Home » Languages » Hindi (Sr. Secondary) » Hindi Essay on “Karat-Karat Abhyas ke Jadmati hot Sujaan” , ”करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

Hindi Essay on “Karat-Karat Abhyas ke Jadmati hot Sujaan” , ”करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

निबंध नंबर : 01 

करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

 

कविवर वृंद के रचे दोहे की एक पंक्ति वास्तव में निरंतर परिश्रम का महत्व बताने वाली है। साथ ही निरंतर परिश्रम करने वाला व्यक्ति के लिए अनिवार्य सफलता प्रदान करने वाली है दोहे की यह पंक्ति। पूरा दोहा इस प्रकार है :-

‘करत -करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।

रसरी आवत-जात ते, सिल पर परत निसान।’

इसकी व्याख्या इस प्रकार है कि निरंतर परिश्रम करते रहने से असाध्य माना जाने वाला कार्य भी सिद्ध हो जाया करता है। असफलता के माथे में कील ठोककर सफलता पाई जा सकती है। जैसे कूंए की जगत पर लगी सिल (शिला) पानी खाींचने वाली रस्सी के बार-बार आने-जाने से, कोमल रस्सी की रगड़ पडऩे से घिसकर उस पर निशान अंकित हो जाया करता है। उसी तरह निरंतर और बार-बार अभ्यास यानि परिश्रम और चेष्टा करते रहने से एक निठल्ला और जड़-बुद्धि समझा जाने वाला व्यक्ति भी कुछ करने योज्य बन सकता है। सफलता और सिद्धि का स्पर्श कर सकता है। हमारे विचार में कवि ने अपने जीवन के अनुभवों के सार-तत्व के रूप में ही इस तरह की बात कही है। हमारा अपना भी विश्वास है कि कथित भाव ओर विचार सर्वथा अनुभव-सिद्ध ही है।

ऐसे किंदवतीं अवश्य प्रचलित है कि कविवर कालिदास कवित्व-शक्ति प्राप्त करने से पहले निपट जड़मति वाले ही थे। कहा जाता है कि वन में एक वृक्ष की जिस डाली पर बैठे थे, इस बात की चिंता किए बिना कि कट कर गिरने पर उन्हें चोट आ सकती या मृत्यु भी हो सकती है। उसी डाली को काट रहे थे। विद्योतमा नामक विदुषी राजकन्या का मान भंग करने का षडय़ंत्र कर रहे तथाकथित विद्वान वर्ग को वह व्यक्ति (कालिदास) सर्वाधिक जड़मति और मूख लगा। सो वे उसे ही कुछ लाभ-लालच दें, कुछ ऊटपटांक सिखा-पढ़ा, महापंडित के वेश में सजा-धजाकर राजदरबार में विदुषी राजकन्या विद्योत्मा से शास्त्रार्थ करने के लिए ले गए। उस मूर्ख के ऊटपटांग मौन संकेतों की मनमानी व्याख्या षडय़ंत्रकारियों ने एक विदुषी से विवाह करा दिया। लेकिन प्रथम रात्रि को वास्तविकता प्रकट हो जाने पर पत्नी के ताने से घायल होकर ज्यों घर से निकले कठिन परिश्रम और निरंतर साधना रूपी रस्सी के आने-जाने से घिस-घिसकर महाकवि कालिदास बनकर घर लौटे। स्पष्ट है कि निरंतर अभ्यास ने तपाकर उनकी जड़मति को पिघलाकर बहा दिया। जो बाकी बचा था, वह खरा सोना था।

विश्व के इतिहास में और भी इसी प्रकार के कई उदाहरण खोजे एंव दिए जा सकते हैं। हमें अपने आस-पास के प्राय: सभी जीवन-क्षेत्रों में इस प्रकार के लोग मिल जाते हैं कि जो देखने-सुनने में निपट अनाड़ी और मूर्ख प्रतीत होते हैं। वे अक्सर इधर-उधर मारे-मारे भटकते भी रहते हैं। फिर भी हार न मान अपनी वह सुनियोजित भटकन अनवरत जारी रखा करते हैं। तब एक दिन ऐसा भी आ जाता है कि जब अपने अनवरत अध्यवसाय से निखरा उनका रंग-रूप देखकर प्राय दंग रह जाना पड़ता है। इससे साफ प्रकट है कि विश्व में जो आगे बढ़ते हैं किसी क्षेत्र में प्रगति और विकास किया करते हैं, वे किसी अन्य लोक के प्राणी न होकर इस हमारी धरती के हमारे ही आस-पास के लोग हुआ करते हैं। बस, अंतर यह होता है कि वे एक-दो बार की हार या असफलता से निराश एंवा चुप होकर नहीं बैठ जाया करते। बल्कि निरंतर, उन हारों-असफलताओं से टकराते हैं और एक दिन उनकी चूर-चूर कर विजय या असफलता के सिंहासन पर आरूढ़ दिखाई देकर सभी काो चकित-विस्मित कर दिया करते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट कर देते हैं, अपने व्यवहार और असफलता से कि वास्तव में संकल्पवान व्यक्ति के शब्दकोश से असंभव नाम का कोई शब्द नहीं हुआ करता।

इसलिए मनुष्य को कभी भी-किसी भी स्थिति में हार मानकर, निराश होकर नहीं बैठ जाना चाहिए। अपने अध्यवसाय-रूपी रस्सी को समय की शिला पर निरंतर रगड़ते रहना चाहिए। तब तक निरंतर ऐसे करते रहना चाहिए कि जब तक कर्म की रस्सी की विघ्न-बाधा या असफलता की शिला पर घिसकर उनकी सफलता का चिन्ह स्पष्ट न झलकने लगे। मानव, प्रगति का इतिहास गवाह है कि आज तक जाने कितनी शिलाओं को अपने निरंतर अभ्यास से घिसते आकर, बर्फ की कितनी दीवारें पिघलाकर वह आज की उन्नत दशा में पहुंच पाया है। यदि वह हार मानकर या एक-दो बार की असफलता से ही घबराकर निराश बैठे रहता, तो अभी तक आदिमकाल की अंधेरी गुफाओं और बीहड़ वनों में ही भटक रहा होता। लेकिन यह न तब संभव था और प्राप्त स्थिति पर ही संतुष्ट होकर बैठे रहना न आज ही मानव के लिए संभव है।

 

निबंध नंबर : 02

 

करत-करत अभ्यास के

मध्यकालीन हिंदी-काव्य (रीतिकाल) के एक प्रसिद्ध नीतिवान और अनुभवी कवि वृंद की यह उक्ति अपने पूर्ण रूप में इस प्रकार है :

‘करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।

रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान।।’

अर्थात जिस प्रकार कुंए की जगत के पत्थर पर कोमल रस्सी की बार-बार रगड़ पडऩे से वह घिसकर निशान वाला हो जाता है, उसी प्रकार निरंतर अभ्यास और परिरम करने वाला जड़ या असमर्थ व्यक्ति भी एक न एक दिन सफलता अवश्य पा लेता है। सचमुच, कवि वृंद ने बड़ी ही अनुभव सिद्ध और मार्के की बात कही है। इस उक्ति के माध्यम से उन्होंने बताया है कि अभ्यासी और परिश्रमी व्यक्ति के लिए जीवन में कुछ भी कर पाना असंभव या कठिन नहीं हुआ करता। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि यदि व्यक्ति लगन के साथ निरंतर चलता रहेगा, तो एक न एक दिन अपनी मंजिल तक पहुंच ही जाएगा। यह अनुभवसिद्ध बात है। कुछ पाने के लिए केवल अच्छा इरादा ही काफी नहीं हुआ करता, उसके लिए निरंतर परिश्रम और अभ्यास भी आवश्यक हुआ करता है। कहावत है कि कुंआ प्यासे के पास चलकर नहीं आया करता, प्यासे को ही चलकर उसके पास पहुंचना पड़ता है। यह चलना ही अभ्यास ओर परिश्रम-रूपी रस्सी है जो सिल यानी पत्थर पर भी सफलता के निशान छोड़ जाया करती है। अत: निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए। यह निंरतर अभ्यास ही सफलता पाने की कुंजी है। अभ्यास-निरत व्यक्ति को सफल होने पर कोई नहीं रोक सकता।

कहावत क्या, अनुभव सिद्ध बात है कि रगडऩे से ही पत्थर में से आग और तिलों में से तेल पैदा हुआ करते हैं। किसी प्रकार सामान्य बुद्धि, शक्ति और स्वल्प साधनों वाला व्यक्ति भी जब कुछ करने का इरादा बना तदुनुरूप कार्य आरंभ कर देता है, तो प्राय: चमत्कारपूर्ण परिणाम सामने आया करते हैं। मंजिल केवल तेज चाल वाले खरगोशों के लिए ही नहीं हुआ करती। वे यों अक्सर अपनी तेजी से शेखी में भटक जाया करते हैं। मंद चाल होने पर भी निरंतर चलते रहने वाले कछुए अक्सर मंजिल पर पहुंच सफलता के आनंद का पारितोषित पाया करते हैं। खरगोश-कछुए की यह प्रचलित नीति-कथा भी यही सिद्ध करता है कि ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।’ अत: आज से ही सब प्रकार के आलस्य और भय त्यागकर धीरे-धीरे सही, चल पडि़ए। सफलता की मंजिल बड़ी बेताबी से चलने वालों की राह देखा करती है।

उपर्युक्त सूक्ति में कवि मात्र यही कहना चाहता है कि जीवन निरंतर सजग रहकर निरंतर चलते रहने अर्थात परिश्रम करने वालों का ही हुआ करता है। एक बार की हार या जड़ता की अनुभूति से बैठे रहने वाले साधनों की सुलभता में भी सफल नहीं हुआ करते।

About

The main objective of this website is to provide quality study material to all students (from 1st to 12th class of any board) irrespective of their background as our motto is “Education for Everyone”. It is also a very good platform for teachers who want to share their valuable knowledge.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *