम सदैव भविष्य की ओर देखते हैं तो इन सकारात्मक विचारों के अनुरूप प्रगति की ओर बढ़ते चले जाते हैं।

हमारे चारों ओर अनेकों ऐसे उदहारण देखने को मिल सकते हैं कि हमारे ही बीच कुछ व्यक्ति सदैव सफलता पाते हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में असफल होते चले जाते हैं। दोनों प्रकार के व्यक्तियों के गुणों का यदि आकलन करें तो हम पाएँगे कि असफल व्यकित प्रायः निराशावादी तथा हीनभावना से ग्रसित होते हैं । ऐसे व्यक्ति संघर्ष से पूर्व ही हार स्वीकार कर लेते हैं। धीरे- धीरे उनमें यह प्रबल भावना बैठ जाती है कि वे कभी भी जीत नहीं सकते हैं। वहीं दूसरी ओर सफल व्यक्ति प्रायः आशावादी ओर कर्मवीर होते हैं। वे जीत के लिए सदैव प्रयास करते हैं। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वे जीत के लिए निरंतर संघर्ष करते रहते हैं और अंत में विजयश्री भी उन्हें अवश्य मिलती हैं। वे अपने मनोबल तथा दृढ़ इच्छा-शक्ति से असंभव को भी संभव कर दिखाते हैं।

मन के द्वारा संचालित कर्म ही प्रधान और श्रेष्ठ होता है। मन के द्वारा जब कार्य संचालित होता है तब सफलताओं के नित-प्रतिदिन नए आयाम खुलते चले जाते हैं। मनुष्य अपनी संपूर्ण मानसिक एवं शारीरिक क्षमताओं का अपने कार्यों में उपयोग तभी कर सकता है जब उसके कार्य मन से किए गए हों। अनिच्छा या दबाववश किए गए कार्य में मनुष्य कभी भी अपनी पूर्ण क्षमताओं का प्रयोग नहीं कर पाता हैं।

अतः मन के योग से ही कार्य की सिद्धि होती है। मन के योग के अभाव में अस्थिरता उत्पन्न होती है । मनुष्य यदि दृढ़ निश्चयी है तथा उसका आत्मविश्वास प्रबल है तब वह सफलता के लिए पूर्ण मनोयोग से संघर्ष करता है। सफलता प्राप्ति में यदि विलंब भी होता है अथवा उसे अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है तब भी वह क्षण भर के लिए भी अपना धैर्य नहीं खोता है। एक – दो चरणों में यदि उसे आशातीत सफलता नहीे मिलती है तब भी वह संघर्ष करता रहता है और अंततः विजयीश्री दसे ही प्राप्त होती है।

                                इसलिए सच ही कहा गया है कि ‘ मन के हारे हार हे, मन के जीते जीत ‘ । हमारी पराजय का सीधा अर्थ है कि विजय के लिए पूरे मन से प्रयास नहीं किया गया। परिस्थितियाँ मनुष्य को तभी हारने पर विवश कर सकती हैं जब वह स्वयं घुटने टेक दे। हालाँकि कई बार परिस्थितियाँ अथवा जमीनी सचाइयाँ इतनी भयावह होती हैं कि व्यक्ति चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता परंतु दृढ़रिश्चयी बनक रवह धीरे-धीरे ही सही, परिस्थितियों को अपने वश में कर सकता है। अतः संकल्पित व्यक्ति समय की अनुकूलता का भी ध्यान रखता हैं।

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