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Hindi Essay on “Maithili Sharan Gupt” , ”राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त” Complete Hindi Essay for Class 9, Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त 

Maithili Sharan Gupt

 

राष्ट्रीय सभ्यता-संस्कृति के सभी रूपों का गायक ही राष्ट्रकवि होने का गौरव प्राप्त किया करता है। अपनी कविता के माध्यम से भारतीय सभ्यता और संस्कृति के नवीन-प्राचीन विभिन्न रूपों और अंगों का गायन कर जनता और सरकार, दोनों से सहज ही राष्ट्रकवि होने का गौरव पाने वाले कविवर गुप्त जी का जन्म चिरगांव, झांसी में सन 1886 में हुआ था। उनके पिता सेठ रामचरण गुप्त भी अच्छे कवि और रामभक्त थे, सो ये दोनों वस्तुएं इन्हें विरासत में प्राप्त हुई। इनकी शिक्षा-दीक्षा घर के भक्ति और काव्यमय वातावरण में हुई। हिंदी-संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी का इन्होंने घर पर ही रहकर अध्ययन-मनन किया। यह स्वभाव के बड़े विनम्र, सरल, सादे और स्वाभिमानी थे। कट्टर हिंदू होते हुए भी वैष्णव परंपरा के कारण संकीर्णता इनके पास फटकने तक नहीं पाई थी।

इन्हें युग प्रवर्तक आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का शिष्य और देन माना जाता है। उन्हीं की कृपा से ‘सरस्वती’ मासिक में इनकी कवितांए छपनी शुरू हुई, बाद में अन्यत्र भी छपने लगीं। सन 1910 में ‘रंग में भंग’ नामग प्रबंध-काव्य के बाद जब इनकी ‘भारत-भारती’ प्रकाशित हुई, तो चारों ओर इनके नाम की धूम मच गई। तभी से लोगों ने इन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की पदवी और सम्मान दे डाला। भारत के स्वतंत्र होने पर इन्हें सरकारी स्तर पर भी ‘राष्ट्रकवि’ घोषित कर राज्यसभा का सदस्य मनोनित किया गया। वहां भी यह अपनी बात कविता में ही किया कहा करते थे। इनकी साहित्य सेवाओं से प्रभावित होकर आगरा विश्वविद्यालय ने इन्हें डॉ. ऑफ लिटरेचर की मानद उपाधि प्रदान की। अन्य कई संस्थाओं ने भी इन्हें कई प्रकार से सम्मानित किया। इनके जीवन-काल में प्राय: सभी निकट संबंधी और मिलने-जुलने वाले इन्हें ‘दद्दा’ कहकर संबोधित किया करते थे। अपने कार्यों और व्वहार से इन्होंने ‘दद्दा’ का महत्व हमेशा बनाए रखा। इतिहास में इनका यह महत्व हमेशा बना रहेगा। आज भी यह इसी संबोधन से ही अधिकतर याद किए जाते हैं।

आज तक के समस्त विशेषत: आधुनिककाल के हिंदी कवियों में इन्होंने सबसे अधिक प्रबंध काव्य रचे हैं। अपने प्रबंध काव्यों के लिए इन्होंने कथानक राम कथा, बुद्ध कथा और महाभारत से चुने। इन प्राचीन कथानकों को भी इन्होंने राष्ट्रीय रंग देकर संदर्भों में सभी प्रकार से प्रेरणादायक, सफल और सार्थक बना दिया। वास्तव में इनका दृष्टिकोण गोस्वामी तुलसीदास के समान ही समन्वयवादी कहा जा सकता है। यह बात इस तथ्य से भी प्रमाणित हो जाती है कि मुख्य रूप से हिंदू कथानकों को अपनाते हुए भी इन्होंने ‘गुरुकुल’ नामक प्रबंध काव्य में सिखों के दस गुरुओं का जीवन और संदेश चित्रित किया, ‘अर्जन और सिवर्जन’ में ईसाई संस्कृति की अंतरंग महानता चितारी, जबकि ‘काबा और कर्बला’ में इस्लाम के महान संदेश और उदात्त स्वरूप का गायन किया। इसी प्रकार राम-भक्त होने हुए भी ‘द्वापर’ काव्य रचकर कृष्ण की परंपरा को आगे बढ़ाया। ये सब प्रयत्न इन्हीं निश्चय ही समन्यवादी प्रमाणित करते हैं।

‘भारत-भारती’ के बाद ‘साकेत’ और ‘यशोधरा’ नामक प्रबंध काव्य गुप्तजी की विशेष उपलब्धियां मानी जाती हैं। ‘यशोधरा’ की निम्नलिखित दो पंक्तियां इनकी समूची काव्य प्रतिभा का सार और उसमें श्रेष्ठतम कही जा सकती है :

‘अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी!

आंचल में ही दूध और आंखों में पानी!’

हिंदू, केशी की कथा, स्वर्ग सहोदर आदि छोटे-छोटे काव्य इनके मंगलघट नामक संकलन में संकलित हैं। उपर्युक्त प्रबंध काव्यों के अंतिरिक्त इन्होंने जयद्रव वध विकट भट, प्लासी का युद्ध, किसान, पंचवटी, सिद्धराज आदि खंड काव्य भी रचे। इन सबमें से ‘पंचवटी’ काफी महत्वूपर्ण है। इसी प्रकार इनका ‘नहुष’ नामक प्रबंध काव्य भी संदेश दे पाने में समर्थ है। ‘वैतालिक’ और ‘जयभारत’ में भी इन्होंने अपनी काव्य प्रतिभा का अच्छा परिचय दिया है। इनके रचे गए और गुछ काव्य उपलब्ध हैं। इन्होंने ‘तिलोत्तमा’ और ‘चंद्रहास’ नामक दो पाठय भी लिखे थे। वीरांगना, विरहिणी ब्रजांगना और मेघनाद वध-आदि इनके द्वारा अनुवाद की गई रचनांए हैं। इन्होंने उमर खय्याम की कुछ रुबाइयों, संस्कृत नाटक ‘स्वप्रवासवदत्तम’ का भी अनुवाद किया था।

इस प्रकार गुप्त जी वास्तव में महान व्यक्ति थे और राष्ट्रकवि कहलाने के उचित अधिकारी थे। आज यद्यपि वे हमारे बीच में नहीं है, पर उनकी अमर रचनांए उनकी याद हमेशा दिलाती रहेंगी। उनके काव्यों के संदेश मन-मानस में हमेशा राष्ट्रीयता का उदात्त भाव भरते रहेंगे। हां, कुछ आलोचक तुक्कड़, कवि होने का दोषारोपण भी इन पर किया करते हैं जिसे एक सीता तक ही उचित माना जा सकता है।

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