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Hindi Essay on “Global Warming ke Khatre , ग्लोबल वार्मिंग के खतरे” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

ग्लोबल वार्मिंग के खतरे

निबंध नंबर :01

ग्लोबल वार्मिंग अर्थात् विश्वव्यापी तापक्रम वृद्धि से तात्पर्य विश्व के औसत तापक्रम में आई वृद्धि से है। आज पूरे विश्व के लिए यह चिंता का विषय बन चुका है। ग्लोबल वार्मिंग के अंतर्गत अनावश्यक तापक्रम वृद्धि से उत्पन्न विश्वव्यापी खतरों को चिन्हित किया जाता है।

विश्व के अधिकांश देशों ने ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को भाँप लिया है। ग्लोबल वार्मिंग ने अपनी प्रचंडता का प्रदर्शन करना प्रारंभ कर दिया है। दिन-व-दिन पृथ्वी गर्म होती जा रही है। ऐसा माना जाता है कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए सर्वाधिक विकसित एवं विकासशील देश जैसे सं0रा0अमेरिका, रूस, चीन, यूरोपीय देश एवं भारत जैसे देश इसके अंतर्गत आते हैं। परमाण्वीय तथा वैज्ञानिक प्रयोगों, लगातार बढ़ते प्रदुषणों आदि के कारण भूमण्डलीय तापक्रम तेजी से बढ़ रहा है। वाहनों तथा कल-कारखानों में अप्रत्याशित वृद्धि ने तो वायु प्रदुषण को अनियंत्रित कर दिया है। इससे वायुमंडल में कार्बन-डाय-आॅक्साइड एवं सल्फर डाय-आॅक्साइड जैसे विषाक्त गैसों की मात्रा में लगातार वृद्धि पराबैंगनी किरणों का अंश पृथ्वी तक पहुँचने लगा है और हम त्वचा संबंधी अनेक रोगों से ग्रसित होने लगे हैं। इससे ग्लोबल वार्मिंग विकराल रूप ले चुका है।

मूल प्रश्न यह है कि आखिर समस्त विश्व ग्लोबल वार्मिंग के प्रति सजगता और एकजुटता क्यों प्रदर्शित करने लगे हैं? इसका मुख्य कारण ग्लोबल वार्मिंग से होने वाले पूरे विश्व के अस्तित्व के खतरे से है। पृथ्वी के तापक्रम में वृद्धि से धु्रवों पर जमी बर्फ लगातार पिघल रही है और ग्लेशियर का हा्रस होता जा रहा है। इससे महासागरों के जलस्तर में लगातार वृद्धि हो रही है। इससे धु्रवीय क्षेत्रों में निवास करने वाले प्राणियों तथा पेड़-पौधों की अनेक प्रजातियाँ या तो विलुप्त हो गई हैं या विलुप्तप्राय हैं। वर्षा के वितरण में असमानता उजागर होने लगी हैं। प्राकृतिक आपदाओं में अत्यन्त वृद्धि हुई है। ऐसा माना जाता है कि यदि इसी प्रकार से वनोन्मूलन संबंधी गतिविधियां सक्रिय रहीं तो दिन-व-दिन पृथ्वी के तापक्रम में वृद्धि होती ही जाएगी और वह दिन दूर नहीं कि धु्रवों पर जमी समस्त बर्फ पिघल जाएगी और पूरी पृथ्वी जलमग्न हो जाएगी जिससे जीवों का अस्तित्व मिट जाएगा।

जैसा कि हर समस्या का समाधान भी होता है वैसा ही ग्लोबल वार्मिंग का भी समाधान है। हमारी आपसी समझ-बूझ और संसाधनों के समझदारी से उपयोग से यह संभव है। हमें वृक्षारोपण संबंधी गतिविधियों को प्रोत्साहित करना चाहिए। हर उत्सव पर वृक्षारोपण को इसका अंग बनाना होगा। ग्लोबल वार्मिंग के उन्मूलन हेतू हर राष्ट् को दीर्घव्यापी उपाय ढूँढना होगा। विभिन्न राष्ट्रों को अपना मानक तैयार करना होगा जिससे इसे नियंत्रण में रखा जा सके। अनावश्यक वैज्ञानिक गतिविधियों, वैज्ञानिक परीक्षणों, वाहनों की संख्या में होने वाले अप्रत्याशित वृद्धि, कल-कारखानों से उत्सर्जित पदार्थों को नियंत्रित करना होगा। इस प्रकार जन जागरूकता और आपसी सूझबूझ से ग्लोबल वार्मिंग के दैत्य को सदा सर्वदा के लिए समाप्त किया जा सकता है।
अतः आज के युवाओं को प्रदुषण को नियंत्रित करने हेतू सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों में हिस्सेदार बनना चाहिए। उन्हें प्रदुषण को नियंत्रित करने हेतु जनजागरण के कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना चाहिए। पूरे विश्व में अस्त्र-षस्त्रों की होड़ तथा गैर-जरूरी वैज्ञानिक गतिविधियों को प्रतिबंधित करना होगा तभी हम प्रदुषणरहित विश्व की कल्पना कर सकते हैं।

 

निबंध नंबर :02

ग्लोबल वार्मिंग:महाप्रलय की वार्निंग

G-8 शिखर सम्मेलन 2005 के दौरान जलवायु परिवर्तन से जुड़े ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे पर अमेरिका के अन्य देशों के साथ मतभेद खुलकर सामने आ गए। सम्मेलन के अंत में कोई ठोस पारित नहीं किया जा सका। बैठक के अन्त में जारी घोषणा पत्र में ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे पर जो कुछ कहा गया, उसके मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं-

               ग्लोबल वार्मिंग पर तुंरत कार्रवाई की जरूरत है। परन्तु इसमें ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख कारक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की मात्रा को कम करने के लिए कोई स्पष्ट समय सीमा तय नहीं की गई है।

            जलवायु परिवर्तन एक व्यापक तथा दीर्घकालीन चुनौती है तथा यह विश्व के प्रत्येक भाग के लिए बेहद खरतनाक है।

            ग्लोबल वार्मिंग हेतु मूल रूप से मानव गतिविधियां ही जिम्मेदार हैं तथा ग्रीन हाउस गैसें विशेषकर आधुनिक उघोगों में प्रयुक्त होने वाले जीवाश्म ईधनों के उत्पादकों के उपयोग तथा उनसे उत्सर्जित होने वाली प्रमुख ग्रीन हाउस गैस कार्बन डाइ-ऑक्साइड  के उत्सर्जन में कमी लाने की आवश्यकता है।

ध्यात्व्य है कि ग्रीन हाउस गैसों के कुल उत्सर्जन का लगभग 47 प्रतिशत इन्हीं आठ देशों द्वारा किया जाता है जो ळ-8 के सदस्य हैं। स्काॅटलैंड के ग्लेनिंगल्स में हुई-8 देशों की तीन दिवसीय बैठक में ग्लोबल वार्मिंग मुद्दे पर सर्वसम्मत राय कायम नहीं हो सकी। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, रूस, फा्रंस, इटली, जर्मनी और जापान जैसे आठ विकसित देशों की यह बैठक आतंकवाद, गरीबी, जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ ऊर्जा तथा सतत विकास जैसे समान महŸव के मुद्दों पर आम राय बनाने मे लिए ही बुलाई गई थी । बाकी मुद्दों के अलावा ग्लोबल वार्मिंग जैसे ज्वलंत मुद्दे ने बैठक में सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इस बैठक की वास्तविकता यह रही कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े ग्लोबल वार्मिंग के इस मुख्य मुद्दे पर अमेरिका के अन्य देशों के साथ मतभेद भी खुलकर सामने आ गए। इस बैठक की समाप्ति पर मात्र ढुलमुल प्रस्ताव की पारित किया गया। साफ जाहिर है कि अमेरिका विकासशील देशों की परवाह किए बगैर यहां भी अपना एकछत्र प्रभुत्व कायम करने में सफल रहा।

अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने तो बैठक में स्पष्ट कहा किया प्रोटोकॉल अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए व्यावहारिक नहीं है। भारत और चीन पर पलटवार करते हुए कहा कि यह क्योटो  प्रोटोकॉल संधि तब तक कारगर नहीं हो सकती, जब तक ये दोनों देश अपने यहां प्रदूषण के स्तर को कम नहीं करते। कहने की आवश्यकता नहीं कि धरती पर बदलते मौसम के मिजाज और तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि से अब यह सिद्ध हो चला है कि ये घटनाएं प्राकृतिक न होकर मनुष्य जनित ही हैं।

आज अमेरिका भले ही इस ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि के लिए मानवीय प्रवारतियों को नकार रहा हो, मगर पिछले दिनों अमेरिका के ही वैज्ञानिकों ने एक जर्नल में प्रकाशित लेख के जरिये मौसम की इस गरमाहट से लेकर भविष्य में मलेरिया के फैलने, त्वचा रोगों के बढ़ने तथा वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों के और अधिक बढ़ने से ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंचने की भविष्यवाणी की थी। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की प्रकाशित वार्षिक रिपोर्ट में ओजोन परत के नुकसान के लिए बढ़ते उद्योगीकरण को दोषी ठहराया गया। आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन-चार सालों में गर्मी ने पिछले दशकों के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। इस गर्मी के कारण ही पिछले एक दशक में उत्तर भारत खासकर हिमालय के तराई सेटेलाइट रडार के जरिये पता लगाया है कि अंटार्कटिका के तापमान में लगातार वृद्धि के कारण वहां सालाना चार मीटर से लेकर 24 मीटर तक बर्फ पिघल जाती है, जिसका प्रभाव समुद्र के जल स्तर पर पड़ रहा है। समुद्र के तापमान में 0.1 डिग्री सेंटीग्रट की बढ़त से अंटार्कटिका में 1 मीटर बरफ पिघल जाती है। धरती की इस गरमाहट में लगातार बढ़त को देखते हुए यह अनुमान लगाया गया है कि पिछले दशकों में तापमान की यह बढ़त 0.3 डिग्री सेंटीगे्रड थी। मगर 1990 में 0.7 डिग्री सेंटीगे्रड की दर से बढ़ रहा है। इस हिसाब से अगले चार दशकोें में यह तापमान दो डिग्री बढ़ जाएगा।

अगर पृथ्वी के तापमान बढ़ने की यही गति बनी रही तो ग्नेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ने से महानगरों के जल स्तर में और वृद्धि होगी। ऐसा होने से दुनिया की आधी से अधिक आबादी बाढ़ के खतरें में आ जाएगी। सिर्फ यही नहीं, जलस्तर के बढ़ने से समुद्री जल भूमिगत जल से मिलकर उसको खारा बना देगा और इससे धरती अनुपजाऊ होती चली जाएगी। इस वैश्विक ताप वृद्धि के लिए प्रमुख रूप से वायुमण्डल में लगातार कार्बन-डाई-आॅक्साइड का बढ़ता अधिक जिम्मेदार है। यह भी ध्यातव्य है कि औद्योगिक क्रांति से पूर्व की तुलना में वायुमण्डल में अब इसकी मात्रा 30 फीसदी से भी बढ़ोतरी जरूरी है वहीं दूसरी ओर सीमित भूमि में पैदावार बढ़ाने के लिए अत्यधिक उर्वरकों के प्रयोग से भारी मात्रा में कार्बन-डाइ-आॅसाइड उत्सर्जित होती है। इसके अलावा भूमिगत प्राकृतिक संसाधनों जैसे-कोयला व खनिज तेल इत्यादि के प्रयोग तथा मोटर वाहन और कल-कारखानों से निकलने वाले धुएं से तो लगभग दो अरब टन कार्बन-डाइ-आॅक्साइड वायुमण्डल में मिल जाती है। विद्युत ताप घरों में कोयले के जलने के कारण तथा पेट्रोलियम पदार्थों के प्रयोग से हानिकारक गैसें वायुमण्डल में पहुंच रही हैं। तथ्य बताते हैं कि क्लोरीन, फ्लोरीन तथा कार्बन परमाणुओं के तालमेल से बना क्लोरो-फ्लोरो कार्बन का एक अणु कार्बन-डाइ-आॅक्साइड के अणु की तुलना में 14 हजार गुना अधिक गर्मी पैदा करता है और धरती के तापमान को 25 फीसदी से भी अधिक बढ़ा देता है।

21 वीं सदीं में पृथ्वी की बढ़ती गर्मी और उससे मानव जाति के लिए बढ़ते खतरों को भापते  हुए ही जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और वनों की सुरक्षा के लिए 1992 में विश्व पर्यावरण सम्मेलन एवं 1997 में जापान के क्योटो शहर में 141 देशों के बीच ग्रीन हाउस गैसों पर अंकुश लगाने के लिए बड़ी संधि की गई। दिसम्बर 2004 में कार्बन व्यवसाय को लेकर डरबन सम्मेलन तथा फरवरी 2005 में फिर क्योटो प्रोटोकाॅल संधि को अंतिम रूप देते हुए 2012 तक कार्बन-डाई-आॅक्साइड के उत्सर्जन को 1990 के स्तर पर लाने की सहमति बनी थी। इस संधि का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह था कि बुश प्रशासन ने इसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए महंगी प्रणाली बताते हुए अस्वीकार कर दिया। जी-8 देशों की वैश्विक ताप वृद्धि जैसे मुद्धे पर क्योटो प्रोटोकाॅल पर चुप्पी निश्चित रूप से विकासशील देशों के लिए बड़ी चिंता का विषय है। इस पूरे मुद्धे पर अमेरिका जैसे देश का विकासशील देशों पर दोषारोपण करना खुद अपनी गलती छिपाने का ही सुरक्षा कवच है।

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