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Hindi Essay on “Kutir Udhyog”,”Laghu Udhyog” , ”कुटीर उद्योग”, “लघु उद्योग ” Complete Hindi Essay for Class 9, Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

कुटीर उद्योग या लघु उद्योग 

Kutir Udhyog ya Laghu Udhyog

 निबंध नंबर : 01

आज का युग छोटे-बड़े उद्योगों का युग है। इसी कारण कुछ वर्ष दबी रहने के बाद कुटीर उद्योग या लघु उद्योग की चर्चा आज भारत में एक बार पुन: बल पकड़ रही है। इस प्रकार के उद्योग-धंधों के मूल में ऐसे घरेलू किस्म के छोटे-छोटे काम-धंधों की परिकल्पना छिपी है, जिन्हें छोटे से स्थान पर थोड़ी पूंजी और श्रम से स्थापित कर कोई भी व्यक्ति उत्पादन का भागीदार बन अपनी रोजी-रोटी की समस्या हल कर सकता है, बेकारी से लडक़र सामान्य स्तर पर अच्छा जीवन जी सकता है। कुछ अन्य बेकारों के लिए भी रोजगार के अवसर उपलब्ध करा सकता है। भारत जैसे गरीब, अल्पविकसित और अल्प साधनों वाले देश के लिए इस प्रकार के छोटे उद्योग-धंधे ही हितकर हो सकते हैं, यह बात राष्ट्रपित गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में ही जान ली थी और स्वतंत्र भारत में उसी प्रकार की इकाइयां स्थापित करने और स्वेदीश साधनों से परंपरागत उद्योगों का नवीनीकरण करने की प्रेरणा दी थीं। पर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे नेताओं ने इस ओर कतई ध्यान नहीं दिया। बड़े-बड़े उद्योग-धंधे यहां पनपे और वह भी समर्थ लोगों की नीजी संपति बनकर रह गए। इधर बढ़ती जनसंख्या, शिक्षा का प्रचार, जागृति, अधिकारों की मांग और पहचान, बेकारों की निरंतर लंबी होती पंक्तियां, इन सबने आज के जागरुक चिंतकों को विवश कर दिया है कि देर से ही सही, देश की इस प्रकार की बढ़ती समस्याओं से निपटने के लिए गांधीवादी सूत्रों को अपनांए कि जो समय के अनुरूप देश की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। परिणामस्वरूप आज देश में कुटीर उद्योगों का जाल सा एक बार फिर से फैलता हुआ नजर आने लगा है।

आज नगर और गांव दोनों स्तरों पर अनेक प्रकार के घरेलू उद्योग स्थापित हो रहे हैं। वह उपयुक्त उद्योग के चुनाव, उसके लिए तकनीकी ज्ञान, उपकरण और आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करा रही है। एक विशेश बात यह भी है कि सरकार ने कुछ विशेष प्रकार के उत्पादनों को बड़े उद्योगों की सीमा से बाहर और सिर्फ छोटे उद्योगों के लिए सीमित कर दिया है। इस प्रकार आज के अनेक लघु उद्योग वास्तव में बड़े उद्योगों के पूरक और सहकारी बनकर पनप रहे हैं। उनके लिए उचित हाट-बाजार की भी व्यवस्था है। इस व्यवस्था के अंतर्गत लघु उद्योगों का उत्पादन बड़े उद्योग खरीदकर प्रयोग में लाते हैं। परिणामस्वरूप इन्हें चलाना आज कोई समस्या या घाटे का सौदा नहीं रह गया।

वास्तव में कुटीर-उद्योगों की स्थापना का उद्यमी लोगों को बहुत लाभ पहुंच रहा है। बहुत सारे बेकार शिक्षित या अर्धशिक्षित, तकनीकी ज्ञान रखने वाले लोग सरकारी सहायता या निजी साधनों से इस प्रकार के उद्योग स्थापित कर अपनी बेकारी की समस्या तो हल कर ही पा रहे हैं, कई अन्य बेकारों के लिए भी काम मुहैया कर रहे हैं। धीरे-धीरे इनका क्षेत्र और विस्तार बढ़ रहा है। इनका महत्व भी लोगों पर उजागरर होता जा रहा है। इसके सुफल और सुपरिणाम भी हमारे सामने आ रहे हैं। यही कारण है कि आज नगरों, महानगरों की गलियों, मोहल्लों में तो इनकी भरमार हो ही रही है, हमारे गांव-क्षेत्र भी इस प्रकार के उद्योग स्थापित कर अपनी समसयाओं से लड़ रहे हैं। एक कटु सत्य यह भी है कि गांवों में पनपकर इस प्रकार के मशीनी लघु-उद्योग अनेक प्रकार की नई समस्यांए उत्पन्न करने लगे हैं पर घबराने की नहीं, साहस के साथ उन सबका मुकाबला करने की आवश्कयता है।

ग्रामों में इस प्रकार के उद्योग-धंधे स्थापित करने की आवश्यकता मुद्दत से महसूस की जा रही थी, क्योंकि वहां खेती-बाड़ी का काम बारहों महीने नहीं चला करता। अक्सर आधा साल लोग बेकार रहा करते हैं। बेकार मन भूतों का डेरा यह कहावत चरितार्थ होती है उनके छोटी-छोटी बातों से उत्पन्न झगड़ों में। फिर शिक्षा-प्रचार के कारण ग्राम-युवक पढ़-लिख या तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर हमेशा नौकरी तो पा नहीं सकते। अत: वहां मुर्गी-पालन, भेड़-पालन, मधुमक्खी पालन, दुज्धोत्पादन जैसे लघु उद्योग तो शुरू किए ही जा सकते हैं। छोटे-मोटे कल-पुर्जों, खिलौने आदि बनाने के भी काम हो सकते हैं। धीरे-धीरे उनका विस्तार भी हो सकता है। प्रसन्नता की बात है कि आज गांव के युवा अपनी कल्पना और ऊर्जा का उपयोग इस दिशा में करने लगा है। इससे नगरों की भीड़ भी कम होगी। ग्राम-जनों को रोजगार के साधन वहीं मिल सकेंगे। अपने घर-परिवेश में रहकर व्यक्ति जो कुछ कर सकता है, अन्यत्र नहीं। अत: इस ओर और भी अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। वह दिया भी जाने लगा है, इसे सुखद स्थिति और सुखद भविष्य का सूचक मानकर सुख-संतोष का अनुभव कर सकते हैं।

 

 निबंध नंबर : 02

कुटीर-उद्योगों का महत्व

Kutir Udyog ka Mahatva

                ऐसे छोट-छोटे उद्योग धंधे, जिनमें मशीन और पूंजी की प्रधानता न होकर श्रम की प्रधानता हो, कुटीर-उद्योग कहलाता है। कुटीर-उद्योग के लिए बड़ी पूंजी, बड़े भूखण्ड एवं बड़े बाजार की आवश्यकता नहीं होती। एक परिवार या आस-पड़ोस के लोग भी मिलकर इसे घर में ही चला सकते हैं।

                किसी देश की आर्थिक सम्पन्नता और खुशहाली में कुटीर-उद्योगों का विशेष योगदान रहता है। आज यहां एशियाई देशों में सबसे खुशहाल है। जापान के बारे में कहा जाता है कि यहां का हर घर लद्यु उद्योग का एक केन्द्र है। हमारी पुरानी सामाजिक व्यवस्था में भी लघु उद्योगों का बड़ा महत्व था। कृषि के अतिरिक्त ग्रामीण जनता छोट-छोटे उद्योगों में लगी हुई थी। मोची, जूता, बढ़ई लकड़ी के सामान, कुम्हार मिटी के बर्तन, तेली कोल्हू से तेल आदि तैयार करते थे। गांव की गरीब औरतें धान कूटकर या गेहूं पीसकर अपनी जीविका चला लेती थीं। इस तरह गांव के विभिन्न वर्ग विभिन्न प्रकार के उत्पादनों में लगे रहते थे और एक-दूसरे की आवश्यकतआं की पूर्ति करते थे। फलतः हमारे पुराने गांव स्वावलम्बी एवं सुखी थे। कुटीर एवं लघु उद्योगों के इस महत्व को देखकर ही गांधीजी का कहना था- “कोई देश लघु एवं कुटीर -उद्योगों की अनदेखी कर विकास नहीं कर सकता, खासकर भारत जैसा विकासशील एवं गांवों का देश।“

                वर्तमान युग मशीन का हो गया है। अब लोब मोची के जूते की जगह मल्टीनेशनल कम्पनियों के जूते पसंद करते हैं; कोल्हू से निकाले गए तेल न पसंद कर मिल से निकलकर आने वाला तेल पसंद करते हैं; हैंडलूम वस्त्रों के बदले सिन्थेटिक कपड़े पहनना ज्यादा पसंद करते हैं। यही कारण है कि कुटीर उद्योगों में लगे सैकड़ों-हजारों हाथ बेकार हो गए है। बड़ी-बड़ी मशीनो की चिमनियों से निकलने वाले धुएं एवं कचरों से पर्यावरण प्रदूषित हो गया है। इस प्रकार अन्धाधुन्ध मशीनीकरण से बेरोजगारी भी बढ़ी है और प्रदूषण भी बढ़ा है। यही कारण है कि गांधी जी कहा करते थे-“मशीनों को काम देने के पहले आदमी को काम दो।“ इन दोनों समस्याओं को कुटीर-उद्योग की स्थापना कर कुछ हद तक सुलझाया जा सकता है। इसके लिए घर-घर में कुटीर-उद्योगों का जाल बिछाना होगा, यथा-मधुमक्खी-पालन, चमड़ा-अद्योग, डेयरी-फार्म, हस्तकरघा-उद्योग, लकड़ी एवं मिटी के खिलौने, रेडीमेड कपड़े, पापड़-उद्योग, जेली-उत्पादन, विभिान्न प्रकार के अचार, पŸाल, टोकरी एवं बेंत के फर्नीचर का निर्माण, मुर्गी- पालन, मछली-पालन इत्यादि। इन कुटीर-अद्योगों की सफलता के लिए सरकार का सहयोग अपेक्षित है। सरकार को चाहिए कि इन उद्योगों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्थ करे, कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराकर कच्चे माल एवं उत्पादित वस्तुओं की बिक्री हेतु बाजार भी उपलब्ध कराए। इन सबके अलावा सरकार को इन कुटीर-अद्योगों के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। बहुधा यह देखा जाता है कि बड़े उद्योगों की स्थापना से छोटे उद्योग मृतप्राय हो जाते हैं, जैसे बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को निगल जाती हैं।

                आज भारत एक विकासशील देश है। इसके पास पूंजी का अभाव है। यह इतनी सामथ्र्य नहीं रखता कि बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना कर सके। लेकिन इसके पास अपार जनसंख्या है। अतः भारत जैसे आर्थिक दृष्टि से कमजोर एवं अपार जनसंख्या वाले देश के लिए कम पंूजी पर आधारित कुटीर उद्योग-धंधे आर्थिक-विकास की रीढ़ साबित हो सकते हैं। इससे बढ़ती बेरोजगारी को भी कम किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में भूतपूर्व राष्ट्रपति वी.वी. गिरि के विचार द्रष्टव्य हैं- “भारत के हर घर में कुटीर-अद्योग तथा जमीन का हर एकड़ चारागाह बनाकर ही हम बेकारी की समस्या से मुक्ति पा सकते है।“

                ऊपर के कथन से कुटीर उद्योग का महŸव परिलक्षित होता है। कुटीर उद्योग भारत जैसे देश के लिए बहुत आवश्यक है। कुटीर अद्योगों के विकास से कम-से-कम ग्रामीण क्षेत्रों का विकास तो तय है। 

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commentscomments

  1. Rakhi sharma says:

    Very encouraging essay

  2. Rakhi sharma says:

    Very encouraging essay

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