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Hindi Essay on “Holi Rango ka Tyohar ” , ”होली रंगों का त्यौहार ” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

  
        
          

होली रंगों का त्यौहार 

Holi Rango ka Tyohar 

 

होली का पर्व ऋतुराज वसंत के आगमन पर फाल्गुन की पूर्णिमा को आनंद और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इन दिनों रबी की फसल पकने की तैयारी में होती है। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन लोग गाते-बजाते, हंसते-हंसाते अपने खेतों पर जाते हैं। वहां से वे जौ की सुनहरी बालियां तोड़ लाते हैं। जब होली में आग लगती है तब उस अधपके अन्न को उसमें भूनकर एक-दूसरे को बांटकर गले मिलते हैं।

होलिका-दहन के संबंध में एक कहानी प्रसिद्ध है-हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि आग उसे जला नहीं सकती। हिरण्यकशिपु ईश्वर को नहीं मानता था। वह अपने को ही सबसे बड़ा मानता था। उसका पुत्र प्रहलाद अपने पिता के विपरीत ईश्वर पर विश्वास करता था। पिता ने उसे ऐसा करने के लिए बार-बार समझाया, किंतु प्रहलाद पर कोई असर नहीं हुआ। इस पर हिरण्यकशिपु बहुत कु्रद्ध हुआ। उसने अपने पुत्र को तरह-तरह से त्रास दिए, किंतु प्रहलाद अपने निश्चय से डिगा नहीं।

अंत में हिरण्यकशिपु ने उसे अपनी बहन होलिका के सुपुर्द कर दिया। होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई। होलिका तो जल गई, किंतु भक्त प्रहलाद का कुछ भी नहीं बिगड़ा। इस प्रकार होलिका दहन बुराई के ऊपर अच्छाई की विजय है। एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन गोपियों के साथ रासलीला की थी। इसी दिन नंदगांव में सभी लोगों ने रंग और गुलाल के साथ खुशियां मनाई थीं। नंदगांव और बरसाने की ब्रहभूमि पर इसी दिन बूढ़े और जवान, स्त्री और पुरुष सभी ने एक साल मिलकर जो रास-रंग मचाया था, होली आज भी उसकी याद ताजा कर जाती है।

पहले प्रीतिभोज का आयोजन होता था। गीतों, फागों के उत्सव होते थे, मिठाइयां बांटी जाती थीं। बीतें वर्षों की कमियों पर विचार होता था। इसके बाद दूसरे दिन होली खेली जाती थी। छोटे-बड़े मिलकर होली खेलते थे। अतिथियों को मिठाइयां और तरह-तरह के पकवान खिलाकर तथा गले मिलकर विदा किया जाता था।

किंतु आज यह पर्व बहुत घिनौना रूप धारण कर चुका है। उसमें शराब और अन्य नशीले पदार्थों का भरपूर सेवन होने लगा है। राह चालते लोगों पर कीचड़ उछाला जाता है। होली की जलती आग में घरों के किवाड़, चौकी, छप्पर आदि जलाकर राख कर दिए जाते हैं। खेत-खलिहानों के अनाज, मवेशियों का चारा तथा स्वाहा कर देना अब साधारण सी बात हो गई है। रंग के बहाने दुश्मनी निकालना, शराब के नशे में मन की भड़ास निकालना आज होली में आम बात हो गई है।

यही कारण है कि आज समाज में आपसी प्रेम के बदले दुश्मनी पनप रही है। जोडऩेवाले त्योहार मनों को तोडऩे लगे हैं। होली की इन बुराइयों के कारण सभ्य और समझदार लोगों ने इससे किनारा कर लिया है। रंग और गुलाल से लोग भागने लगे हैं।

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